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श्रमिक-किसान कल्याण हो जीडीपी का पैमाना

जीडीपी वृद्धि की प्रत्येक इकाई अन्य देशों की तुलना में अधिक प्रदूषण और पर्यावरणीय गिरावट का कारण भी बन रही है। इसलिए, भारत उस शहरी-औद्योगीकरण विकास मॉडल का पालन जारी रखना गवारा नहीं कर सकता, जिसने वैश्विक पर्यावरण और असमानता...

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जीडीपी वृद्धि की प्रत्येक इकाई अन्य देशों की तुलना में अधिक प्रदूषण और पर्यावरणीय गिरावट का कारण भी बन रही है। इसलिए, भारत उस शहरी-औद्योगीकरण विकास मॉडल का पालन जारी रखना गवारा नहीं कर सकता, जिसने वैश्विक पर्यावरण और असमानता संकट पैदा किए हैं।

भारत के नीति-निर्माता दुविधा में हैं। उनका कहना है कि कृषि क्षेत्र में जरूरत से बहुत ज़्यादा लोग काम कर रहे हैं। उनके अनुसार, भारत के कृषि क्षेत्र की उत्पादकता, जिसको इसमें कार्यरत लोगों की संख्या के हिसाब से मापा जाता है, वह बहुत कम है। उनका मानना है कि ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को ग्रामीण इलाकों एवं खेतों से और लघु, ‘अनौपचारिक’ कारखानों और सेवा उद्यमों से भी निकालकर शहरों में लाया जाए ताकि उन्हें बड़े, ‘औपचारिक’ कारखानों एवं सेवा उद्यमों में काम पर लगाया जा सके।

समस्या यह है कि बड़े औपचारिक उद्यम पर्याप्त सुरक्षित नौकरियां और अच्छा वेतन नहीं दे रहे हैं। वे ज़्यादा लोगों को काम पर रखने, उन्हें अधिक तनख्वाह और सामाजिक सुरक्षा देने को तैयार नहीं हैं। इसकी बजाय, वे वेतन की लागत कम रखने के लिए अधिक ‘लचीले’ श्रम कानूनों की मांग कर रहे हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था की मुख्य समस्या यह है कि सभी क्षेत्रों मसलन, विनिर्माण, सेवाएं और कृषि में नियोक्ता अपना उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाने के लिए इंसानों के बजाय ज़्यादा मशीनरी और ज़्यादा तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं।

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भारतीय अर्थव्यवस्था को जिस मुख्य सुधार की ज़रूरत है, वह है व्यावसायिक उद्यम के ढर्रे और प्रचालन में सुधार। मज़दूर, चाहे वे खेतों में हों या कारखानों में, वे जिस उद्यमों में काम करते हैं उनके मालिकों की सोच होती है, उनके काम से हुआ मुनाफ़ा, उनका ही रहे और उनकी संपत्ति में इजाफा करे, न कि यह लाभ किसी वित्तीय निवेशक की संपत्ति बढ़ाने के काम आए। उत्पादन प्रक्रिया के लिए आवश्यक पूंजीगत संपत्ति जैसे कि विनिर्माण उद्यम में मशीनें और खेती के लिए ज़मीन, उद्यम में काम करने वाले मज़दूरों की होनी चाहिए। मज़दूर अपने मालिक खुद हों और उन्हें स्टॉक मार्केट निवेशकों और सामंती ज़मींदारों की मल्कियत वाले कारखानों और खेतों में कर्मचारी बनने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। अपने काम से होने वाले मुनाफ़े का इस्तेमाल वह कैसे करेंगे, यह चुनने का अधिकार उन्हें होना चाहिए। अब चाहे तो अपने उद्यम में और अधिक निवेश करें या अपने परिवार के कल्याण और अपने बच्चों की शिक्षा पर लगाएं।

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जैसा कि माइक बर्ड ने अपनी किताब ‘द लैंड ट्रैप : ए न्यू हिस्ट्री ऑफ़ द वर्ल्ड्स ओल्डेस्ट एसेट’ नामक पुस्तक में बताया है कि भू-स्वामित्व में सुधार, जिसके तहत ज़मीनें ज़मींदारों से लेकर उनके खेतों में काम करने वाले मज़दूरों को हस्तांतरित की गईं, उसकी बदौलत पिछले 50 सालों में जापान, दक्षिण कोरिया, ताइवान और चीन में छोटे किसानों की आय भारत की तुलना में कहीं ज़्यादा तेज़ी से बढ़ी। बर्ड व्याख्या करते हैं कि भारत की तुलना में अन्य देशों में सुधार तेज़ी से क्यों हुए। सभी देशों में निहित स्वार्थ सुधारों के रास्ते में आड़े आते हैं। हालांकि, उन देशों के नेताओं ने किसान-मज़दूरों के अधिकारों का समर्थन किया, न कि पूंजीपति-मालिकों का। सुधारों से छोटे किसानों की कमाई और संपत्ति बढ़ी, और उन्होंने अपने बच्चों की शिक्षा में ज़्यादा निवेश किया। गौरतलब है कि लोगों को खेती से हटाए बिना भी, कृषि-उत्पादन और कृषि उत्पादकता बढ़ी है।

अर्थशास्त्रियों और व्यापार करने वालों को उद्यमों में ‘पैमाने’ पर फिर से सोचना चाहिए। एक मानकीकृत वस्तु का बड़े पैमाने पर उत्पादन, चाहे यह फैक्टरी उत्पादन बढ़ाने में सहायक कोई प्रक्रिया हो या बड़े खेत में एक ही फसल उगाना, बड़ी मशीनों का उपयोग और दोहराव वाले कामों को करने के लिए कम कुशल श्रमिकों को रोज़गार देकर अपनी आर्थिक दक्षता बढ़ाता है। बड़े पैमाने के उद्यमी मशीनों और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में पूंजी लगाने की हैसियत रखते हैं। इस तरह, उन्हें कम श्रमिक और बुद्धि की ज़रूरत पड़ती है। ऐसा करके जहां उनकी दक्षता और उत्पादन मात्रा बढ़ सकती है, और उत्पादकता भी। ऐसे उद्यम कम श्रमिकों को नौकरी पर रखते हैं। वे अर्थव्यवस्था के ‘रोजगार रहित’ सकल घरेलू उत्पाद बढ़ोतरी से योगदान करते हैं।

छोटे खेत जो जैविक तरीके से उन्नत किस्म की फसलें उगाते हैं, उन खेतों में उत्पादन की ‘संभावना’ ज़्यादा होती है। कचरा खेत में अपने आप उपयोगी अवयव बन जाता है, खासकर उन खेतों में जहां पर जानवर भी रखे होते हैं। ज़्यादा संभावना वाले खेत स्वाभाविक रूप से अधिक टिकाऊ होते हैं। ऐसे छोटे खेतों में, जिनका पैमाना कम किंतु संभावना अधिक हो, सामग्री और ऊर्जा अपने भीतर और ऐसे छोटे खेतों के आसपास ही घूमती रहती है।

पर्यावरण वैज्ञानिक वैक्लाव स्मिल ने आधुनिक उद्योगों, खाद्य उत्पादन और वितरण प्रणालियों, और वैश्विक परिवहन प्रणालियों में हाइड्रोकार्बन ऊर्जा और अन्य गैर-नवीकरणीय अवयवों की सकल व्यवस्थात्मक ज़रूरतों की गणना की है। अपनी किताब, हाउ द वर्ल्ड रियली वर्क्स में, वह समझाते हैं कि आधुनिक एवं सघन तकनीकी विधि से बड़े पैमाने का खाद्य उत्पादन और वितरण प्रणाली मिट्टी, पानी और वातावरण का सबसे बड़ा प्रदूषक है। वह यह भी समझाते हैं कि ज़्यादा संभावना वाले छोटे पैमाने के खेत पर्यावरणीय स्थिरता के लिए सबसे उपयुक्त वैज्ञानिक उपाय हैं।

वह बताते हैं कि समस्या यह है कि इस किस्म के समाधान में ज़्यादा लोगों को ग्रामीण इलाकों में बने रहने और काम करने, और छोटे कृषि, विनिर्माण और सेवा उद्यमों में शामिल होने की ज़रूरत होगी। इसके लिए चक्र उल्टा घुमाकर लोगों को शहरी, औपचारिक उद्यमों से निकालकर ग्रामीण, अनौपचारिक उद्यमों की ओर ले जाने की ज़रूरत पड़ेगी। विकसित देशों के नागरिक इसे स्वीकार नहीं करेंगे। भारत को अन्य देशों जितनी समस्या नहीं होनी चाहिए, क्योंकि यहां पहले से ही सबसे ज़्यादा आबादी ग्रामीण इलाकों में है और काम करती हैं।

सकल घरेलू उत्पाद की उच्चतर बढ़ोतरी से भारत के एक अरब से अधिक नागरिकों की भलाई-स्तर में सुधार नहीं होगा। पिछले 25 सालों से, भारतीय अर्थव्यवस्था ने अन्य बड़े देशों की तुलना में सकल घरेलू उत्पाद की प्रत्येक इकाई में वृद्धि होने के बावजूद कम रोज़गार पैदा किया है। हमारे पास दुनिया में युवाओं की सबसे बड़ी आबादी है, जो अच्छी कमाई वाले रोजगार की तलाश में हैं।

विकास के मौजूदा ढर्रे के साथ, पर्याप्त रोज़गार पैदा करने के वास्ते अगले कुछ सालों तक भारत की सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर 12 प्रतिशत सालाना होनी चाहिए। जीडीपी वृद्धि की प्रत्येक इकाई अन्य देशों की तुलना में अधिक प्रदूषण और पर्यावरणीय गिरावट का कारण भी बन रही है। इसलिए, भारत उस शहरी-औद्योगीकरण विकास मॉडल का पालन जारी रखना गवारा नहीं कर सकता, जिसने वैश्विक पर्यावरण और असमानता संकट पैदा किए हैं।

हमारे देश को रहने लायक और टिकाऊ ‘विकसित भारत’ बनने के लिए विकास का नमूना बदलना होगा। जीडीपी पायदान पर अन्य देशों से ऊपर रहने का लक्ष्य रखने की बजाय, भारत के आर्थिक सुधारकों को आर्थिक विकास की प्रक्रिया में ही सुधार करना चाहिए।

हमें अपना रास्ता खोजना होगा; एक अधिक समावेशी और पर्यावरणीय रूप से टिकाऊ रास्ता; अपने देश को बनाने और अपनी अर्थव्यवस्था को मज़बूत करने का एक अधिक ‘पारिवारिक’ एवं ‘सामुदायिक’ तरीका —एक ज़्यादा ‘गांधीवादी तरीका’— वह जो देश निर्माण करे और सभी नागरिकों को पूर्ण स्वराज (संपूर्ण राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक आज़ादी) दे सके।

लेखक योजना आयोग के पूर्व सदस्य हैं।

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