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संपत्ति में हक व स्वावलंबन से महिला सशक्त बने

लिंग अनुपात वृद्धि स्थायी हो

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जिन राज्यों में महिलाओं को संपत्ति में बराबर अधिकार दिया जाता है वहां महिलाओं की जनसंख्या पुरुषों की अपेक्षा ज्यादा ही है।

वर्ष 2025 में हरियाणा के बढ़े हुए लिंग अनुपात की खबर सुखद है परंतु विवेक इसके टिकाऊपन व इस रास्ते से उत्तरोत्तर सुधार पर भरोसा नहीं कर पा रहा। आर्थिक स्तर पर प्रगतिशील परंतु सामाजिक स्तर पर बीमारू की कैटेगरी में गिने जाने वाले राज्य में जन्म स्तर पर लगभग आधे जिलों में सुधार का होना एक स्वागतयोग्य कदम है। वैसे जिन प्रावधानों पर विशेष ध्यान देकर इस वृद्धि को हासिल किया गया है उनकी प्रवृत्ति अस्थिर होती है।

महिलाओं की आर्थिक स्थिति व सामाजिक मानसिकता में मूलभूत बदलाव की अनुपस्थिति में केवल तकनीकी आदि माध्यमों से हासिल इस बढ़ोतरी के भी कई यक्ष प्रश्न हैं। गर्भवती महिलाओं की निगरानी, एमटीपी किट बेचने वाले दुकानदारों के खिलाफ कार्रवाई तथा अल्ट्रासाउंड मशीनों की निगरानी और प्रशासन की तरफ से वीकली मॉनिटरिंग वे मुख्य माध्यम हैं, जिनके आधार पर इस बढ़ोतरी के हासिल करने के दावे किए जा रहे हैं। लेकिन यह बढ़ोतरी अत्यधिक चंचलता लिए हुए नजर आती है। यहां तक कि केवल अफसरशाही के स्तर पर थोड़ा फेरबदल भी इस बढ़ोतरी के लिए चुनौती बन सकता है। दूसरी तरफ गर्भवती महिलाओं की निगरानी को उनके मानवीय अधिकारों का उल्लंघन व उनकी शारीरिक आजादी पर अंकुशीकरण की तरह से भी अवश्य ही देखा जाएगा। आशा-वर्करों द्वारा करवाई जा रही गर्भवती महिलाओं की निरंतर निगरानी स्वयं उनके लिए भी भारी जोखिमपूर्ण काम है। आंगनबाड़ी वर्कर भी लिंग अनुपात को लेकर अधिकारियों की तरफ से बढ़े-चढ़े आंकड़े दिखाने का दबाव का जिक्र करती हैं। हकीकत यह भी है कि लिंगानुपात को लेकर सबसे भरोसेमंद आंकड़े तो जनगणना से उभर कर आने वाले ही आंकड़े होते हैं।

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हरियाणा स्थापना पूर्व से ही इस समस्या से जूझता रहा है। 2001 की जनगणना में हरियाणा लिंगानुपात के हिसाब से सबसे खराब राज्यों में 861:1000 के अनुपात पर था। 2011 में भी यह मामूली सुधार के साथ 879: 1000 के काफी खराब स्तर पर रहा। 2015 में हरियाणा से ही ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ अभियान की शुरुआत हुई। लड़कियों व उनके परिजनों को कई तरह से आर्थिक सहयोग की स्कीमें शुरू की गई। प्रचार-प्रसार से राज्य की तमाम एजेंसियों का ध्यान इस ओर खींचा गया। अनेक स्तर पर सरकारी पहल पर आयोजित बड़े-बड़े प्रोग्रामों का स्वयं लेखिका भी हिस्सा रही। फलस्वरूप 2019 में हरियाणा का लिंग अनुपात बढ़ते हुए (एसआरबी) 923 से अधिक दर्ज हुआ। परंतु इसके बाद इसमें गिरावट दर्ज की गई और 2024 में यह लिंगानुपात घटकर 910 पर आ गया। 2025 में इसके फिर अब तक के अधिकतम स्तर 930:1000 पर पहुंचने का दावा किया जा रहा है, जो राष्ट्र स्तर के अनुपात 933 के लगभग आसपास पहुंचा हुआ है। लगता है 2024 के बाद प्रशासनिक स्तर पर पीसीपीएनडीटी एक्ट को लागू करने के प्रयास अभूतपूर्व तरीके से किए गए, जिसमें अकेले 2025 में ही 154 एफआईआर दर्ज की गई। नतीजों के हिसाब से पंचकूला 971, फतेहाबाद 961 व पानीपत 951 पर पहुंचा है। प्रशासन ने गैर-कानूनी तरीके से गर्भपात की दवाइयां बेचने वालों, पड़ोसी राज्यों में जाकर गर्भपात करवाने वालों, अल्ट्रासाउंड केंद्रों पर छापामारी तथा गर्भवती महिलाओं की आईडी बनाकर उनकी निगरानी आदि कार्रवाइयां व्यापक पैमाने पर की गई। परंतु समस्या को समूल समझते हुए समग्रता पूर्ण तरीके से उसका निवारण करने की चुनौती दरपेश है।

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हमारे समाज में पुत्र लालसा बहुत गहरी जड़ें जमाए हुए है। हाल ही में फतेहाबाद व जींद जिला के उदाहरण जहां लड़के के लिए परिवार वालों ने दस-दस लड़कियां पैदा कीं और ग्यारहवीं सन्तान लड़का होने पर उसका नाम ‘खुशदिल’ रखना इसके ताजा उदाहरण हैं। इसके ठोस कारण भी हैं। मसलन महिलाओं को संपत्ति में अधिकार न होना, जिसकी वजह से उन्हें बोझ व पराया धन समझने की प्रवृत्ति बनती है। पितृ सत्तात्मक समाजों में पुत्र ताकत का प्रतीक है। वंश धारक, मां-बाप को मुखाग्नि देने वाला व बुढ़ापे का सहारा माना जाता है। लड़कियों की असुरक्षा व दहेज हिंसा आमतौर पर लड़की भ्रूण हत्या के मुख्य कारण उभर कर आते हैं। कुछ तबकों को छोड़कर हमारा समाज न तो दहेज प्रथा को खत्म करने के लिए इसके खिलाफ लड़ता नजर आता है और न ही महिलाओं के प्रति होने वाली हिंसा के खिलाफ आवाज उठाता है।

इस असहाय समर्पणकारी मानसिकता के खिलाफ सामाजिक सक्रियता को हासिल करने के जनजागरण अभियान चलाने होंगे। दहेज के खिलाफ और महिलाओं की सुरक्षा के लिए तमाम संस्थाओं को संघर्ष करना होगा। शादियों पर खर्च कम होने की बजाय और बढ़ता ही जा रहा है। जिम्मेवार पदों पर बैठे लोगों के खिलाफ महिला यौन हिंसा के आरोप लगने पर सख्त से सख्त सजा सुनिश्चित करवानी होगी। वक्त की मांग है महिलाओं को संपत्ति में अधिकार व ज्यादा से ज्यादा रोजगार देना होगा। मगर इस पर राज्य मशीनरी की इच्छा शक्ति की कमी है। जिन राज्यों में महिलाओं को संपत्ति में बराबर अधिकार दिया जाता है, वहां महिलाओं की जनसंख्या पुरुषों की अपेक्षा ज्यादा ही है। हरियाणा के मुस्लिम बहुल मेवात में भी लिंग अनुपात बेहतर है।

दूसरी तरफ हरियाणा में महिलाएं शिक्षा, खेल, कला, साहित्य आदि हर जगह जितने मौके मिल रहे हैं उससे अच्छा करके दिखा रही हैं। फिर भी अनचाही बनी हुई हैं। यह जो विरोधाभास है इसे खत्म करने के लिए भी इसी प्रकार संयुक्त रणनीति बनाकर सरकार, प्रशासन व सामाजिक संस्थाओं को संकल्प के साथ मैदान में उतरना होगा।

लेखिका पूर्व डायरेक्टर, महिला अध्ययन केंद्र एमडीयू, रोहतक हैं।

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