इस साल भालू के हमले से छह लोग मारे गये। उत्तराखंड में पिछले बीस सालों में भालुओं और मानवों के बीच संघर्ष की 1630 घटनाएं हुईं हैं और यह लगातार बढ़ रही हैं। पिछले पच्चीस सालों में राज्य में काले भालुओं ने 2009 लोगों पर हमले किए हैं।
आज पूरी दुनिया बढ़ते वन्यजीव-मानव संघर्ष से चिंतित है, जिसे वैज्ञानिक जलवायु परिवर्तन से जुड़ी वैश्विक और स्थानीय परिस्थितियों से जोड़ते हैं। हाल ही में केंद्रीय वन, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन मंत्री की अध्यक्षता में आयोजित बैठक में भी यह मुद्दा उठाया गया। इसमें बताया गया कि हिमालयी क्षेत्रों में वन्यजीवों का आबादी वाले क्षेत्रों में आना बढ़ा है, जिससे संघर्ष भी बढ़ रहा है। सुझाव दिया गया कि संवेदनशील क्षेत्रों में वैज्ञानिक अध्ययन कर इन टकरावों का मूल कारण जानकर समाधान किया जाए।
इसके बाद, उत्तराखंड सरकार ने पौड़ी गढ़वाल में बढ़ते वन्यजीव-मानव संघर्ष का संज्ञान लिया और जिला प्रशासन तथा वनविभाग को गश्त बढ़ाने और बच्चों के लिए एस्कॉर्ट व्यवस्था करने के निर्देश दिए। इसके साथ ही यह भी माना कि वन्यजीवों से लोगों की सुरक्षा प्राथमिक जिम्मेदारी है।
फिर भी, पिछले साल दिसम्बर माह में लगभग प्रतिदिन जंगली जानवर बस्तियों में आम जन को हताहत करते रहे। दिसम्बर माह में ही टिहरी जिले में चारा काटते एक ग्रामीण और जिला चमोली में आंगन में खाना पकाती एक महिला पर भालू ने हमला किया। बच्चे और घास-चारा लाती महिलाएं इन हमलों का ज्यादा शिकार हो रही हैं। अधिकतर काले भालुओं का हमला हो रहा है। अपने साथियों को बचाने के लिए छात्र-छात्राएं भालू से भिड़ भी रहे हैं। इस प्रकार की घटनाओं के मध्यनजर अलग-अलग जगहों में हालातों के अनुसार स्कूल टाइमिंग बदली जा रही हैं। लंबी अवधि के लिए स्कूल बंद भी किए जा रहे हैं।
अब तो देहरादून में सहसपुर ब्लॉक विद्यालय में भी भालू की पहुंच हो गई है। थानो क्षेत्र में एक महिला जो घास लेने गई थी, उस पर भालू ने आक्रमण किया। वन अधिकारियों के अनुसार यह अपने तरह की पहली घटना थी। थानो क्षेत्र में ही हाथी ने पिछले माह ही मां-पिता के बीच स्कूटी में बैठे बच्चे को पटक कर मार दिया था। डीएम ने त्वरित रिस्पॉन्स ग्रुप बनाया है। नियमित निगरानी, सेंसर-बेस्ड तेज आवाज करने वाले उपकरण, सोलर लाइट, कैमरे, फोकस मॉनिटरिंग के विकल्प भी अपनाए जा रहे हैं। वहीं 26 दिसम्बर को गढ़वाल में उखीमठ में ओंकारेश्वर मंदिर के निकट दोपहर करीब तीन बजे जंगल की ओर से आए भालू ने घास काटती महिला को गंभीर रूप से लहूलुहान किया। 26 दिसम्बर को ही नैनीताल जिले के तोक धुरा में एक महिला पर गुलदार ने हमला कर मार डाला। महिला का शव काफी दूर मिला था। चार-पांच दिनों तक भी गुलदार को नहीं पकड़ा जा सका था।
दिसम्बर माह में अधिकतर हमले विशेषकर भालुओं द्वारा किए गए। इस साल भालू के हमले से छह लोग मारे गये। उत्तराखंड में पिछले बीस सालों में भालुओं और मानवों के बीच संघर्ष की 1630 घटनाएं हुईं हैं और यह लगातार बढ़ रही हैं। पिछले पच्चीस सालों में राज्य में काले भालुओं ने 2009 लोगों पर हमले किए हैं।
वन विभाग ने 2021 में तय किया था कि जीपीएस युक्त रेडियो कॉलर टैग लगाने का निर्णय लिया जाएगा। तब तक करीब 60 मौतें हो चुकी थीं। यह कार्य वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया को सौंपा गया था। उन्होंने पहले चार भालुओं को इसके लिए चिन्हित किया है, जो रुद्रप्रयाग, पौड़ी और चमोली में आतंक बने हुए हैं। वर्तमान में राज्य में करीब 500 भालू हैं, जिनकी गतिविधियों पर मानव निगरानी रखी जा रही है। इससे पहले, लेपर्ड, टाइगर और हाथियों पर भी इसी प्रकार की निगरानी की जाती रही है।
भालू अधिकतर खाने की तलाश में रहता है और उसकी याददाश्त बहुत अच्छी होती है। अमेरिका, अफ्रीका और यूरोप में भालूओं के लिए कूड़े के बिन विशेष रूप से डिज़ाइन किए गए हैं, ताकि वे उनमें न खेल सकें। अब उनका हाइबरनेशन समय भी कम हो गया है। पिछले 25-30 सालों में शहरीकरण और बढ़ते कूड़े के कारण भालुओं का सोने का समय घटकर करीब 64 दिन रह गया है, जो पहले दिसम्बर से मार्च तक हुआ करता था। जब कूड़ा सड़ता है, तो उसके गंध से भालू आकर्षित होते हैं। खुले में पड़ा कूड़ा, विशेषकर गांवों, नगरों और जंगली क्षेत्र के पास के स्थलों में भालुओं को आकर्षित करता है, और इस वजह से वे बस्तियों में घुस आते हैं। इधर, मानव बस्तियां वन्यजीवों के अधिवासों के बहुत पास तक पहुंच गई हैं। इसके कारण जानवर अब आसानी से उनकी फसलों, पशुओं और संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने की स्थिति में आ गए हैं। जलवायु परिवर्तन से वन्यजीवों को होने वाली समस्याओं का भी समाधान ढूंढ़ना चाहिए, जिससे वन्य पशुओं के हमले कम हो सकें।
अधिकतर जानवर, चाहे शाकाहारी हों या मांसाहारी, जंगलों से गांवों, नगरों और महानगरों तक अकेले या झुंडों में हमले कर रहे हैं, मुख्य रूप से खाने की तलाश में। घरों, खेतों और खुले में होने वाले हमले डर पैदा करते हैं, साथ ही मानव, पशुधन और खेती-बाग-बगीचों की फसलों को भारी नुकसान भी पहुंचा रहे हैं।
आबादी, शहरीकरण और परिवहन के कारण वन्यजीवों के अधिवासों के नष्ट होने से भी मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़े हैं। वन विभाग ने जंगलों से सटे गांवों में अपनी गश्त बढ़ा दी है और वन्यजीवों के वास स्थल सुधारने के लिए कार्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं। उनका कहना है कि यह समय गुलदार और बाघों का चरम प्रजनन सीजन भी है, जिससे जानवर और भी अधिक आक्रामक हो रहे हैं। हाथियों से होने वाले भारी नुकसान से बचाव के लिए हाथी रोधी सुरक्षा खाइयां और सोलर फेंसिंग भी लगाई गई हैं।
लेखक पर्यावरण वैज्ञानिक हैं।

