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जाने अब क्या होगा जी, दुविधा में दारोगाजी

तिरछी नज़र

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इस वक्त दारोगाजी को तो चुनाव जीतने की पड़ी है। कहते हैं कि जो उन्हें वोट देगा उसे पांच हजार डॉलर मिलेंगे। यह उधार का सिंदूर हमारे देश की ही देन है। कुर्सी बरकरार रखने के लिए यहां सब कुछ बांटा जाता है।

कहते हैं कि नकल में शक्ल बिगड़ जाती है। ध्यान से देखिए दुनिया के दारोगा की शक्ल। यदि आईने में न दिखती हो तो किसी नदी या तालाब के पानी में देख लीजिए। और अगर एकाध कंकड़ या पत्थर उसमें डालें तो शक्ल कई रूपों में आड़ी-टेढ़ी परतों में नजर आने लगेगी। यह सब लहरों का कमाल है। लहरें कई तरह की विद्रूप शक्लें बना देती हैं। यह घटना बताती है कि वक्त के हिसाब से आदमी बहुरूपिया बन जाता है।

हरेक लहर वक्त की परिचायक होती है। सो इस वक्त मिडटर्म पोल हैं वहां और दारोगा अपनी पोलें देखकर डरे हुए हैं। उपाय तो बहुत से हैं पर हिंदुस्तानी पैंतरों के कायल हैं। यहां चुनाव जीतने के कई पैंतरे अपनाए जाते हैं। वैसे भी जनता की कमजोरी है कि बीते को जल्द भुला देती है। वजह है दाल-रोटी। दाल-रोटी उसे जीने भी नहीं देती और मरने भी नहीं देती। वह बेचारा तो दिन-रात उसी की जुगाड़ में लगा रहता है। इसलिए वोटिंग के दिन भगवान का नाम लेकर कोई भी बटन दबा देता है। सोचता है खाने को तो दाल-रोटी ही मिलना है। कोई उसे पनीर या बिरयानी तो दे नहीं देगा। पनीर और बिरयानी तो उन भाग्य विधाताओं के हिस्से में है जो ऊंची-ऊंची कुर्सियों पर बैठे हैं। अपनी तो छोड़ो अपनी अगली पुश्तों का इंतजाम कर कुर्सियों से उठेंगे।

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सो इस वक्त दारोगाजी को तो चुनाव जीतने की पड़ी है। कहते हैं कि जो उन्हें वोट देगा उसे पांच हजार डॉलर मिलेंगे। यह उधार का सिंदूर हमारे देश की ही देन है। कुर्सी बरकरार रखने के लिए यहां सब कुछ बांटा जाता है। साइकिल ले लो, मोबाइल ले लो, लैपटॉप ले लो और अब तो नकदी का जमाना आ गया है। मोबाइल, साइकिल, लैपटॉप आदि बीते वक्त की यादें हैं। और अमेरिका में तो ये डिस्पोजेबल आइटम की श्रेणी में आते हैं। जैसे कि हमारे यहां कुल्हड़ और थर्माकोल के आइटम। खाया-पिया और फेंका।

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मगर डॉलर बड़ी चीज है। अमेरिका ग्रेट है तो डॉलर आलमाइटी। देख नहीं रहे कि डॉलर को अपनी सीट से हिलाने के लिए कितना दम लगाना पड़ रहा है। जोर लगाके हाइय्या हो रहा है पर वह टस से मस नहीं हो रहा। अलबत्ता मुस्कुरा रहा है। जड़ें गहरी हैं ना।

खैर, हाल-फिलहाल उधार के सिंदूर का दूसरा रंग यह है कि नाम बदले जाएं। जैसे यहां मद्रास को चेन्नई किया, इलाहाबाद को प्रयागराज, केरल को केरलम, बैंगलोर को बेंगलूरु। इसी नकल में दारोगाजी ने ओंटारियो झील को अमेरिकन कर दिया। अब अगर हमारे यहां झुमरीतलैया का नाम बदला गया तो वे व्हाइट हाउस का नाम क्या रखेंगे?

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