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जो है अलख निरंजन

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साधु-संन्यासियों को अक्सर कहते सुना जा सकता है, अलख निरंजन। आखिर यह है क्या। असल में अलख संस्कृत भाषा के शब्द अलक्ष्य (न लक्ष्यते लक्षकर्म्मणि) का तद्भव रूप है। जो लक्ष्य न हो पाए वह अलक्ष्य है। जिसे परिभाषित नहीं किया जा सकता है, जिसका भेद करना सम्भव नहीं है, जिसे जाना न जा सके, जो दृश्य नहीं है, जो ज्ञात नहीं है, जो प्रत्यक्ष न हो, जो अगोचर हो, जो चिन्हित न किया जा सके, जो किसी भी प्रकार की प्रवृत्तियों से युक्त न हो। परब्रह्म ईश्वर के लिए यही कुछ कहा जाता है। अर्थात‍् सर्वव्यापी, लेकिन अनकहा। इसके कई अर्थ और भी हैं, जैसे जो दिखाई न पड़े। जो नजर न आए। यानी एक शब्द में कहें तो अदृश्य और अप्रत्यक्ष।

ऐसे ही शब्द है, अगोचर। यानी इंद्रियातीत। सूरदास की एक रचना है, ‘जे उपमा पटतर लै दीजै ते सब उनहिं न लायक। जौ पै अलख रह्मौ चाहत तौ बादि भए ब्रजनायक।’ अब इसी क्रम में आते हैं। वह है ईश्वर का एक विशेषण। मलिक मोहम्मद जायसी की पंक्ति है, ‘प्रलख अरूप अबरन सो करता। वह सबसों सब वहि सों बरता।’ एक मुहावरा है—अलख जगाना। अर्थात‍् पुकारकर परमात्मा का स्मरण करना या कराना। परमात्मा के नाम पर भिक्षा मांगना। अलखधारी। अलखनामी। अलखनिरंजन। अलखपुरुष बराबर ईश्वर। अलखमंव मतलब, निर्गुण संत संप्रदाय में ईश्वर मंत्र।

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अब आइये निरंजन पर। सही रूप निरञ्जन (निर्गतमञ्जनं कज्जलं तदिव समलमज्ञानं वायस्मात‍्) वह है जो बिना अञ्जन का हो; दोषरहित हो; अज्ञान से रहित हो; जो किसी भी प्रकार की माया से प्रभावित न हो; निर्मल हो; किसी प्रकार के आवेग, वासना, लालसा, राग, क्रोध, अनुराग, आदि गुणों से युक्त न हो; निष्कलङ्क हो; निर्गुण हो; उसे निरञ्जन कहा जाता है। महादेव, शिव, अथवा ईश्वर के लिए इस विशेषण का प्रयोग किया जाता है। निरंजन का अर्थ अंजन रहित। बिना काजल का। जैसे, निरंजन नेत्र। कल्मषशून्य। दोषरहित। माया से निर्लिप्त (ईश्वर का एक विशेषण)। इसमें कुछ गुण आते हैं। सादा। बिना अंजन आदि का। परमात्मा। महादेव।

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अतः अलख निरञ्जन का आह्वान उस निर्गुण, निराकार, अपरभाषित ईश्वर के लिए है; यह अलख निरञ्जन का उद्घोष गोरक्षनाथ (अथवा गोरखनाथ) ने आरम्भ किया मानते हैं। कहते हैं कि इसी उद्घोष के साथ गोरखनाथ ने भर्तृहरि को दीक्षा के लिए प्रेरित किया। तो इस प्रकार कुछ लोग कुछ इसे भगवान दत्तात्रेय का जयघोष कहते हैं।

साभार : अब छोड़ो भी डॉट ब्लॉगस्पॉट डॉट कॉम

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