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शपथ लेकर भी दोष निरस्त करने का रास्ता

तिरछी नज़र

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सप्तपदी पर सात शपथें लेने के बावजूद तलाक हो ही जाते है कि नहीं! राजकपूर जैसी बड़ी ‘तोप’ ने ‘तीसरी कसम’ में तीन-तीन शपथें लीं, एक भी निभी क्या? कसमे वादे प्यार वफ़ा, वादे हैं वादों का क्या!

कल शपथ समारोह है। बनारसी बाबू नवगठित सरकार में मंत्री बनाये गये हैं। उन्हें मंत्रिपद की शपथ लेनी है। शपथपत्र का प्रारूप मिल गया है ताकि घर पर ठीक से रिहर्सल कर लें। पर प्रारूप पढ़ कर बनारसी बाबू का माथा ठनक गया।

ईश्वर के नाम पर शपथ लेनी है कि ईमानदारी से काम करेंगे! आज के भोगवादी, बाजारवादी समय में शपथ की क्या अहमियत है भला। शपथ से यदि काम चल जाता जो लिखित कॉन्ट्रैक्ट और दलीलें क्यों बनाई जातीं। कोर्ट में गीता के नाम पर सच बोलने की शपथ ली जाती है पर सारी बहसों व गवाहियों में झूठ जलेबी के रस की भीतर तक भरा रहता है। सप्तपदी पर सात शपथें लेने के बावजूद तलाक हो ही जाते है कि नहीं! राजकपूर जैसी बड़ी ‘तोप’ ने ‘तीसरी कसम’ में तीन-तीन शपथें लीं, एक भी निभी क्या? कसमे वादे प्यार वफ़ा, वादे हैं वादों का क्या!

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ऊपर से ईमानदारी की शपथ! लो कर लो बात! साधारण गंवई मनुख को भी पता है कि मंत्रिपद और ईमानदारी दोनों गलबहियां डाले एक साथ नहीं चल सकते। छत्तीस का आंकड़ा है दोनों के बीच। मंत्री पद यूं ही नहीं न मिल जाता। पहले विधायक बनो। विधायक बनने के लिए चुनाव लड़ो। चुनाव लड़ने के लिए चाहिए विपुल धन। इतने पापड़ बेलने के बाद जीत मिली और मंत्री बने तो इन्वेस्टमेंट पर माकूल रिटर्न की कामना करना कैसा गुनाह है, एंय!

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बनारसी बाबू को दो-दो बार हार का मुंह देखना पड़ा था। पहली बार बीस लाख और दूसरी बार तीस लाख का खालिस चूना लगा। इस बार चुनाव आया तो मन में हिचकिचाहट फुफकार रही थी। बासमती ने हौसले की हवा भरी जी... ये बिजनेस है। नो रिस्क, नो गेन! जीत गये तो दस गुणा यूं चुटकी बजाते आते दिखेंगे। बासमती की बात पर हिम्मत करके दांव खेल गये। इस बार पचास पेटी स्वाहा! अब आप ही बताओ कि इस बार सौभाग्य से मंत्री बन रहे हैं। एक करोड़ के ग्यारह करोड़ न बना सके तो क्या फायदा राजनीति करने का! ईश्वर के नाम पर शपथ लेकर ईमानदारी बरती तो हो चुका रिटर्न हासिल।

बनारसी बाबू धर्मपारायण आदमी हैं। जिस ईश्वर की कृपा से मंत्रिपद की लाटरी निकली उसी के नाम पर झूठी शपथ कैसे ले सकते हैं! रात दुविधा में कटती है। पारिवारिक पुरोहित ‘बाबा निर्मल बापू’ की शरण में पहुंचे- महाराज, इस विकट समस्या का कोई उपाय बताओ। ‘बाबा बापू’ ने पौने दो घंटे तक ग्रंथों को खंगालने के बाद उवाचा कि रे मूर्ख, ईश्वर को अपने बिजनेस में पार्टनर क्यों नहीं बना लेता! कमाई का दस परसेंट ईश्वर के नाम कर दे। ईश्वर पार्टनर हुए कि कृपा बरसनी शुरू! साल के अंत में पांच गुलगुले खाकर गंगा सागर में डुबकी मार आना। झूठी शपथ के सारे दोष निरस्त, बूझे?

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