जल सुरक्षा केवल आपूर्ति का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह जीवन, स्वास्थ्य, पर्यावरण और सामाजिक न्याय से जुड़ी एक समग्र प्रणाली है। जब तक भूजल को केवल दोहन की वस्तु के रूप में देखा जाएगा, तब तक संकट गहराता रहेगा।
बीते कुछ दशकों में भूजल का अत्यधिक दोहन और निरंतर प्रदूषण एक गंभीर स्वास्थ्य, सामाजिक और आर्थिक संकट का रूप ले चुका है। आज यह जल की गुणवत्ता, जनस्वास्थ्य और भावी पीढ़ियों के जलाधिकार से सीधे जुड़ा हुआ मुद्दा बन चुका है।
केंद्रीय भूजल बोर्ड द्वारा जारी वार्षिक भूजल गुणवत्ता रिपोर्ट 2025 के अनुसार, देश के कई राज्यों के जिलों के भूजल में विभिन्न रासायनिक प्रदूषकों की मात्रा निर्धारित मानकों से अधिक पाई जा रही है। रिपोर्ट के अनुसार, इसमें लवणता, फ्लोराइड, यूरेनियम, नाइट्रेट, आयरन और आर्सेनिक जैसे तत्व निर्धारित सीमा से ऊपर दर्ज किए गए हैं। ये आंकड़े नागरिकों के स्वास्थ्य, जीवन-गुणवत्ता और भविष्य से जुड़े गंभीर संकेत हैं।
हरियाणा में सिंचाई के लिए 85 प्रतिशत से अधिक जल भूमिगत स्रोतों से प्राप्त किया जाता है। रिपोर्ट के अनुसार, हरियाणा के कई जिलों में फ्लोराइड, नाइट्रेट, आयरन और यूरेनियम जैसे प्रदूषकों की मात्रा सुरक्षित मानकों से अधिक पाई गई है। विशेष रूप से, फ्लोराइड की अधिकता राज्य के अनेक जिलों में दंत फ्लोरोसिस और अस्थि फ्लोरोसिस जैसी गंभीर बीमारियों की आशंका को बढ़ाती है। नाइट्रेट की अधिकता शिशुओं में ‘ब्लू बेबी सिंड्रोम’ जैसी जानलेवा स्थिति उत्पन्न कर सकती है, जबकि यूरेनियम और आर्सेनिक दीर्घकालिक रूप से गुर्दे, हड्डियों और तंत्रिका तंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं।
कृषि क्षेत्र में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का अत्यधिक और असंतुलित प्रयोग, औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले अपशिष्टों का अपर्याप्त उपचार, शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में सीवेज प्रबंधन की कमजोर व्यवस्था तथा वर्षाजल के प्राकृतिक पुनर्भरण मार्गों का अवरुद्ध होना, भूजल की गुणवत्ता को लगातार नुकसान पहुंचा रहे हैं।
हाल के वर्षों में मध्य प्रदेश के भोपाल में दूषित पेयजल की घटनाएं यह दर्शाती हैं कि जल गुणवत्ता की अनदेखी गंभीर मानवीय त्रासदी में बदल सकती है। जांच में पाया गया कि दूषित पानी के सेवन से कई लोगों की असमय मृत्यु की घटनाएं सामने आईं। यह देश के लिए एक चेतावनी है कि जल गुणवत्ता को केवल तकनीकी या कागजी प्रक्रिया मानकर नहीं छोड़ा जा सकता। यह घटना दर्शाती है कि जल प्रदूषण का प्रभाव अचानक और घातक रूप में सामने आ सकता है। जब तक समस्या दिखाई देती है, तब तक बहुत नुकसान हो चुका होता है। यही कारण है कि भूजल प्रदूषण को अब भविष्य का नहीं, बल्कि वर्तमान का संकट मानकर उससे निपटना होगा।
सरकार द्वारा जल जीवन मिशन, अटल भूजल योजना और राष्ट्रीय जल गुणवत्ता कार्यक्रम जैसी योजनाओं के माध्यम से इस दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास किए जा रहे हैं। आवश्यकता है कि इन योजनाओं को जल गुणवत्ता सुधार की समग्र रणनीति में बदला जाए। भूजल की नियमित और पारदर्शी निगरानी, प्रदूषण स्रोतों की वैज्ञानिक पहचान, स्थानीय स्तर पर जल उपचार संयंत्रों की स्थापना और वर्षाजल संचयन को प्रभावी रूप से लागू करना समय की मांग है।
हरियाणा के संदर्भ में जिला स्तर पर जल गुणवत्ता मानचित्रण, ग्राम पंचायतों को जल-गुणवत्ता आधारित स्वास्थ्य सूचकांकों से जोड़ना और विकेंद्रीकृत जल उपचार प्रणालियों को बढ़ावा देना आवश्यक है। जल एवं स्वच्छता सहायक संगठन जैसी संस्थाओं की भूमिका को और सशक्त कर सामुदायिक सहभागिता को मजबूत किया जा सकता है। जल रक्षक और जल प्रहरी जैसे स्थानीय स्वयंसेवकों की अवधारणा जल निगरानी और जागरूकता को जमीनी स्तर पर प्रभावी बना सकती है।
वहीं यूरेनियम और आर्सेनिक जैसे तत्वों की भूगर्भीय उत्पत्ति, उनके प्रसार और स्वास्थ्य पर प्रभाव को समझने के लिए विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों को सक्रिय भूमिका निभानी होगी। हरियाणा के प्रत्येक जिले में जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग के अंतर्गत जल गुणवत्ता परीक्षण की प्रयोगशालाएं पहले से कार्यरत हैं। इनकी क्षमता, नियमितता और जन-सुलभता को और सुदृढ़ किया जाए। जल परीक्षण सेवाओं को जन-जागरूकता, परामर्श और समयबद्ध सूचना प्रणाली से जोड़ा जाए, ताकि आम नागरिकों को गुणवत्ता की जानकारी मिल सके। इसके साथ ही प्रदूषित जल के विकल्प, उपचार उपाय और स्वास्थ्य संबंधी सावधानियों के बारे में मार्गदर्शन प्राप्त हो सके। इन प्रयोगशालाओं के आंकड़ों के आधार पर राज्य स्तर पर जल गुणवत्ता प्रवृत्ति विश्लेषण किया जाना चाहिए, जिससे नीतिगत निर्णय अधिक प्रभावी बन सकें।
भूजल प्रदूषण को जनआंदोलन के माध्यम से ही स्थायी रूप से नियंत्रित किया जा सकता है। जब तक किसान उर्वरकों के संतुलित उपयोग को नहीं अपनाएंगे, उद्योग अपशिष्ट उपचार को गंभीरता से नहीं लेंगे, और नागरिक जल संरक्षण को अपनी दैनिक आदतों का हिस्सा नहीं बनाएंगे, तब तक यह समस्या बनी रहेगी। स्कूलों, पंचायतों, सामाजिक संगठनों और स्वयंसेवी संस्थाओं को जोड़कर जल गुणवत्ता पर आधारित व्यापक जन-जागरूकता अभियान चलाना समय की मांग है।

