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युद्ध और कला व संस्कृति की क्षति

द ग्रेट गेम

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दुखद है कि युद्ध व संघर्ष में कला-संस्कृति व पुरातत्व से जुड़ी चीजों को भारी कीमत चुकानी पड़ती है। देश के बंटवारे के परिणाम स्वरूप हुई अदला-बदली में सांस्कृतिक कलाकृतियां का भी भारी नुकसान हुआ। ईरान भी हालिया युद्ध की कीमत चुका रहा है।

चंडीगढ़ के सेक्टर-9 में दिन-दहाड़े हुई एक हत्या को लेकर पिछले कुछ दिनों से शहर हिला और सहमा हुआ है। शहर का वह हिस्सा, जो अपने लाल सुर्ख बोगनवेलिया फूलों के लिए बेहतर जाना जाता है न कि गोलियों की बौछार के बाद स्थानीय गैंगस्टर के बिखरे लाल लहू के रंग से। चूंकि घटना के कई निष्कर्ष हो सकते हैं, बेहतर होगा कि हम आगे बढ़ें और पास के सेक्टर-10 की बात करें। यहां पिछले कुछ महीनों से ली कॉर्बूजिए द्वारा डिज़ाइन सरकारी संग्रहालय और आर्ट गैलरी में एक अलग किस्म की हिंसा जारी है। गनीमत है कि यहां जंग ज़ुबानी रही—वह जगह जो कभी पंजाब के सबसे बड़े संस्कृति एवं कला विद्वान, बी.एन. गोस्वामी का अड्डा हुआ करती थी—वह नवीनीकरण योजना के कारण अब थमती नज़र आ रही है, जिसे हाल में केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय को सौंपा गया है; जिसकी लागत 30 करोड़ रुपये अनुमानित है।

जब आपके आस-पास हर तरफ़ अफ़रा-तफ़री मची हो, जिसमें ईरान के इस्फ़हान और खरग द्वीप पर हुई बमबारी भी शामिल है (ये दुनिया के दो सबसे खूबसूरत शहरों में से हैं, तुर्रा यह कि बमबारी दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र, अमेरिका द्वारा की जा रही है)—तो आप सवाल पूछ सकते हैं, क्या एक संग्रहालय मायने रखता है? या, क्या एक संस्कृति मायने रखती है? क्या तेल की कीमतों को कम रखना ज़्यादा ज़रूरी है? शायद इसीलिए कहा जा रहा है कि अमेरिकी अब खरग द्वीप पर कब्ज़ा करने पर विचार कर रहे हैं, ताकि ईरानियों पर दबाव डालकर ‘होर्मुज़ जल-डमरू’ को फिर से खोला जा सके, जिससे होकर दुनिया का एक-तिहाई तेल गुज़रता है।

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दरअसल, खरग द्वीप पर तेल-शोधन का एक विशाल संयंत्र है, जिसके माध्यम से ईरान के कुल निर्यात का 90 प्रतिशत तेल साफ किया जाता है। 13 मार्च को हुई बमबारी में, ट्रंप ने तेल सुविधाओं को बख्श दिया था। लेकिन जैसे-जैसे तेल की कीमतें बढ़ रही हैं, ऐसी अफ़वाहें हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति ईरान को जल्द घुटने टेकने पर मजबूर करने को और भी कड़े कदम उठा सकते हैं।

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केवल पांच मील लंबा होने के कारण, खरग द्वीप को एक आकर्षक विकल्प माना जा रहा है। उल्लेखनीय कि यह टापू 500 साल पुराने एक पुर्तगाली मठ का भी स्थान है—कुछ लोगों का मानना है कि इसका श्रेय 1507 में एशिया में पुर्तगाली साम्राज्य की नींव रखने वाले जनरल अल्फ़ोंसो डी अल्बुकर्क को है। गोवा को भी अल्बुकर्क ने 1510 में बीजापुर के सुल्तान से लिया था। इसके महज 16 साल बाद, 1526 में, यहीं उत्तर भारत में, फ़रगना के तैमूरी शहज़ादे ज़हीरुद्दीन मुहम्मद बाबर ने पानीपत में अपने ही एक मुस्लिम बिरादर, इब्राहिम लोदी को हराकर, जल्द ही खुद को हिंदुस्तान का बादशाह घोषित कर डाला था।

आज जब हमारे टीवी स्क्रीन पर युद्ध के विस्फोटों के दृश्य चल रहे हैं, तो साम्राज्यों के उदय और पतन और उससे जुड़ी हिंसा को समझना ज़्यादा आसान हो जाता है। पंजाब भारत के उन दो राज्यों में से एक है (दूसरा है बंगाल), जिसकी गहरी यादें विभाजन की बर्बरता से जुड़ी हैं; राजकीय संग्रहालय और कलादीर्घाएं 1947 में देश के बंटवारे का जीती-जागती गवाह हैं। दुखद है कि बंटवारे के परिणामवश हुई हिंसा में दस लाख से ज़्यादा लोग मारे गए और लगभग 1.7 करोड़ लोग एक देश से दूसरे मुल्क में विस्थापित हुए—हर चीज़, यहां तक कि सांस्कृतिक कलाकृतियाें का भी बंटवारा हुआ था। प्रकाशक पेंगुइन रैंडम हाउस ने इसी माह खुशवंत सिंह की किताब ‘ट्रेन टू पाकिस्तान’ का संस्करण पुनः जारी किया है, इसकी प्रस्तावना बेजोड़ पाकिस्तानी इतिहासकार एफ.एस. ऐजाज़ुद्दीन ने लिखी है। लाहौर संग्रहालय ने अतुलनीय गांधार मूर्तियों का 60 प्रतिशत हिस्सा अपने पास रखा, जबकि शेष हिस्सा चंडीगढ़ संग्रहालय को मिला, जिसमें 627 कलाकृतियां थीं। यहां तक कि बुद्ध के पदचिह्न, जिन्हें ‘बुद्धपाद’ कहा जाता है, तीसरी सदी की ग्रेनाइट की बनी इस कलाकृति को भी नहीं बख्शा गया। एक पदचिह्न लाहौर ने अपने पास रखा और दूसरा चंडीगढ़ को मिला।

ऊपरी मंजिल पर चलिए, मूर्ति दीर्घा की ओर, तब आपको इस खूबसूरत संग्रहालय में लगातार हो रही वह हिंसा देखने को मिलेगी जिससे मेरा अभिप्राय है। पिछले कुछ समय से छत से पानी टपक रहा है, इसलिए प्राचीन मूर्तियों को ऐसे आवरण से ढक रखा है जो पहले कहीं और इस्तेमाल की जा चुकी ‘बबल रैप शीट’ जैसा है। काम अभी भी बेतरतीब और धीरे-धीरे चल रहा है।

कई सौ साल पुरानी बोधिसत्व की खड़ी मूर्ति पर सुतली से बंधा बबल रैप शीट हटाते हुए एक परिचायक ने कहा ‘इधर देखिए,’ और साथ ही यह भी जोड़ा कि उसे प्लास्टिक की पन्नी हटाने की मनाही है, लेकिन मैं देखने की इच्छुक थी। संग्रहालय की नई व मिलनसार निदेशक, ईशा कंबोज का कहना है कि वह संग्रहालय के जीर्णोद्धार योजना को पूरा करने के लिए पूरी तरह से दृढ़-संकल्पित हैं। खुशकिस्मती से, केंद्र सरकार इस बात से वाकिफ है कि भारत का उभरता मध्यम वर्ग देश के गौरवशाली अतीत में कितनी गहरी दिलचस्पी ले रहा है—दुनिया का सबसे बड़ा संग्रहालय, ‘युगे युगीन’, नॉर्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक को दफ्तरों से खाली करने के बाद वहां आकार लेने लगा है। चंडीगढ़ संग्रहालय के लिए, ‘प्रधानमंत्री संग्रहालय’ यानी भारत के प्रधानमंत्रियों पर बना संग्रहालय, जो कभी नेहरू संग्रहालय हुआ करता था— को नमूने के तौर पर माना जा रहा है।

विभाजन के दौरान सांस्कृतिक धरोहरों का बंटवारा एक अजीब-सी ज़िद तक ही सीमित रहा—सिंधु घाटी में मिले जेड और अगेट (सुलेमानी पत्थर) से बने हार की कहानी बहुत कुख्यात है, उसको बीच से काटकर दो हिस्सों में बांट दिया गया। पाकिस्तान को उस हार के 10 जेड मनकों में 6 और पेंडेंट के 4 मनकों में 3 मिले, शेष भाग भारत के हिस्से आया।

सभ्यता की तबाही के दौर में—भला कौन 2003 में हुई मेसोपोटामिया की तबाही को भूल सकता है? प्राचीन इराक का वह पालना स्थल, जो टाइग्रिस और यूफ्रेट्स नदियों के मध्य बसा था, और जिसे अमेरिकियों ने सद्दाम हुसैन को मारने की कोशिश में तबाह कर डाला था—ठीक वैसे ही, जैसा आजकल अमेरिका और इस्राइल मिलकर ईरान के साथ कर रहे हैं; तो ऐसे में आप भारतीय और पाकिस्तानी नौकरशाही की उस अजीब-सी सूझ-बूझ के लिए ईश्वर का शुक्रिया अदा करते हैं। ‘द गार्डियन’ अखबार ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि ‘नीले शहर’ के नाम से मशहूर इस्फ़हान में, ‘चेहेल सोतून’ नाम का 20 खंभों वाला फ़ारसी शैली के मंडप वाला बगीचा, ‘अली कापू’ महल, ‘मस्जिद-ए-जामे’ के अतिरिक्त ‘नक़्श-ए-जहां’ चौक के आसपास बनी कई अन्य मस्जिदें, पिछले दो हफ़्तों की बमबारी से बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई हैं।

2021 में अफ़गानिस्तान में तालिबान पुनः वापसी होने से पूर्व, मैंने से देखा था कि काबुल संग्राहलय के विरासत की साज-संभाल करने वाले कर्मियों ने कितनी शिद्दत-मेहनत के साथ ग्रेनाइट के टूटे हुए टुकड़ों को जोड़कर बुद्ध की उन मूर्तियों को फिर से खड़ा किया था, जिन्हें 1996 में पहली बार शहर में घुसते ही तालिबानियों ने तोड़कर तबाह कर दिया था। हालांकि इस बार, तालिबान ने यह वादा किया है कि वे म्यूज़ियम के अंदर रखी किसी भी चीज़ को हाथ नहीं लगाएंगे।

शायद, एक दिन, इंसानियत की भावना ही विजयी होगी। जैसा कि सदा से होता आया है।

लेखिका ‘द ट्रिब्यून’ की प्रधान संपादक हैं।

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