मतदाता सूची में एक गलत नाम रह जाना समस्या है, लेकिन एक सही मतदाता का नाम गलती से बाहर हो जाना उससे बड़ी समस्या है। इसलिए एसआईआर में दोनों के बीच संतुलन जरूरी है। जांच कड़ी हो, लेकिन तरीका मानवीय हो। दस्तावेज मांगे जाएं, लेकिन उपलब्ध सरकारी रिकॉर्ड की भी मदद ली जाए।
मतदाता सूची को सही रखना लोकतंत्र के लिए जरूरी है। मृत लोगों के नाम हटने चाहिए। जो लोग कहीं और चले गए हैं, उनका रिकॉर्ड ठीक होना चाहिए। एक व्यक्ति का नाम दो जगह दर्ज है तो उसे भी सुधारा जाना चाहिए। विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर का उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक सही और भरोसेमंद बनाना है। लेकिन इस काम के बीच आम मतदाता इतना न उलझ जाए कि उसे अपने ही मताधिकार को लेकर चिंता होने लगे।
हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, चंडीगढ़ और दिल्ली में एसआईआर को लेकर गहमागहमी है। सभी जगह इसकी प्रक्रिया एक साथ नहीं चल रही। पुराने मतदाता रिकॉर्ड का इस्तेमाल सत्यापन के लिए किया जा रहा है। दिल्ली, हरियाणा और चंडीगढ़ में 2002 की मतदाता सूची महत्वपूर्ण है, जबकि पंजाब में 2003 की सूची को आधार बनाया जा रहा है। हिमाचल प्रदेश में यह प्रक्रिया बाद के चरण में होगी।
मुश्किल यह है कि 2002 या 2003 आज से करीब ढाई दशक पुरानी बात है। उस समय की हर जानकारी हर परिवार के पास सुरक्षित हो, यह जरूरी नहीं। इतने वर्षों में लोग घर और शहर बदल चुके हैं। कई परिवार दूसरे राज्यों में जाकर बस गए हैं। पुराने सरकारी रिकॉर्ड में नाम की वर्तनी, उम्र या पते में अंतर भी हो सकता है। ऐसे में पुराने और मौजूदा रिकॉर्ड का पूरी तरह मेल न खाना अपने आप में किसी मतदाता को गलत साबित नहीं करता।
दिल्ली में करीब 33 लाख मतदाताओं के रिकॉर्ड में विसंगतियां सामने आई हैं। इनमें करीब 14 लाख मतदाताओं का विवरण 2002 की एसआईआर सूची से नहीं जुड़ पाया, जबकि करीब 19 लाख मामलों में अन्य विसंगतियां मिली हैं। इनमें मौजूदा और पुराने रिकॉर्ड में नाम की वर्तनी अलग होने जैसे मामले भी शामिल हैं। इन मतदाताओं को अपनी पात्रता स्पष्ट करने का अवसर दिया जाएगा।
पंजाब के पूर्व राजनयिक नवदीप सूरी का मामला इस परेशानी को समझने का एक उदाहरण है। वर्ष 2003 में वह भारत में नहीं थे, बल्कि लंदन स्थित भारतीय उच्चायोग में तैनात थे। पंजाब में एसआईआर के दौरान उनका मौजूदा विवरण 2003 के पुराने मतदाता रिकॉर्ड से नहीं मिल पाया। उन्हें दस्तावेज प्रस्तुत करने का नोटिस मिला। हालांकि उनका नाम मतदाता सूची से हटाया नहीं गया था। बाद में यह मामला सुलझ गया। फिर भी सवाल महत्वपूर्ण है। जो व्यक्ति उस समय देश में ही नहीं था, उससे उस समय की मतदाता सूची में अपने नाम का मिलान कैसे कराया जाए? प्रक्रिया में ऐसी परिस्थितियों के लिए स्पष्ट और आसान रास्ता होना चाहिए।
यह परेशानी केवल किसी पूर्व राजनयिक की नहीं है। देश में लाखों लोग नौकरी, कारोबार या दूसरे कारणों से वर्षों तक एक जगह से दूसरी जगह जाते रहे हैं। कई परिवारों ने पुराने घर छोड़ दिए। कई लोग दूसरे राज्यों में बस गए। ऐसे में करीब 24 साल पुराने रिकॉर्ड को आज की पहचान से जोड़ना हमेशा आसान नहीं हो सकता।
सरकारी रिकॉर्ड में भी गलतियां हो सकती हैं। नाम की वर्तनी बदल सकती है। पते में अंतर हो सकता है। इसलिए जहां नागरिक की जिम्मेदारी है कि वह अपनी जानकारी सही दे और जरूरत पड़ने पर उपलब्ध दस्तावेज प्रस्तुत करे, वहीं सरकारी तंत्र की जिम्मेदारी भी है कि वह अपने पास मौजूद रिकॉर्ड से तथ्यों की पुष्टि करे।
एसआईआर का विरोध करना समाधान नहीं है। साफ और सही मतदाता सूची हर चुनाव की पहली जरूरत है। लेकिन सही सूची बनाने का अर्थ यह भी है कि कोई पात्र मतदाता केवल इसलिए बाहर न रह जाए क्योंकि 2002 या 2003 के रिकॉर्ड में उसका नाम नहीं मिला या उसकी जानकारी में मामूली अंतर था। नागरिकों को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए। अपना नाम मतदाता सूची में जांचना चाहिए। कोई गलती या कमी हो तो तय समय में दावा या आपत्ति दर्ज करनी चाहिए। लेकिन प्रशासन को भी यह प्रक्रिया इतनी सरल रखनी होगी कि आम आदमी उसे आसानी से समझ सके और पूरा कर सके। पुराने रिकॉर्ड की जानकारी न होने को केवल नागरिक की गलती मान लेना उचित नहीं होगा।
मतदाता सूची में एक गलत नाम रह जाना समस्या है, लेकिन एक सही मतदाता का नाम गलती से बाहर हो जाना उससे बड़ी समस्या है। इसलिए एसआईआर में दोनों के बीच संतुलन जरूरी है। जांच कड़ी हो, लेकिन तरीका मानवीय हो। दस्तावेज मांगे जाएं, लेकिन उपलब्ध सरकारी रिकॉर्ड की भी मदद ली जाए। लोकतंत्र में मतदाता किसी फाइल का एक नंबर नहीं है। वह उस व्यवस्था का केंद्र है। उसके वोट से सरकार बनती है और उसकी भागीदारी से लोकतंत्र मजबूत होता है। इसलिए मतदाता सूची को साफ करने की कोशिश में यह ध्यान रखना होगा कि कागजों की कमी या पुराने रिकॉर्ड की विसंगति के बीच असली मतदाता कहीं पीछे न छूट जाए।
एसआईआर की असली सफलता केवल नामों की छंटाई में नहीं, बल्कि इस भरोसे में होगी कि सही मतदाता का नाम सुरक्षित है। पुराने कागज जांच का आधार हो सकते हैं, लेकिन नागरिक का मताधिकार उनसे बड़ा है।

