किसी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति आर्थिक समृद्धि के बजाय उसके चरित्र, सामाजिक संवेदना, नैतिकता और नागरिक चेतना में निहित है। यही वह क्षेत्र है, जहां विवेकानंद आज भी हमारे सामने एक आईना रखते हैं।
इतिहास में कुछ क्षण ऐसे होते हैं, जो केवल इतिहास नहीं बनते, बल्कि इतिहास की दिशा ही बदल देते हैं। 11 सितंबर, 1893 को अमेरिका के शिकागो में आयोजित विश्व धर्म महासभा में स्वामी विवेकानंद का संबोधन ऐसा ही एक कालजयी क्षण था। आज 133 वर्ष बाद भी उस आवाज़ की गूंज इसलिए सुनाई देती है, क्योंकि वह किसी एक धर्म, देश या काल की आवाज़ नहीं थी, बल्कि समूची मानवता के लिए एकता, सहिष्णुता, आत्मविश्वास और आध्यात्मिक उदात्तता का उद्घोष थी। जब युवा संन्यासी ने अपने संबोधन की शुरुआत ‘मेरे अमेरिकी भाइयों और बहनों’ कहकर की, तो सभागार में देर तक गूंजती तालियों ने स्पष्ट कर दिया कि आत्मीयता की भाषा किसी अनुवाद की मोहताज नहीं होती। उस क्षण भारत अपनी हजारों वर्ष पुरानी सांस्कृतिक चेतना के साथ विश्व के सामने उपस्थित था।
विवेकानंद का शिकागो भाषण इसलिए असाधारण नहीं था कि उन्होंने हिंदू धर्म की श्रेष्ठता का दावा किया, बल्कि इसलिए कि उन्होंने धर्म को संकीर्ण पहचान की दीवारों से बाहर निकालकर मानव-कल्याण और सार्वभौमिक बंधुत्व के धरातल पर प्रतिष्ठित किया। उन्होंने भारत की उस आध्यात्मिक परंपरा को सामने रखा, जो विविधता को संघर्ष नहीं, सह-अस्तित्व का आधार मानती है। उनका संदेश स्पष्ट था कि मनुष्य की अंतिम मंजिल सत्य, करुणा और आत्मबोध ही है।
आज जब दुनिया धार्मिक कट्टरता, युद्ध, असहिष्णुता और पहचान के संघर्षों से जूझ रही है, तब विवेकानंद का यह दृष्टिकोण और भी प्रासंगिक हो उठता है। 12 जनवरी 1863 को कोलकाता में नरेंद्रनाथ दत्त के रूप में जन्मे विवेकानंद का जीवन असाधारण जिज्ञासा, संघर्ष और आत्मान्वेषण की यात्रा था। श्रीरामकृष्ण परमहंस के सान्निध्य ने उनकी चेतना को नई दिशा दी और आगे चलकर यही नरेंद्रनाथ विश्व के लिए स्वामी विवेकानंद बन गए। उन्होंने भारत को केवल उसके अतीत के गौरव में नहीं देखा, बल्कि उसके भविष्य की संभावनाओं को भी पहचाना। वे जानते थे कि जिस देश की आत्मा जागृत हो जाए, उसे लंबे समय तक पराधीन नहीं रखा जा सकता। इसलिए उनका सबसे बड़ा आह्वान था भारतीयों, विशेषकर युवाओं को अपनी अंतर्निहित शक्ति का बोध कराना।
विवेकानंद के लिए युवा राष्ट्र की सबसे बड़ी परिवर्तनकारी शक्ति था। वे चाहते थे कि युवा भय, हीनभावना और निष्क्रियता से बाहर आएं। उनका विश्वास था कि मनुष्य की सबसे बड़ी पराजय बाहरी परिस्थितियों से नहीं, स्वयं पर अविश्वास से होती है। इसलिए उन्होंने आत्मबल को राष्ट्र निर्माण की पहली शर्त माना। उनका प्रसिद्ध आह्वान ‘उठो, जागो और तब तक मत रुको, जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए’ आज भी केवल प्रेरक वाक्य नहीं, बल्कि कर्म और संकल्प का घोष है। उनकी दृष्टि में शिक्षा का अर्थ केवल डिग्री प्राप्त करना नहीं था। शिक्षा वह शक्ति है, जो व्यक्ति में चरित्र, विवेक, आत्मविश्वास और जिम्मेदारी पैदा करे। वे ऐसे मनुष्य का निर्माण चाहते थे, जो अपने पैरों पर खड़ा हो सके, कठिन परिस्थितियों का सामना कर सके और दूसरों के जीवन में भी प्रकाश ला सके।
विवेकानंद के लिए राष्ट्र निर्माण का अर्थ था गरीब, वंचित और कमजोर व्यक्ति को सम्मानजनक जीवन देना, शिक्षा को समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना और युवाओं में सेवा तथा त्याग की भावना पैदा करना। विवेकानंद के चिंतन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष था आध्यात्मिकता और सेवा का समन्वय। वे उस आध्यात्मिकता के समर्थक नहीं थे, जो मनुष्य को समाज से काट दे। उनके लिए दरिद्र, पीड़ित और वंचित मनुष्य की सेवा ही ईश्वर की सच्ची आराधना थी। यही विचार आगे चलकर रामकृष्ण मिशन की सेवा-परंपरा का आधार बना। 1 मई, 1897 को स्थापित रामकृष्ण मिशन ने शिक्षा, चिकित्सा, राहत और सामाजिक सेवा के माध्यम से उनके विचारों को व्यवहार में उतारा। 9 दिसंबर, 1898 को बेलूर मठ की स्थापना ने इस आध्यात्मिक-सामाजिक आंदोलन को स्थायी केंद्र प्रदान किया।
शिकागो के मंच पर विवेकानंद ने भारत को विश्व को देने वाली जीवंत संस्कृति के रूप में प्रस्तुत किया। उनके भाषण ने पश्चिमी दुनिया का ध्यान भारतीय दर्शन, वेदांत, योग और आध्यात्मिक चिंतन की ओर आकर्षित किया। इससे भी महत्वपूर्ण यह था कि उन्होंने भारतवासियों के भीतर आत्मगौरव जगाया। औपनिवेशिक शासन के दौर में जब भारतीय समाज के एक बड़े हिस्से में हीनभावना गहरी थी, तब विदेश की धरती से एक भारतीय संन्यासी की निर्भीक आवाज़ ने बताया कि भारत के पास विश्व को देने के लिए बहुत कुछ है। आज का भारत आर्थिक विकास, विज्ञान, तकनीक, स्टार्टअप, अंतरिक्ष और डिजिटल परिवर्तन के क्षेत्र में नई ऊंचाइयां छू रहा है, लेकिन किसी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति आर्थिक समृद्धि के बजाय उसके चरित्र, सामाजिक संवेदना, नैतिकता और नागरिक चेतना में निहित है। यही वह क्षेत्र है, जहां विवेकानंद आज भी हमारे सामने एक आईना रखते हैं।
आज के प्रतिस्पर्धी और तनावपूर्ण वातावरण में विवेकानंद का संदेश युवाओं के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। वे सफलता से पहले चरित्र की बात करते हैं, अधिकार से पहले कर्तव्य की, आत्मविश्वास के साथ आत्मानुशासन की और व्यक्तिगत उपलब्धि के साथ सामाजिक जिम्मेदारी की। उनका संदेश यह नहीं कि कठिनाइयां समाप्त हो जाएंगी, बल्कि यह है कि मनुष्य को इतना शक्तिशाली बनना चाहिए कि वह कठिनाइयों के सामने झुकने के बजाय उनसे संघर्ष करना सीखे।
आज शिकागो से उठी वह आवाज़ पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है। वह आवाज़ हमें पुकार रही है कि अपने भीतर झांको, भय को परास्त करो, चरित्र गढ़ो, सेवा को जीवन का उद्देश्य बनाओ और अपनी शक्ति को मानवता के कल्याण में लगा दो।

