कच्चे तेल का अर्थशास्त्र

तेल से अर्जित रकम का कीजिए सदुपयोग

तेल से अर्जित रकम का कीजिए सदुपयोग

भरत झुनझुनवाला

भरत झुनझुनवाला

जनता तेल के बढ़ते दामों को लेकर परेशान है। बीते चार वर्षों में विश्व बाजार में कच्चे ईंधन तेल का दाम लगभग 40 से 70 डालर प्रति बैरल रहा था। इस सम्पूर्ण अवधि में भारत में पेट्रोल का दाम लगभग 70 से 75 रुपये प्रति लीटर रहा था। वर्तमान में विश्व बाजार में कच्चे तेल का दाम 65 डालर प्रति बैरल है। इसलिए आशा की जाती थी कि भारत में पेट्रोल का दाम भी लगभग 70 से 75 रुपये प्रति लीटर ही रहेगा। लेकिन अपने देश में पेट्रोल का दाम 90 से 100 रुपये प्रति लीटर हो गया है जो कि प्रथम दृष्टया अनुचित दिखता है।

वर्तमान में तेल के ऊंचे दाम को समझने के लिए कोविड के प्रभाव को समझना होगा। बीते वर्ष जून के माह में कोविड संकट के कारण तमाम देशों ने लाॅकडाउन लगा दिए थे, जिससे यातायात और उद्योग ठप हो गये थे और विश्व बाजार में कच्चे तेल की मांग काफी गिर गयी थी। यहां तक कि कई तेल कम्पनियों ने जिस तेल को जहाज़ों पर भर रखा था, उसे वे शून्य मूल्य पर भी बेचने को तैयार थे, ताकि जहाज को खाली किया जा सके और जहाज को खड़े रखने का डैमरेज न पड़े।

उस समय अपने देश में भी आयातित कच्चे तेल का दाम कुछ कम हुआ था। बताते चलें कि कुछ तेल का आयात तत्काल बाजार भाव पर किया जाता है लेकिन अधिकतर तेल का आयात लम्बी अवधि के समझौतों के अंतर्गत किया जाता है, जिसके अंतर्गत आयात किये गये तेल का मूल्य तात्कालिक बाजार भाव से प्रभावित नहीं होता। इसलिए यदि बाजार में तेल का भाव शून्य हो गया तो इसका अर्थ यह नहीं है कि शून्य मूल्य पर भारत मनचाही मात्रा का तेल खरीद सके। यदि भारत कुछ तेल शून्य मूल्य पर खरीदता भी है तो भी लम्बी अवधि के समझौतों के अंतर्गत पूर्व में निर्धारित मूल्यों पर तेल को खरीदते रहना पड़ेगा। फिर भी बीते वर्ष कोविड संकट के समय भारत द्वारा खरीदे गये तेल के मूल्य में गिरावट आई थी। उस समय भारत सरकार ने तेल पर वसूल की जाने वाली एक्साइज डयूटी को बढ़ा दिया।

जैसे यदि कच्चे तेल का दाम 10 रुपये कम हुआ तो सरकार ने उसी 10 रुपये को तेल पर टैक्स के रूप में बढ़ा दिया। फलस्वरूप जब विश्व बजार में तेल के दाम गिर रहे थे तो भारत में तेल के दाम में गिरावट नहीं आई और तेल का दाम पूर्ववत 70 से 75 रुपये प्रति लीटर बना रहा। लेकिन बीते तीन माह में विश्व बाजार में तेल के दाम पुनः बढ़ने लगे और आज ये पुराने 65 रुपये प्रति बैरल पर आ गये हैं। लेकिन सरकार ने इस अवधि में तेल पर वसूल किये जाने वाले टैक्स में कटौती नहीं की और टैक्स की ऊंची दर को बरकरार रखा, जिस कारण आज अपने देश में पेट्रोल का दाम 90 से 100 रुपया प्रति लीटर हो गया है।

तेल के ऊंचे दाम का प्रभाव मुख्यतः ऊपरी वर्ग पर पड़ता है। अपने देश में तेल के मूल्य का ऊपरी और कमजोर वर्गों पर अलग-अलग प्रभाव के आंकड़े उपलब्ध नहीं हुए लेकिन अध्ययन के अनुसार यानी ऊपरी वर्ग पर तेल के बढ़े हुए मूल्यों का सोलह गुना प्रभाव अधिक पड़ता है। यह कहना उचित होगा कि तेल के ऊंचे मूल्यों का विरोध करने के लिए ऊपरी वर्ग द्वारा निचले वर्ग को ढाल के रूप में उपयोग किया जा रहा है।

तेल के ऊंचे मूल्य का दूसरा लाभ यह है कि देश में तेल की खपत कम होगी। एक अध्ययन में पाया गया कि तेल के दाम में यदि 10 प्रतिशत की वृद्धि होती है तो खपत में 0.4 प्रतिशत की ही मामूली गिरावट आती है। यद्यपि खपत में यह गिरावट कम ही है, फिर भी इसे नजरअन्दाज़ नहीं किया जा सकता। लम्बे समय में यह गिरावट अधिक होगी। तेल की खपत कम होने से हमारे आयात कम होंगे और हमारी आर्थिक सम्प्रभुता सुरक्षित रहेगी। ज्ञात हो कि अपने देश में खपत किये गये तेल में 85 प्रतिशत तेल का आयात होता है।

तेल के ऊंचे मूल्यों का तीसरा लाभ पर्यावरण का है। खपत कम होने से तेल से उत्सर्जित कार्बन की मात्रा कम होगी, जिससे धरती के तापमान में वृद्धि कम होगी और अपने देश समेत सम्पूर्ण विश्व में बाढ़ और सूखे जैसी आपदाएं कम होंगी। चौथा और संभवतः प्रमुख लाभ यह है कि कोविड संकट के दौरान सरकार का वित्तीय घाटा बहुत बढ़ गया है। इसलिए सरकार को जनता पर टैक्स लगा कर इस घाटे की पूर्ति तो करनी ही पड़ेगी। प्रश्न सिर्फ यह बचता है कि सरकार तेल पर टैक्स लगाकर अपने घाटे की भरपाई करेगी या फिर कपड़े और कागज पर लगाकर। असल में कपड़े और कागज जैसी आवश्यक एवं उपयोगी वस्तुओं के स्थान पर तेल पर अधिक टैक्स वसूल करना ही उचित होगा। विशेषकर इसलिए कि तेल पर टैक्स वसूल करने का बोझ आम आदमी पर कम और समृद्ध वर्ग पर ज्यादा पड़ेगा।

तेल के ऊंचे मूल्य सही हों तो भी सरकार की आलोचना इस बिंदु पर की जानी चाहिए कि तेल के ऊंचे दामों से अर्जित रकम का उपयोग तेल की खपत को और कम करने के लिए किया जाए। सार्वजनिक यातायात जैसे बसों, मेट्रो आदि में सुधार किया जाए, जिससे कि आने वाले समय में हम तेल की खपत को और भी कम कर सकें। तेल से अर्जित रकम का उपयोग सरकारी खपत को पोषित करने के स्थान पर निवेश के लिए किया जाए तो तेल के ऊंचे दाम अन्तत: देश के लिए लाभकारी होंगे।

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