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ट्रेड डील पर अमेरिकी किसान लॉबी का दबाव

अब अमेरिकी किसान भारत में हुए टैरिफ डील से थोड़ी राहत महसूस कर रहे हैं। इस साल अमेरिका में मध्यावधि चुनाव है, किसानों का ग़ुस्सा शांत नहीं हुआ तो ट्रंप के सारे किये-कराये पर पानी फिर जायेगा। दिसंबर, 2025 के...

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अब अमेरिकी किसान भारत में हुए टैरिफ डील से थोड़ी राहत महसूस कर रहे हैं। इस साल अमेरिका में मध्यावधि चुनाव है, किसानों का ग़ुस्सा शांत नहीं हुआ तो ट्रंप के सारे किये-कराये पर पानी फिर जायेगा।

दिसंबर, 2025 के पहले हफ्ते की खबर जिन्हें याद नहीं, वो दोबारा से उसका स्मरण कर लें, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अमेरिका-चीन व्यापार तनाव में फंसे किसानों की सहायता के लिए लंबे समय से प्रतीक्षित 12 अरब अमेरिकी डॉलर के कृषि सहायता पैकेज की घोषणा की थी। इलिनोइस के सोयाबीन किसान जॉन बार्टमैन ने कहा था, कि यह सहायता ‘ऊंट के मुंह में जीरा’ के समान है। लेकिन, अब अमेरिकी किसान भारत में हुए टैरिफ डील से थोड़ी राहत महसूस कर रहे हैं। इस साल अमेरिका में मध्यावधि चुनाव है, किसानों का ग़ुस्सा शांत नहीं हुआ, तो सारे किये-कराये पर पानी फिर जायेगा। यह महत्वपूर्ण चुनाव अभी 10 महीने दूर है, और असली प्रचार अभियान अगले महीने शुरू होगा, जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अपना संबोधन देंगे।

मिडटर्म चुनाव नवंबर में राष्ट्रपति के कार्यकाल के बीच में होते हैं, और इनका नतीजा आमतौर पर यह होता है कि राष्ट्रपति की पार्टी अमेरिकी कांग्रेस में अपनी पकड़ खो देती है। पिछले 23 मिडटर्म चुनावों में, राष्ट्रपति की पार्टी ने हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में औसतन 27 सीटें और सीनेट में तीन सीटें गंवाई हैं। सिर्फ़ दो बार ही राष्ट्रपति की पार्टी दोनों सदनों में सीटें जीत पाई है।

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इसके दो कारण होते हैं। पहला, जो पार्टी सत्ता में नहीं होती इस मामले में, डेमोक्रेटिक पार्टी और उसके समर्थक आमतौर पर ज़्यादा वोटिंग करवाने के लिए मोटिवेटेड होते हैं। दूसरा, राष्ट्रपति की अप्रूवल रेटिंग आमतौर पर ओवल ऑफिस के पहले दो वर्षों में कम हो जाती है, जैसा कि ट्रंप के साथ हुआ है, जो स्विंग वोटर्स और निराश वोटर्स को प्रभावित कर सकता है।

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वाशिंगटन डीसी स्थित कैपिटल ग्रुप के पोलिटिकल इकोनॉमिस्ट, मैट मिलर बताते हैं, ‘रिपब्लिकन अभी सीनेट और हाउस दोनों पर बहुत कम अंतर से कंट्रोल रखते हैं। किसी भी सदन को खोने से अगले दो सालों में रिपब्लिकन द्वारा लाए गए किसी भी बड़े कानून को पास करने का कोई भी मौका खत्म हो जाएगा, और यह ट्रंप को उनके बाकी कार्यकाल के लिए डिफेंसिव मोड में डाल देगा।’ ‘कैपिटल ग्रुप’ का काम वित्तीय परामर्श सेवाएं प्रदान करना है। उसके पास विगत 90 वर्षों का डाटा उपलब्ध है।

भारत और चीन की तरह, अमेरिका भी कृषि प्रधान देश है। इस वजह से कृषि पैदावारों के निर्यात ने एक ताक़तवर किसान लॉबी खड़ी कर दी है। पिछले तीन दशकों में संयुक्त राज्य अमेरिका में कृषि भूमि के उपयोग में विविधता आई है, लेकिन मक्का, सोयाबीन, घास, गेहूं, कपास, ज्वार, जौ और चावल का दबदबा बाज़ार में बरक़रार है। सोयाबीन, अमेरिका का नंबर वन कृषि उत्पाद है, जिसकी पैदावार 119.05 मिलियन मीट्रिक टन बताते हैं। लेकिन हाल ही में ब्राजील ने लगभग 123.6 मिलियन टन उत्पादन के साथ अमेरिका को पीछे छोड़ दिया है। उसकी वजह ट्रम्प की नीतियां रही हैं। अमेरिका, 53.85 मिलियन मीट्रिक टन गेहूं का उत्पादन करता है, जो दुनिया भर में चौथे स्थान पर है। संयुक्त राज्य अमेरिका एक ग्लोबल एग्रीकल्चरल पावरहाउस है, जो बड़ी मात्रा में फसलें और पशुधन पैदा करने के लिए एडवांस्ड मशीनीकृत खेती का इस्तेमाल करता है। अमेरिकी कृषि क्षेत्र की खासियत ज़्यादा पैदावार है, जिसमें कई तरह के फल और सब्जियां भी शामिल हैं।

मक्का और सोयाबीन अमेरिका की दो सबसे बड़ी फसलें, और खेती की रीढ़ हैं। विगत डेढ़ वर्षों से इन दो फसलों को उगाने वाले किसानों को कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। मौसम में बदलाव, बढ़ते ऑपरेटिंग खर्च और कम अंतरराष्ट्रीय मांग, जो काफी हद तक टैरिफ के रूप में सरकारी नीति के कारण हैं, ने एक मुश्किल हालात पैदा कर दिए हैं। ट्रम्प प्रशासन संख्या नहीं बताता, मगर स्वीकार करता है, कि अमेरिकी किसानों में आत्महत्या की दर राष्ट्रीय स्तर से 3.5 गुना बढ़ी है।

वर्ष 2023-24 में, चीन ने 13.2 अरब डॉलर के 24.9 मिलियन मीट्रिक टन सोयाबीन अमेरिका से खरीदा था, जिनका इस्तेमाल मुख्य रूप से अपने 427 मिलियन सूअरों के झुंड को खिलाने के लिए किया गया। अमेरिकी किसानों का दूसरा सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय सोयाबीन बाज़ार, मेक्सिको है। 2017 में ट्रम्प ने पहली बार टैरिफ लगाए थे, तब से फसल किसान सोयाबीन और मक्का निर्यात के लिए महत्वपूर्ण चीनी बाज़ार में गिरावट से जूझ रहे हैं।

एग्रो इकोनॉमिक्स की समझ रखने वाले ब्रायन हार्बेज बोलते हैं, ‘पिछले महीने रिपोर्ट आई कि सोयाबीन का निर्यात 20 साल के निचले स्तर पर पहुंच गया है। यह अमेरिकी किसानों के लिए बहुत बुरा है। अगर हम निर्यात नहीं कर सकते, तो स्टोरेज एक बड़ी समस्या है, हमारी फसल भी खराब होती है। यह दोहरी मार है। वित्तीय चुनौतियों के बावजूद, कई लोग अमेरिकी राष्ट्रवाद के नाम पर अभी भी ट्रंप का समर्थन कर रहे हैं।’

हालांकि, चीन ने 2034 तक अपने घरेलू सोयाबीन उत्पादन को 38 प्रतिशत बढ़ाने का वादा किया है। यह सूचना अमेरिकी सोयाबीन उत्पादकों के लिए सुखद नहीं है। इसलिए, भारत जैसे वैकल्पिक बाज़ार की तलाश में ट्रम्प प्रशासन लग चुका है। भारत में लगभग 13.05 मिलियन टन सोयाबीन का उत्पादन होता है, जिसमें से आधे से ज़्यादा उत्पादन अकेले मध्य प्रदेश में होता है। भारत में मक्के का उत्पादन लगभग 42 मिलियन टन है, जिसका 20 प्रतिशत फ्यूल-ग्रेड इथेनॉल बनाने में इस्तेमाल होता है। देश मक्के के उत्पादन में आत्मनिर्भर है, लेकिन खाने के तेल के लिए प्रोसेसिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी के कारण खाना पकाने के लिए सोया तेल आयात करता है।

सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अनुसार, ‘मौजूदा ऑयल ईयर 2025 -26 के लिए कुल सोयाबीन की उपलब्धता 110.02 लाख टन होने का अनुमान है, जबकि 2024-25 में 134.76 लाख टन थी।’ चुनांचे, कोई 6 लाख मीट्रिक टन सोयाबीन के आयात की ज़रूरत भारत को पड़ेगी। भारत मुख्य रूप से अर्जेंटीना और ब्राजील से सोयाबीन तेल इंपोर्ट करता है। इसके अलावा रशियन फेडरेशन, पैराग्वे और यूक्रेन से भी सोया आयल इंपोर्ट किया जाता है। भारत सोयाबीन के बीज इथियोपिया, बेनिन, टोगो, मोज़ाम्बिक और जिबूती से आयात करता है। तो क्या अब सोया आयात का बड़ा हिस्सा अमेरिका से हुआ करेगा?

सब्सिडी के मामले में हमारे किसान कहीं से अमेरिकी व यूरोपीय किसानों का मुकाबला नहीं कर सकते। उन्हें डर है कि कुछ ही वर्षों में ये पूरा कृषि बाज़ार हथिया लेंगे। भारत में एक किसान आमतौर पर 1 एकड़ ज़मीन में लगभग 1 मीट्रिक टन सोयाबीन पैदा करता है। लेकिन उतनी ही ज़मीन पर जीएम सोयाबीन की पैदावार 3 मीट्रिक टन तक हो सकती है। भारतीय किसानों के लिए जीएम (जेनेटिकली मॉडिफाइड) फसलें एक अलग चिंता का सबब है।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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