चुनाव आयोग की चूक

नुकसान के बाद भरपाई की असफल कोशिश

नुकसान के बाद भरपाई की असफल कोशिश

लक्ष्मीकांता चावला

लक्ष्मीकांता चावला

पूरा देश यह महसूस तो कर रहा था कि राजनेताओं की चुनावी रैलियां, जलसे और अनेक भागों में राजनीतिक पार्टियों द्वारा जो बड़े-बड़े जुलूस-जलसे किए जा रहे हैं, वे कोरोना महामारी फैलाने का एक बड़ा कारण बन रहे हैं। देश के पांच राज्यों में जो चुनाव हुए वहां उन सभी नियमों की धज्जियां उड़ाई गईं, जो नियम कोरोना रोकने के लिए स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने बनाए थे। अफसोस देश के शासक भी और नेता भी उन कानूनों की उल्लंघना करते रहे, जिनका पालन न करने के लिए आमजन को लाठी-डंडों से पिटाई, मोटा जुर्माना सहना पड़ा और कहीं-कहीं तो जीवन से भी हाथ धोना पड़ा।

देर से ही सही, अब मद्रास हाईकोर्ट के दो न्यायाधीशों की पीठ ने अन्नाद्रमुक प्रत्याशी विजय भास्कर की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए चुनाव आयोग की तीखी आलोचना की। उसने यह टिप्पणी की है कि देश में कोरोना महामारी की दूसरी लहर के लिए सिर्फ चुनाव आयोग ही जिम्मेवार है। हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग को सबसे गैर जिम्मेदार संस्था करार देते हुए कहा कि आयोग के अधिकारियों के खिलाफ हत्या के आरोपों में भी मामला दर्ज किया जा सकता है। अदालत ने मौखिक चेतावनी दी कि वह 2 मई को मतगणना रोकने से भी नहीं हिचकिचाएगी।

इस टिप्पणी से देश के करोड़ों लोगों को यह अहसास हुआ कि कोई तो इस देश में ऐसी संवेदनशील संस्था और व्यक्ति हैं जो देशवासियों की उस पीड़ा को महसूस कर सके हैं जो कोरोना महामारी से हो रही मौतों और श्मशान घाट में भी मरने वालों के सम्मानजनक अंतिम संस्कार न होने के दर्द की आवाज बन सके हैं।

मद्रास हाईकोर्ट की इस तीखी टिप्पणी के बाद चुनाव आयोग ने यह घोषणा कर दी है कि 2 मई को सभी पांच प्रांतों में चुनाव परिणाम के पश्चात कोई भी विजय जुलूस नहीं निकाला जाएगा। यह तो ऐसे ही है जैसे सांप निकलने के बाद लकीर पीटना। 2 मई तक चुनाव वाले पांचों प्रांतों में महामारी का प्रकोप बहुत बढ़ चुका होगा। तमिलनाडु व बंगाल में रोगियों की बढ़ती संख्या चिंताजनक है। प्रश्न यह है कि विजय जुलूस रोकने के आदेश जो चुनाव आयोग ने दिए हैं, वे उस समय क्यों नहीं दिए गए जब देश के बड़े-बड़े नेता लाखों लोगों की भीड़ इकट्ठी करके चुनावी रैलियां कर रहे थे। सोशल डिस्टेंसिंग, मास्क आदि की बात तो दूर, भीड़ ने कोरोना फैलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

सच यह है कि राजनेताओं द्वारा आयोजित रैलियों को छोड़कर शेष सब लोग कड़ाई का शिकार होते रहे। जीवन भर यह नहीं भूला जा सकता कि तमिलनाडु के तूतीकोरम में इस कड़ाई के नाम पर पिता-पुत्र पुलिस द्वारा लाश बना दिए गए। यह अन्यायपूर्ण दुखद घटना तमिलनाडु के न्यायालय में न्याय के लिए प्रतीक्षा कर रही है। प्रश्न यह है कि क्या चुनाव आयोग को यह विश्वास है कि जो विजयी होंगे, वे उस दिन कोई विजय जुलूस, शक्ति प्रदर्शन नहीं करेंगे? जब चुनाव से पहले ही सत्ता की दौड़ में सभी नियम तोड़ दिए गए तो विजयी कैसे जुलूस निकालने से परहेज करेगा। सत्तापतियों के लिए तो कोई कानून अपने देश में है नहीं। पंजाब में भी इन दिनों जनप्रतिनिधि और आम जनता के लिए सरकारी डंडा अलग हो गया है। कोई बेटे की बारात लेकर जाए, बाराती निश्चित संख्या से ज्यादा हो जाएं तो सजा-सजाया दूल्हा थाने में बंद किया जा सकता है। दूल्हे और दुल्हन के परिजनों पर भी केस बना दिए और कुछ लोग अभी कानून की पकड़ से दूर हैं। एक अन्य घटना में बहुत से बारातियों को ही गिरफ्तार कर लिया, पर उसी दिन एक नयी मेयर के पति ने कांग्रेस के नेताओं को शानदार पार्टी दी। वहां तो केवल रिजार्ट का मालिक ही गिरफ्तार किया। रिजार्ट बंद हो गया, पर सत्ता पक्ष के सभी नेता झूमते, गाते, खाते-पीते अपने आवासों में पहुंच गए।

अब जब पंजाब समेत हरियाणा, दिल्ली, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात आदि प्रांतों में जीवन-मृत्यु की लड़ाई लड़ते हुए कोरोना के मरीज केवल आक्सीजन न मिलने से मौत के मुंह में चले गए, उस स्थिति में भी देश के शासक सारे देशवासियों को एक कानून से नहीं चला पा रहे हैं। कानून व्यवस्था तो दूर की बात, आक्सीजन और दवाइयां बांटने में भी सब बराबर नहीं।

अब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने संक्रमण से निपटने के सरकारी तौर-तरीकों की तीखी आलोचना करते हुए कहा है कि सरकार मेरा रास्ता अथवा कोई रास्ता नहीं की नीति छोड़े और लोगों के सुझावों पर भी अमल करे। हाईकोर्ट ने यह भी कहा है कि आक्सीजन के अभाव में मृत्यु हो जाना अत्यंत शर्मनाक है। हाईकोर्ट ने राज्य चुनाव आयोग को नोटिस जारी करते हुए पूछा है कि पंचायत चुनाव के दौरान सरकार की गाइडलाइन्स का पालन क्यों नहीं किया गया, जिसकी वजह से चुनाव ड्यूटी कर रहे 135 लोगों की मौत का समाचार है। साथ ही यह भी पूछा कि क्यों न राज्य चुनाव आयोग के विरुद्ध आपराधिक अभियोग चलाया जाए। सीधी बात यह है कि देश की जनता जब तक मुखर होकर जनप्रतिनिधियों पर नियंत्रण नहीं करेगी, आमजन केवल कष्ट, पीड़ा और शोषण भोगने के लिए रह जाएगा।

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