आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, भारतीय शहर अपने राजस्व से सकल घरेलू उत्पाद का 0.6 प्रतिशत से भी कम प्राप्त करते हैं, जिसका अर्थ है कि शहरों का संचालन सही ढंग से नहीं हो रहा। इसमें सुव्यवस्थित योजना, स्थायी समाधानों, भागीदारी, हरित स्थानों, कुशल परिवहन, प्रौद्योगिकी के उपयोग तथा समावेशी शासन की कमी स्पष्ट झलकती है।
बजट से पूर्व संसद में पेश आर्थिक सर्वेक्षण में जिन चुनौतियों ने ध्यान खींचा, उनमें शहरों का समुचित विकास न होना भी सम्मिलित है। आर्थिक विकास का इंजन कहलाने वाले शहर, मात्र आवास न होकर एक महत्वपूर्ण आर्थिक अवसंरचना का रूप हैं। दूसरे शब्दों में इन्हें राष्ट्रीय प्रगति का द्योतक कह सकते हैं, जहां जीवन स्तर उन्नत बनाने की संकल्पना की जाती है।
तेज़ी से शहरीकरण की ओर बढ़ते भारतवर्ष की शहरी आबादी 2024 में लगभग 36.87 प्रतिशत आंकी गई। 2026 के मध्य तक बढ़कर इसके 55.5 करोड़ से अधिक होने का अनुमान है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक़, 2035 तक यह 67.5 करोड़ तक पहुंच सकती है। चीन के बाद विश्व में यह दूसरा स्थान होगा किंतु शहरी विकास का वैश्विक स्तर पर जायज़ा लें तो तुलनात्मक तौर पर भारत के अधिकतर शहर पिछड़े नज़र आएंगे।
सकल घरेलू उत्पाद में उल्लेखनीय योगदान देने के बावजूद शहरी जीवन अनेकानेक समस्याओं से घिरा है। क्षतिग्रस्त सड़कें, यत्र-तत्र फैली गंदगी में मुंह मारते आवारा पशु, बदबूदार सीवरेज लीकेज, बरसाती जलभराव से जूझते लोग; भारत के बहुतेरे शहरों में यह मंज़र आम देख सकते हैं। सरकारी स्वास्थ्य केंद्र हैं, लेकिन सुविधाएं नाममात्र। सार्वजनिक सुरक्षा की कमी, जल संकट, अनियंत्रित यातायात से संघर्ष करता जीवन पर्यावरणीय प्रदूषण की मार भी बराबर सहता है।
आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, भारतीय शहर अपने राजस्व से सकल घरेलू उत्पाद का 0.6 प्रतिशत से भी कम प्राप्त करते हैं, जिसका सीधा अर्थ है कि शहरों का संचालन सही ढंग से नहीं हो रहा। इसमें सुव्यवस्थित योजना, स्थायी समाधानों, नागरिक भागीदारी, हरित स्थानों, कुशल परिवहन, प्रौद्योगिकी के उपयोग तथा समावेशी शासन की कमी स्पष्ट झलकती है। आर्थिक-व्यापारिक गतिविधियों के केंद्र होने पर भी शहरों में कामगारों की उपलब्धता अथवा उनकी आवासीय सुविधा के प्रति विचारा नहीं जाता। आर्थिकी के केंद्र बनने के बावजूद कई शहर राजनीतिक रूप से हाशिए पर ही रहते हैं, समग्र विकास में यह एक बड़ा अवरोधक है।
दरअसल, शहरों में उत्तरदायी तथा सुव्यवस्थित शासन स्थापित करने के लिए चार शहरी प्रणालियों पर आधारित ढांचे की आवश्यकता होती है- शहरी नियोजन व डिज़ाइन, शहरी क्षमताएं और संसाधन, सशक्त तथा वैध राजनीतिक प्रतिनिधित्व एवं पारदर्शिता, जवाबदेही और नागरिक भागीदारी। किसी भी पक्ष से संबद्ध कोताही समूचे विकास को गड़बड़ा देती है, जबकि हकीक़त में हमारी क़रीब 40 प्रतिशत राज्य राजधानियों में सक्रिय मास्टर प्लॉन का अभाव देखा गया।
अनियोजित व बेतरतीब प्रगति कभी भी ऐच्छिक परिणाम नहीं ला पाती। शहरी विकास अक्सर घनी आबादी की ज़रूरतें पूरी करता है, जिसके परिणामस्वरूप विशिष्ट विकासों और बुनियादी आवास से वंचित शहरी निवासियों की महत्वपूर्ण संख्या के बीच स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। मूलभूत संरचना में केवल छिटपुट सुधारों को ही विकास का पर्याय मान लेना, शहरी समस्याओं का समूल निराकरण नहीं होने देता। कई नगरपालिकाओं और ग्राम पंचायतों, शहरा तथा राज्य के अर्धसरकारी निकायों एवं राज्य विभागों में मौजूदा स्थानिक विखंडन इन शहरों में समूह अर्थव्यवस्थाओं अथवा वायु गुणवत्ता, स्वच्छ जलापूर्ति तथा संरक्षण जैसी क्षेत्रीय चुनौतियों के उद्देश्य को पूरा नहीं कर रहा है। शहरों में सेवा वितरण और जवाबदेही में सुधार के लिए इन मुद्दों को संबोधित करना अनिवार्य हो जाता है।
भारतीय शहरों की आबादी का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा झुग्गी झोंपड़ियों में रहता है, जिससे तीव्र विकास से जुड़ी चुनौतियां अपेक्षाकृत बढ़ जाती हैं। बहुत अधिक जनसंख्या शहरीकरण का एक अस्वास्थ्यकर पहलू है जो न केवल शहरी आवास, शिक्षा, चिकित्सा सुविधाओं, मलिन बस्तियों के विकास पर प्रतिकूल असर डालता है बल्कि बेरोज़गारी, हिंसा, भीड़भाड़ आदि से संबंधित शहरी अराजकता उत्पन्न करने का सबब बन, जीवन की गुणवत्ता भी गिराता है। ट्रैफिक जाम, अतिक्रमण, प्रदूषण जैसी समस्याओं से घिरे शहरों की उत्पादकता तो प्रभावित होती ही है, साथ ही वहां निवेश की संभावना भी कम हो जाती है। असल में, भारत को दस लाख से अधिक आबादी वाले शहरों के लिए महानगरीय शासन प्रणाली की आवश्यकता है।
कुल मिलाकर, एक ऐसे बदलाव की ज़रूरत है जो शहर को शासन तथा अर्थव्यवस्था की एक अलग इकाई के रूप में मान्यता दे एवं राजनीतिक जवाबदेही का एकल बिंदु अनिवार्य करते हुए शासन, सेवा वितरण तथा उत्तरदायित्व में स्थानिक और कार्यात्मक विखंडन दूर करे।
सही अर्थों में विकसित शहर वही है जो आर्थिक रूप से सुदृढ़, पर्यावरण के प्रति जागरूक, सामाजिक रूप से समावेशी एवं अपने नागरिकों को उच्च गुणवत्ता वाला जीवन प्रदान करने वाला हो। आर्थिक सर्वेक्षण में दस लाख से अधिक आबादी वाले शहरों के लिए जो योजनाएं आरम्भ करने की ज़रूरत बताई गई, उनकी पूर्ति हेतु राज्य सरकारों को ऐसी रणनीतिक योजना बनानी होगी, जो विकास को सही दिशा दे। योजना व विकास प्रक्रियाओं में नागरिकों की राय व आवश्यकताएं शामिल करने से समाधान टिकाऊ तथा समुदाय-केंद्रित बनेंगे। शहरी स्तर पर हमें सुदृढ़ प्रणालियों तथा संस्थानों की आवश्यकता है, जो विभिन्न राज्यों और ज़िलों के संदर्भों तथा समुदायों के अनुकूल उत्तरदायी शासन प्रदान करके समृद्धि ला सकें।

