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बलिदान से उपजा देशभक्ति का अनूठा संकल्प

बलिदान से उपजा देशभक्ति का अनूठा संकल्प

अरुण नैथानी

अरुण नैथानी

चंद महीनों के वैवाहिक जीवन के बाद ही पति की शहादत एक स्त्री के लिये किसी वज्रपात से कम नहीं होती। इस अथाह दुख से उबरने में वर्षों लग जाते हैं लेकिन पुलवामा में आतंकवादियों से मुठभेड़ में शहादत देने वाले मेजर विभूति शंकर ढौंडियाल की पत्नी निकिता कौल ने छह माह बाद ही सेना में शामिल होने के लिये परीक्षा देने का संकल्प लेकर बता दिया कि आज भी भारत वीरांगनाओं की धरती है। इतने बड़े संकट के बाद ऐसा संकल्प लेकर वे आज हर भारतीय के लिये प्रेरणापुंज बनी हुई हैं। पिछले दिनों ऑफिसर्स ट्रेंनिग एकेडमी, चेन्नई से पासआउट होकर निकिता कौल सेना में लेफ्टिनेंट बनी हैं। निकिता का यह कदम जहां पति की शहादत को गरिमा देता है, वहीं राष्ट्रभक्ति के उद्दात मूल्यों को भी दर्शाता है।

दरअसल, 18 फरवरी 2019 को विभूति शंकर जैश-ए-मोहम्मद के विदेशी आतंकवादियों से संघर्ष करते हुए चार जवानों के साथ शहीद हो गये थे। इस मुठभेड़ में तीन आतंकवादी भी मारे गये थे, जिनके बारे में कहा जाता है कि वे बहुचर्चित पुलवामा हमले में शामिल थे। उनके बलिदान के लिये कृतज्ञ राष्ट्र ने उन्हें मरणोपरांत शौर्य चक्र से सम्मानित किया था। इस शहादत के छह माह बाद निकिता ने शॉर्ट सर्विस कमीशन के लिये परीक्षा दी, इंटरव्यू पास किया। जून 2020 में उनकी ट्रेनिंग शुरू हुई और पति की शहादत के 27 माह बाद वे भारतीय सेना का हिस्सा बनीं। वे कहती हैं कि ग्यारह महीनों की ट्रेनिंग में मैंने जीवन के गहरे अनुभव हासिल किये। साथ ही इस कदम को उठाने में संबल देने वाले परिवार के प्रति भी उन्होंने कृतज्ञता जाहिर की। उत्तरी कमान के कमांडर लेफ्टीनेंट जनरल वाई. के. जोशी ने चेन्नई स्थित ऑफिसर्स ट्रेनिंग एकेडमी में निकिता कौल के कंधे पर स्टार लगाये।

निकिता के संकल्प को नमन है, जिसने सेना में शामिल होने के लिये अपनी बहुराष्ट्रीय कंपनी की नौकरी छोड़ी। उन्होंने यह कदम पति की स्मृतियों को जीवंत रखने के लिये उठाया। देहरादून में पति के अंतिम संस्कार के समय वह अडिग खड़ी नजर आई और सारी रस्में धैर्य व मजबूती से निभाईं। उनकी अश्रुपूरित विदाई के दौरान सैल्यूट करने का वीडियो सोशल मीडिया में चर्चा का विषय बना था। तब उन्होंने कहा था, ‘मुझे आप पर नाज है। सभी आप से प्रेम करते हैं, लेकिन आपने जिस तरह सबसे प्रेम किया, वह सबसे भिन्न है। आपने हमारे व उन लोगों के लिये बलिदान दिया, जिनसे आप कभी मिले भी नहीं हैं। मेरे लिए गर्व की बात है कि आप मेरे पति बने। मैं जीवन की अतिंम सांस तक आपसे प्रेम करूंगी। मेरा जीवन आप से है और हमेशा मेरे साथ रहेंगे।’

यह संयोग ही है कि मेजर विभूति शंकर ढौंडियाल भी ओटीए चेन्नई से प्रशिक्षित होकर निकले थे। इस पर निकिता कहना था- मैंने ट्रेनिंग के दौरान अनुभव किया कि मैं उन्हीं सभी पड़ावों व प्रशिक्षण से गुजरी हूं, जिनसे विभूति गुजरे थे। मुझे लगा कि वे हरदम मेरी जीवन यात्रा में साथ रहे। मैं आज भी उन्हें अपने आसपास महसूस कर रही हूं। जैसे वे कह रहे हों कि निकिता तुमने गहरे अहसासों को हकीकत बना दिया।’

निस्संदेह, निकिता का यह साहसी कदम जहां पति की वीरता को जीवंत रखने का संकल्प था, वहीं देशभक्ति की अनूठी मिसाल भी। सेना की वर्दी में पति के राष्ट्रभक्ति के अहसासों को हरदम महसूस करना भी था जो उद्दात प्रेम के अहसासों का पर्याय है। दृढ़ संकल्पों को हकीकत में बदलने का जज्बा भी है। जो बताता है कि मन के संकल्प से हम अपने दुखों को राष्ट्रभक्ति के गहरे अहसासों में बदल सकते हैं। यह निजी प्रेम को राष्ट्रीय प्रेम में महसूस करने का अनुपम उदाहरण भी है।

कभी जम्मू-कश्मीर की वादियों में जीवन की शुरुआत करने वाली निकिता के परिवार को कालांतर आतंकवादियों के खौफ में घाटी छोड़नी पड़ी। परिवार को फिर दिल्ली में नये सिरे से जीवन की शुरुआत करनी पड़ी। उस दौर में बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडितों को पलायन का दंश झेलना पड़ा था। उस भय व कष्ट ने ही उन्हें भीतर से मजूबत बनाया। यही आत्मिक बल था, जिसने उन्हें पति की शहादत से उपजे संकट की घड़ी में मजबूती से खड़े रहने का आत्मबल दिया। नियति का क्रूर मजाक यह था कि जिस घाटी में आतंकवाद से बचकर उनका परिवार सुरक्षित निकल गया था, उसी घाटी में उन्हें जांबाज पति को देश के लिये खोना पड़ा।

निस्संदेह आज निकिता उन हजारों शहीदों की जीवन संगनियों के लिये प्रेरणा की मिसाल है, जो संकट के दबाव में अपना धैर्य खो देती हैं। अपने दर्द को सीने में दफन कर साहस व राष्ट्रभक्ति की जो अनूठी इबारत निकिता ने लिखी है, वह आने वाले वक्त में दुविधा के संकट से जूझती वीरांगनाओं का मार्गदर्शन करेगी। आज निकिता अपने शहीद पति के उन संकल्पों को पूरा करने को कटिबद्ध है, जिनके लिये उन्होंने सेना ज्वाइन की थी। वह चाहती तो अपनी बहुराष्ट्रीय कंपनी की नौकरी को जारी रखकर सामान्य जिंदगी जी सकती था। लेकिन उसने संघर्ष और उद्दात जीवन मूल्यों की राह चुनी। यही वजह है कि वे आज देश की लाखों बेटियों के लिये मार्गदर्शक मिसाल है कि संकट की घड़ी में जीवन के फैसले किस तरह लिये जाते हैं।

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