बढ़ती आर्थिक असमानता के खतरे समझें

बढ़ती आर्थिक असमानता के खतरे समझें

विश्वनाथ सचदेव

‘वर्ल्ड इकानॉमिक फोरम’ के दावोस सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दुनियाभर के उद्यमियों को भारत में आकर व्यवसाय करने की दावत दी है। उन्होंने इस बात को रेखांकित किया कि भारत आर्थिक विकास की दिशा में तेज़ी से बढ़ रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत दुनिया को आशा का एक सुंदर गुलदस्ता दे रहा है। इसमें हम भारतीयों की जनतंत्र में अटूट आस्था है, 21वीं सदी को सशक्त बनाने वाली तकनीक है और हमारी वह प्रतिभा और स्वभाव है जो दुनिया को प्रेरणा दे सकता है। आज़ादी के अमृत महोत्सवी वर्ष में दुनिया को भारत का यह संदेश निश्चित रूप से भरोसा दिलाने वाला है और हम भारतीयों को भी इस बात का अहसास कराने वाला है कि ‘अच्छे दिन’ कहीं आस-पास ही हैं।

इन पिछले 75 सालों में जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में हमने बहुत कुछ अर्जित किया है, जिस पर हम गर्व कर सकते हैं। दुनिया को उम्मीद का जो गुलदस्ता देने की बात प्रधानमंत्री ने दावोस सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए की है, वह गुलदस्ता हम भारतीयों के लिए भी है। इस बारे में दुनिया के देश क्या सोच रहे हैं, क्या कह रहे हैं यह तो आने वाला कल ही बताएगा, पर वर्ल्ड इकानॉमिक फोरम के इसी सम्मेलन में ‘आक्सफेम’ की एक रिपोर्ट भी सामने आयी है, जिस पर हम भारतीयों को विशेष रूप से ध्यान देना चाहिए। इस रिपोर्ट में कुछ आंकड़े हैं जिनका हमारे जीवन से सीधा रिश्ता है। ये आंकड़े हमारी गरीबी के संबंध में हैं। ‘आक्सफेम’ द्वारा जारी की गयी इस रिपोर्ट के अनुसार मार्च 2020 से लेकर नवंबर 2021 तक की अवधि में भारत में साढ़े चार करोड़ से अधिक लोग ‘अति गरीबी’ की स्थिति में पहुंच गये हैं। पूरी दुनिया में जितने लोग गरीबी की इस स्थिति में हैं उसकी आधी संख्या है यह। इसमें कोई संदेह नहीं कि यह अवधि कोरोना-काल की है, जिसमें सारी दुनिया ने आर्थिक मार को झेला है, लेकिन हमारी स्थिति अधिकांश देशों की तुलना में कहीं अधिक चिंताजनक है। आक्सफेम की रिपोर्ट बताती है कि हमारे देश में इस कोरोना-काल में 84 प्रतिशत परिवारों की कमाई में कमी आयी है। जहां तक बेरोज़गारी का सवाल है, शहरी क्षेत्रों में यह दर पंद्रह प्रतिशत से भी अधिक हो गयी है, स्वाभाविक है ग्रामीण क्षेत्रों में यह बेरोज़गारी और अधिक होगी। बेरोज़गारी के साथ यदि महंगाई के आंकड़े भी जोड़ दिये जाएं तो स्थिति की भयावहता और बढ़ जाती है। इस स्थिति का तकाज़ा है कि आज जब हम आर्थिक विकास की दिशा में बढ़ते कदमों की बात करें तो इस गरीबी और बेरोज़गारी की तरफ भी नज़र रखें। उम्मीद का जो गुलदस्ता हम दुनिया को दे रहे हैं उसकी गंध देश के उन अस्सी करोड़ परिवारों तक भी पहुंचनी चाहिए जिन्हें कोरोना-काल में मुफ्त खाद्यान्न देने की ज़रूरत देश को पड़ गयी थी। यह ज़रूरत इस बात का भी स्पष्ट संकेत है कि ‘अच्छे दिनों’ की आहट की जो बात हम करते हैं, वह अभी बहुत धीमी है।

भारत में यह मौसम चुनावों का है। देश के पांच राज्यों में चुनावों का शोर सुनाई दे रहा है। हर राजनीतिक दल अपनी खूबियों के बजाय प्रतिपक्षी की कमियों की ओर इशारा करने में लगा है। नये-नये सामाजिक समीकरण बनाये जा रहे हैं, धार्मिक और जातीय ध्रुवीकरण की कोशिशों के शोर में गरीबी का ज़रूरी मुद्दा कहीं खो-सा गया है।

लगभग आधी सदी पहले हुए एक राष्ट्रीय चुनाव में गरीबी सबसे बड़ा मुद्दा बना था। ‘गरीबी हटाओ’ के नारे पर चुनाव जीता गया था तब। मतदाता ने उम्मीद की थी कि यह सिर्फ नारा या जुमला नहीं रहेगा। पर उम्मीद पूरी नहीं हुई। ऐसा नहीं है कि इस दौरान हमारी सरकारों ने इस दिशा में कुछ करना नहीं चाहा, पर हकीकत यह है कि कोशिश के पीछे उस ईमानदारी का अभाव था जो होनी चाहिए थी। इसी का परिणाम है कि पूरी दुनिया में गरीबी के जाल में फंसे लोगों की आधी संख्या हमारे भारत में है। आज हमारे नेता कभी हमें मंदिर-मस्जिद के नाम पर भरमाते हैं और कभी राजपथों की लम्बाई तथा मूर्तियों की ऊंचाई के नये प्रतिमानों से। आर्थिक असमानता और विषमता के प्रतिमान भी हमने स्थापित कर रखे हैं इस ओर कोई ध्यान नहीं दे रहा।

कुछ अर्सा पहले एक रिपोर्ट आयी थी वैश्विक गैर-बराबरी के बारे में। इसके अनुसार देश की राष्ट्रीय आय का आधे से अधिक हिस्सा उस तबके के पास जा रहा था जिसे ‘सुपर रिच’ कहा जाता है और आधे भारतीय राष्ट्रीय आय के 13 प्रतिशत पर गुज़ारा करने के लिए मज़बूर हैं। हमारे मध्यम वर्ग और निम्न मध्यम वर्ग की स्थिति भी गरीबी की स्थिति से बहुत अच्छी नहीं है। इस वर्ग को राष्ट्रीय आय का लगभग एक तिहाई हिस्सा ही मिलता है।

सवाल उठता है यह आर्थिक स्थिति हमारी राजनीति का, हमारे चुनावों का मुद्दा क्यों नहीं बनती? हैरानी की बात है कि चुनाव प्रचार में हमारे राजनेताओं को इस संदर्भ में कुछ कहने की आवश्यकता महसूस नहीं होती। चुनाव का सारा गणित जातियों के आधार पर चल रहा है। जाति के आधार पर टिकट बंटते हैं, जाति के आधार पर वोट मांगे जाते हैं- और वोट दिये भी जाते हैं! बढ़ती आर्थिक असमानता और सामाजिक अस्थिरता हमारी राजनीति का विषय कब बनेगी?

कोरोना-काल में देश के अस्सी करोड़ परिवारों का मुफ्त पेट भरने का दावा करने वालों को इस बात की चिंता कब होगी कि अस्सी करोड़ परिवारों को मांग कर खाने के लिए मज़बूर क्यों होना पड़ा? आज हमारे राजनीतिक दल आश्वासनों का ढेर लगा रहे हैं। एक-दूसरे से बढ़-चढ़कर बोली लग रही है मतदाताओं को मुफ्त सुविधाएं देने की। मुफ्त बिजली, मुफ्त पानी, सम्मान निधि के नाम पर दी जाने वाली आर्थिक सहायता, मुफ्त गैस, मुफ्त लैपटॉप... इस सबकी ज़रूरत ही अपने आप में एक शर्मनाक स्थिति को बयां करती है। स्पष्ट है, हमारी नीतियों में कहीं न कहीं बहुत बड़ा खोट रहा है। हकीकत यह भी है कि हमारा राजनीतिक नेतृत्व दावा भले ही कुछ भी करता रहे, पर उसकी राजनीति का उद्देश्य सत्ता पाना, सत्ता में बने रहना ही रहा है।

बदलनी चाहिए यह स्थिति। सत्ता नहीं, सेवा होना चाहिए हमारी राजनीति का उद्देश्य। बात तो सब करते हैं सेवक होने की, पर सेवा के नाम पर मेवा कमाने की प्रवृत्ति कम नहीं हो रही। पिछले दो साल में ‘अति गरीबी’ में पहुंच जाने वाले 4.6 करोड़ लोग यह सवाल पूछ रहे हैं—चुनाव-दर-चुनाव हमारे नेताओं की सम्पत्ति दोगुनी-तिगुनी कैसे हो जाती है? कैसे इन दो साल में देश में अरबपतियों की संख्या 102 से 142 हो गयी? उनकी सम्पत्ति 23.1 लाख करोड़ से बढ़कर 53.2 लाख करोड़ हो गयी? मैं दोहराना चाहता हूं, बढ़ती असमानता सामाजिक अस्थिरता को बढ़ा रही है। यह एक खतरनाक स्थिति का संकेत है। कोई सुन रहा है इस खतरे की आहट?

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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