दुनिया को गुमराह ही किया दावोस में ट्रम्प ने
दावोस में ट्रंप ने एक घंटे से ज़्यादा लंबा भाषण दिया। ट्रंप ने कई ऐसे दावे किए, जो या तो झूठे थे, या गुमराह करने वाले। स्वि ट्ज़रलैंड के दावोस में 19 जनवरी से आरम्भ वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (डब्ल्यूईएफ) की...
दावोस में ट्रंप ने एक घंटे से ज़्यादा लंबा भाषण दिया। ट्रंप ने कई ऐसे दावे किए, जो या तो झूठे थे, या गुमराह करने वाले।
स्वि ट्ज़रलैंड के दावोस में 19 जनवरी से आरम्भ वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (डब्ल्यूईएफ) की 56वीं वार्षिक बैठक का समापन 23 जनवरी को हो चुका है। वहां ट्रम्प गए, पीएम मोदी उनसे रूबरू होने नहीं गए। इस बार की वार्षिक बैठक का थीम, ‘ए स्पिरिट ऑफ डायलॉग’ रखा गया है। लेकिन इस डायलॉग का क्या हासिल हुआ? जो बिज़नेस लीडर, नेता-नौकरशाह-अर्थशास्त्री-मीडियाकर्मी यहां आये, उससे उनके देशों या दुनिया को क्या लाभ मिला? इस बात पर कम ही बहस होती है।
विश्व आर्थिक मंच (डब्ल्यूईएफ) एक अंतरराष्ट्रीय थिंक टैंक है, जो वैश्विक आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर चर्चा करने के लिए शासन प्रमुखों, बिजनेस लीडर्स, नीति निर्माताओं और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों को एक मंच पर लाता है। डब्ल्यूईएफ का मुख्यालय जेनेवा के कोलोग्नी में स्थित है। इसकी स्थापना 24 जनवरी, 1971 को जर्मन मूल के क्लाउस श्वाब द्वारा की गई थी, जो जेनेवा विश्वविद्यालय में प्रोफेसर थे। इसके संस्थापक क्लाउस श्वाब, दशकों तक इसके अध्यक्ष बने रहे। श्वाब ने अप्रैल 2025 में प्रबंधन पर उठे सवाल, और आंतरिक जांच के बीच अध्यक्ष पद छोड़ दिया था। जांच में श्वाब और उनकी पत्नी को क्लीन चिट मिली, लेकिन श्वाब ने यह कहते हुए दोबारा ज्वाइन करने से मना किया, कि डब्ल्यूईएफ में वातावरण विषाक्त हो चुका है।
रफ्ता-रफ्ता वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की गंभीरता कम होती जा रही है। बल्कि, इसे ‘हाई-प्रोफ़ाइल पिकनिक स्पॉट’ की नज़रों से देखा जाने लगा है। आलोचकों का तर्क यह भी है, कि यह मंच, धनी देशों और बड़ी कंपनियों को विशेषाधिकार देता है। अमेरिकी राजनीतिक वैज्ञानिक सैमुअल पी. हंटिंगटन ने इस मंच को ‘अभिजात वर्ग के लिए एक मिलन स्थल’ के रूप में वर्णित किया, और एक शब्द गढ़ा ‘दावोस मैन’। कई वैसे पत्रकार, जिन्हें आर्थिक समझ नहीं है, वो भी ‘ग्लोबल जर्नलिस्ट’ के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराने दावोस पहुंच जाते हैं।
द स्विस टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, इस सालाना बैठक का वेन्यू, दावोस से कहीं और रखने पर भी विचार किया गया है। दावोस में भीड़ को देखकर स्विस नागरिक असहज होने लगे हैं। आमतौर पर डब्ल्यूईएफ में वैश्विक आर्थिक रुझान, भू-राजनीति, जलवायु नीति, सार्वजनिक स्वास्थ्य और तकनीकी परिवर्तन पर पैनल चर्चाओं के साथ-साथ छोटी कार्यशालाएं, और गुप्त बैठकें शामिल होती हैं। लेकिन इसका ढब धीरे-धीरे बदलता चला गया। आलोचकों का कहना है, कि दावोस में बातें बहुत ज़्यादा होती हैं, मगर दुनिया में बढ़ती असमानता को ठीक करने, और क्लाइमेट चेंज जैसी समस्याओं को दूर करने के लिए काम नहीं के बराबर होता है।
इस बार लगभग 400 टॉप पॉलिटिकल लीडर, जिनमें 60 से ज़्यादा देशों के राष्ट्राध्यक्ष और सरकार के प्रमुख शामिल हैं, और दुनिया की कई बड़ी कंपनियों के लगभग 850 चेयरमैन, चीफ एग्जीक्यूटिव ने हिस्सा लिया। दावोस में ईरान की उपस्थिति नहीं थी, इस्राइल के राष्ट्रपति इशाक हर्जोग ज़रूर आये। इस साल जियोपॉलिटिकल माहौल बहुत ज़्यादा कॉम्प्लेक्स हो गया। यूरोपियन यूनियन के नेताओं ने ग्रीनलैंड पर कब्ज़े की कोशिश को लेकर नए टैरिफ लगाने की ट्रंप की धमकी को ‘ब्लैकमेल’ कहा है। वेनेज़ुएला, ग्रीनलैंड और ईरान जैसे अलग-अलग विषयों पर ट्रंप के बयानों और आक्रामक टैरिफ नीतियों ने दुनिया के सिस्टम को उलट-पुलट कर दिया है, चुनांचे फोरम की बैठक में ट्रंप ही छाए रहे। पांच दिनों में 200 सत्र आहूत किये गए थे, लेकिन ट्रम्प आये, और सारे विमर्श बस्ते में बंद हो गए।
लेकिन, क्या ट्रम्प इस फोरम पर भी दुनिया को गुमराह कर रहे थे? दावोस में ट्रंप ने एक घंटे से ज़्यादा लंबा भाषण दिया। ट्रंप ने कई ऐसे दावे किए, जो या तो झूठे थे, या गुमराह करने वाले। ट्रंप ने बार-बार दूसरे विश्व युद्ध के दौरान ग्रीनलैंड में अमेरिकी सेना की मौजूदगी के बारे में बात की, इसे एक ऐसे इलाके के तौर पर पेश किया, जिसे अमेरिका ने एक बार डेनमार्क को ‘वापस’ कर दिया था। फैक्ट चेक करने पर पता चलता है, कि अमेरिका ने दूसरे विश्व युद्ध के दौरान ग्रीनलैंड की रक्षा में मदद की थी, लेकिन वह कभी भी उस इलाके का मालिक नहीं था। न ही अमेरिका ने डेनमार्क को आज़ाद कराने, या ‘बचाने’ के लिए कोई अलग से सैन्य अभियान चलाया।
सच यह है, कि नाज़ी जर्मनी ने अप्रैल, 1940 में डेनमार्क पर कब्ज़ा कर लिया, तो ग्रीनलैंड को कोपेनहेगन में डेनिश सरकार से अलग कर दिया गया था। जर्मनी को ग्रीनलैंड की रणनीतिक स्थिति और उसकी क्रायोलाइट खानों (विमान एल्यूमीनियम उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण) का फायदा उठाने से रोकने के लिए, संयुक्त राज्य अमेरिका ने वाशिंगटन में डेनमार्क के राजदूत की मंज़ूरी से हस्तक्षेप किया। अमेरिका ने ग्रीनलैंड की रक्षा के लिए सैन्य अड्डे, मौसम स्टेशन और हवाई अड्डे स्थापित किए, लेकिन इसकी कानूनी संप्रभुता कभी नहीं बदली। जर्मन सेना और डेनिश नेतृत्व वाली द्वीप गश्ती दल के बीच छिटपुट झड़पें हुईं, लेकिन ग्रीनलैंड पर नाज़ी जर्मनी ने कभी भी पूरी तरह से कब्ज़ा नहीं किया।
दूसरे विश्व युद्ध के बाद ग्रीनलैंड, डेनमार्क साम्राज्य का हिस्सा बना रहा। शीत युद्ध के दौरान अमेरिकी सैन्य गतिविधि जारी रही, खासकर पिटुफिक स्पेस बेस (पहले जिसका नाम थुले एयर बेस था) के निर्माण के साथ। यह मौजूदगी रक्षा समझौतों पर आधारित थी, न कि स्वामित्व के हस्तांतरण पर। नाज़ी जर्मनी ने ग्रीनलैंड को नियंत्रित नहीं किया, और न ही अमेरिका ने इसे जर्मनी से हासिल किया। डोनाल्ड ट्रंप ने बार-बार ग्रीनलैंड को ‘बर्फ का एक टुकड़ा’ कहा, और तर्क दिया कि ग्लोबल सिक्योरिटी के नाम पर अमेरिका को इसे कंट्रोल करना चाहिए।
ग्रीनलैंड, डेनमार्क साम्राज्य का हिस्सा है, और अनुच्छेद 5 के तहत नाटो के सामूहिक रक्षा खंड द्वारा संरक्षित है, जिसमें कहा गया है कि यदि एक सदस्य पर हमला हुआ तो उसे सभी नाटो सदस्यों पर हमला माना जाएगा। ट्रंप, अनुच्छेद 5 जैसी ‘लक्ष्मण रेखा’ से असमंजस में थे। इसी के हवाले से नाटो के यूरोपीय सदस्य देशों की सेनाएं अमेरिकी फ़ोर्स को काउंटर करने के वास्ते तैयार थीं। यदि ऐसा होता, तो नाटो में विभाजन निश्चित था। ट्रम्प ने अपनी धौंस बनाने के लिए कहा, कि ग्रीनलैंड में हम सैनिक कार्रवाई नहीं कर रहे, लेकिन उन यूरोपीय देशों को देख लेंगे, जो अमेरिका के विरुद्ध लामबंद हो रहे थे। दरअसल, ट्रंप दुनिया को बताना नहीं चाह रहे थे, कि ग्रीनलैंड समर्थक यूरोपीय देश ईयू में अपने सबसे सख्त ट्रेड टूल, ‘बज़ूका’ पर विचार करने के लिए लामबंद हो चुके हैं। यह कदम अमेरिकी सामानों और कंपनियों को ईयू के सिंगल मार्केट में पहुंच से रोक सकता था। यूरोपीय संघ के इस क़दम से अमेरिकी बाज़ार में तबाही मच जाती!
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

