एंटीबॉडीज़ कॉकटेल के उपचार से जगी उम्मीदें

एंटीबॉडीज़ कॉकटेल के उपचार से जगी उम्मीदें

मुकुल व्यास

मुकुल व्यास

अमेरिकी रिसर्चरों ने पता लगाया है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को कोविड से छुटकारा दिलाने के लिए डॉक्टरों ने आपातकालीन उपचार के रूप में उन्हें जो प्रायोगिक दवाएं दी थीं, वे बंदरों और चूहों पर आजमाने पर प्रभावी पाई गई हैं। उन्होंने साइंस पत्रिका में प्रकाशित अपने पेपर में बताया कि ट्रंप को दी गई एंटीबॉडीज की कॉकटेल का परीक्षण रीसस मेकाक प्रजाति के बंदरों और गोल्डन हेमस्टर चूहों (सीरिया और तुर्की में पाये जाने वाले चूहे) पर किया गया और इसके अच्छे नतीजे सामने आए। इन दवाओं के प्रयोग से इन जानवरों में कोविड के लक्षणों में उल्लेखनीय कमी आई।

यह अध्ययन रिजेनेरोन फार्मास्युटिकल्स के रिसर्चरों ने टेक्सस बायोमेडिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट के साथ मिलकर किया है। ध्यान रहे कि ट्रंप ने गत दो अक्तूबर को खुद के कोरोना पॉजिटिव होने की घोषणा की थी। कुछ ही दिन पहले उन्होंने वायरस से मुक्त होने की घोषणा करके सबको चौंका दिया और पूरे जोर-शोर से चुनाव प्रचार शुरू दिया। कोविड से उनकी तीव्र रिकवरी एंटीबॉडीज की कॉकटेल से संभव हुई। एंटीबॉडीज के अलावा डॉक्टरों ने उन्हें विटामिन डी, जिंक और पेट में जलन की दवा दी थी। यह प्रायोगिक दवा रिजेनेरोन फार्मास्युटिकल्स ने उपलब्ध कराई थी। यह कंपनी कोविड-19 सहित विभिन्न वायरल इंफेक्शनों के इलाज के लिए एंटीबॉडीज कॉकटेल पर रिसर्च कर रही है।

नये अध्ययन में रिसर्चरों ने रीसस मैकाक बंदरों और हेमस्टर चूहों पर एंटीबॉडीज कॉकटेल का परीक्षण किया। अध्ययन के पहले चरण में रिसर्चरों ने स्वस्थ बंदरों को एंटीबॉडीज कॉकटेल दिया, जिसे आरईजीएन-कोव 2 के नाम से भी जाना जाता है। पहले की गई रिसर्च से पता चला था कि ये बंदर सार्स-कोव-2 वायरस से संक्रमित हो सकते हैं लेकिन उनमें बहुत ही हल्के लक्षण दिखाई देते हैं। कॉकटेल लेने के बाद बंदरों में सार्स-कोव-2 वायरस इंजेक्ट किया गया। इसके पश्चात इन बंदरों की निगरानी की गई। रिसर्चर यह देखना चाहते थे कि एंटीबॉडीज कॉकटेल ने इनका कितना बचाव किया। उन्होंने पता लगाया कि कॉकटेल लेने वाले बंदरों में कंट्रोल ग्रुप के बंदरों की तुलना में बहुत मामूली लक्षण दिखाई दिए और उनमें वायरस का लोड भी कम था।

कंट्रोल ग्रुप के बंदरों को यह ट्रीटमेंट नहीं दिया गया था। रिसर्चरों ने कुछ बंदरों को वायरस से संक्रमित होने के बाद पुनः एंटीबॉडीज का कॉकटेल दिया। ऐसा करने से उनके लक्षण कम हो गए और वायरस का लोड भी घट गया। रिसर्चरों ने यही उपचार गोल्डन हेमस्टर चूहों पर भी किया। इन चूहों ने कोविड-19 के तीव्र लक्षण दिखाए, जिनमें वजन कम होना शामिल है। रिसर्चरों ने पता लगाया कि सार्स-कोव- 2 से संक्रमित होने से दो दिन पहले चूहों को एंटीबॉडीज कॉकटेल देने पर इनमें बहुत कम लक्षण दिखाई दिए और उनका वजन भी कम नहीं हुआ। चूहों के वायरस से संक्रमित होने के बाद उन्हें पुनः कॉकटेल देने पर उनके लक्षण और कम हो गए और शरीर से वायरस की सफाई हो गई। रिसर्चरों ने इस नए अध्ययन के बाद उम्मीद जताई है कि आरईजीएन-कोव 2 एंटीबॉडीज का प्रयोग कोविड-19 के मरीजों के उपचार के अलावा इस रोग से बचाव के लिए भी किया जा सकेगा।

इस बीच, अंतर्राष्ट्रीय रिसर्चरों ने कोविड को नियंत्रित करने के लिए हर्ड इम्यूनिटी के विचार को ख़ारिज कर दिया है। इससे पहले कुछ विशेषज्ञों ने कहा था कि कम जोखिम वाले युवा जनों को सामान्य जीवन में लौटने की इजाजत दी जानी चाहिए तथा ऐसे लोगों को वायरस से संक्रमित होने देना चाहिए। इससे हर्ड इम्यूनिटी उत्पन्न होगी। लेकिन अब 80 अंतरराष्ट्रीय रिसर्चरों ने कहा है कि कोविड महामारी से निपटने के लिए हर्ड इम्यूनिटी का विचार खतरनाक है। ऐसी रणनीति दोषपूर्ण है। इन रिसर्चरों का पत्र लैंसेट पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। यह पत्र कुछ दिन पहले प्रकाशित तीन रिसर्चरों के सुझाव का जवाब है। इन रिसर्चरों ने हर्ड इम्यूनिटी की जोरदार हिमायत की थी। उन्होंने कहा था कि हर्ड इम्यूनिटी रणनीति के लिए कोविड प्रतिबंधों को खत्म किया जाना चाहिए। ऐसी रणनीति से युवा और स्वस्थ लोग सामान्य जीवन शुरू कर सकते हैं और वायरस के खिलाफ इम्यूनिटी उत्पन्न कर सकते हैं। इस सुझाव पर हजारों विशेषज्ञों, डॉक्टरों और आम व्यक्तियों के हस्ताक्षर किए जाने का दावा किया गया था लेकिन कुछ दिन पहले इस दस्तावेज को लेकर विवाद पैदा हो गया क्योंकि इस पर बहुत से हस्ताक्षर फर्जी पाए गए।

लैंसेट में प्रकाशित नये पत्र में कहा गया है कि हार्ड इम्यूनिटी के सिद्धांत का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। अब तक के प्रमाण यह दर्शाते हैं कि कोविड 19 के अनियंत्रित प्रकोप को आबादी के एक वर्ग तक ही सीमित रखना मुश्किल है। इस पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में जन स्वास्थ्य, वायरस विज्ञान और संक्रामक रोगों और अन्य वैज्ञानिक क्षेत्रों में कार्यरत विशेषज्ञ शामिल हैं। इनका कहना है कि युवा वर्ग में कोविड-19 के अनियंत्रित प्रसार से समस्त आबादी के लिए खतरा पैदा हो जाएगा। दूसरी बात यह है कि हम अभी यह नहीं बता सकते कि कोविड बीमारी किसे ज्यादा प्रभावित करेगी और कौन सा वर्ग कम प्रभावित होगा।

नये पत्र के लेखकों का कहना है कि नौजवानों और स्वस्थ लोगों में भी कोविड के दीर्घकालीन लक्षण दिखाई दिए हैं, जिन्हें 'लांग कोविड' भी कहा जाता है। इसके अलावा अभी तक इस बात का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला है कि कोविड-19 से कुदरती रूप से संक्रमित होने के बाद लोगों में दीर्घकालीन स्थायी इम्यूनिटी पैदा हो जाती है। अतः ज्यादा लोगों को संक्रमित होने देने से महामारी खत्म नहीं होगी बल्कि इससे बार-बार महामारियां उत्पन्न होंगी और स्वास्थ्य कर्मियों और अर्थव्यवस्था पर अनावश्यक बोझ बढ़ेगा। पत्र में कहा गया है कि दुनिया के कई देशों में कोविड का दूसरा दौर शुरू हो चुका है। ऐसे में हमें तत्काल निर्णायक कदम उठाने पड़ेंगे। फिलहाल संक्रमण को दबाने के लिए बंदिशों की आवश्यकता है। इससे स्थानीय प्रकोप का पता लगाने और उसे रोकने के लिए फौरी कार्रवाई करने में मदद मिलेगी। पत्र में जापान, वियतनाम और न्यूजीलैंड जैसे देशों का हवाला दिया गया है।

इन देशों ने दिखला दिया है कि सही जन स्वास्थ्य नीतियों से कोविड के प्रसार को नियंत्रित किया जा सकता है। इन देशों में जीवन लगभग सामान्य हो चुका है। रिसर्चरों के पत्र का मुख्य निष्कर्ष यह है कि जब तक कोविड की वैक्सीन नहीं बन जाती या इसका प्रभावी उपचार नहीं खोजा जाता तब तक कोविड के सामुदायिक प्रसार को नियंत्रित करके ही हम अपनी अर्थव्यवस्थाओं और आबादियों की रक्षा कर सकते हैं।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

सब से अधिक पढ़ी गई खबरें

ज़रूर पढ़ें

संदेह के खात्मे से विश्वास की शुरुआत

संदेह के खात्मे से विश्वास की शुरुआत

चलो दिलदार चलो...

चलो दिलदार चलो...