टीकाकरण

फिर बड़ी लड़ाई जीतने की ओर

फिर बड़ी लड़ाई जीतने की ओर

मधुरेन्द्र सिन्हा

मधुरेन्द्र सिन्हा

आज़ादी के बाद भारत ने कई जंग जीती हैं लेकिन इनमें कुछ ऐसी भी जंग थीं जो मानवता के लिए लड़ी गई, बगैर बंदूकों और दवाओं से। इनमें सबसे बड़ी जंग थी पोलियो के खिलाफ, जिसमें हमने सारी दुनिया को दिखा दिया कि भारत गरीब मुल्क होते हुए भी जागरूकता के मामले में किसी से कम नहीं है। और अब कोविड-19 के खिलाफ सारे देश में टीकाकरण का काम सुचारु रूप से चल रहा है।

यह देखना एक सुखद अनुभव है कि कोरोना वायरस के उन्मूलन के लिए 14 जनवरी से शुरू हुए अभियान में अब तक 94 लाख से भी ज्यादा स्वास्थ्य कर्मियों, कोरोना योद्धाओं और इस प्रोफेशन से जुड़े लोगों को वैक्सीन दी जा चुकी है। यह एक रिकॉर्ड है। टीके की दूसरी किश्त भी दी जानी शुरू हो चुकी है। स्वास्थ्य मंत्री ने घोषणा की है कि मार्च से आम जनता को भी टीके लगने शुरू हो जाएंगे। उन्होंने जुलाई तक 22 करोड़ लोगों को टीका लगाने की महत्वाकांक्षी योजना बनाई है।

पूरी दुनिया, संयुक्त राष्ट्र तथा डब्ल्यूएचओ ने भी इस अभियान की तारीफ की है। इस समय टीकाकरण की रफ्तार इतनी तेज है कि अमेरिका-यूरोप के देश भी हमसे पीछे हैं और वे भी हमारा लोहा मान रहे हैं। ऐसा नहीं है कि यह ऐतिहासिक अभियान बिना किसी व्यवधान के या बाधा के शुरू हो गया। एक टीके को लेकर कई तरह की अफवाहें उड़ाई गईं और कुछ राजनीतिक नेताओं ने इसकी विश्वसनीयता पर सार्वजनिक रूप से संदेह भी व्यक्त किया जो उचित नहीं था। कई आलोचक यह मानने को भी तैयार नहीं हैं कि सारे देश में साल-डेढ़ साल में पूर्ण टीकाकरण संभव हो सकेगा। निस्संदेह भारत टीका बनाने वाला दुनिया का नंबर वन देश है। दुनिया के 60 प्रतिशत टीके का उत्पादन भारत में ही होता है। इतना ही नहीं, 2018 और 2019 में भारत में 15 करोड़ बच्चों को मीजल्स-रूबेला का प्रतिरोधी टीका लगाया गया था। इसके लिए भारत सरकार की मदद को यूनिसेफ, डब्ल्यूएचओ आगे आए और इस मिले-जुले प्रयास का ही फल था कि देश के कोने-कोने में टीकाकरण का काम सफलतापूर्वक चल रहा था। कोविड-19 के कारण उसमें बाधा आई लेकिन फिर वह अभियान शुरू हो चुका है। इसमें आशा तथा आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के अलावा अन्य हेल्थ वर्कर्स का भी बड़ा योगदान रहा है।

जिस तरह से अदार पूनावाला की कंपनी सेरम इंस्टीट्यूट ने समय रहते कोविड-19 के टीके के लिए ऑक्सफर्ड यूनिवर्सिटी से करार कर लिया, उसका फायदा हमें मिला। भारत ने सबसे पहले टीका पा लिया। दूसरी कंपनी भारत बायोटेक ने अपनी रिसर्च से कोवैक्सीन नाम का टीका बनाया है। कंपनी ने नाक में डालने वाला टीका बनाने के लिए वाशिंगटन यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन से करार किया है जो जल्दी ही प्रयोग में आ जाएगा। यह हमारे लिए गर्व की बात है कि यह टीका अमेरिका, यूरोप और जापान के अलावा दुनिया के सभी देशों में लगाया जाएगा।

एम्स के डायरेक्टर रणदीप गुलेरिया ने बताया कि अब तक के आंकड़े बता रहे हैं कि यह वैक्सीन सुरक्षित है। कुछ मामूली किस्म के साइड इफेक्ट्स जैसे दर्द, सूजन, बुखार वगैरह हो सकते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि यह टीका हमें कम से कम छह महीने और अधिक से अधिक एक से दो साल तक प्रतिरक्षा प्रदान करेगा।

इस समय सारी दुनिया में 50 तरह के टीके ट्रायल के चरण में हैं और कई ऐसे हो सकते हैं जो लंबे समय तक प्रतिरक्षा देंगे। डाक्टर गुलेरिया की सलाह है कि काम पर जाने वाले सभी लोग टीका जरूर लें। आईसीएमआर के महामारी विशेषज्ञ डॉक्टर समिरन पांडा का कहना है कि वैज्ञानिकों ने वायरस के जेरोमिक मेकअप को जनवरी 2020 में डिकोड किया और 10 महीने से भी कम समय में इतने टीके तैयार हो गए। लेकिन इसके लिए तमाम वैज्ञानिक परीक्षणों का सहारा लिया गया। इसलिए ये टीके सुरक्षित हैं।

इस साल के बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने स्वास्थ्य तथा इससे जुड़े क्षेत्र के लिए 2.23 लाख करोड़ रुपये का आवंटन किया है जो पिछले बजट की तुलना में 137 प्रतिशत ज्यादा है। टीके के लिए अलग से 35,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए आवंटित राशि का अगर ठीक से इस्तेमाल किया जाए तो इसमें कोई संदेह नहीं है कि देशवासियों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार होगा। इस समय भारत को स्वास्थ्य इन्फ्रास्ट्रक्चर सुधारने की बहुत जरूरत है।

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