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बंगाल में वर्चस्व के लिए टीएमसी-भाजपा टकराव तेज

सियासी महासंग्राम

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बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले ममता बनर्जी और भाजपा के बीच सियासी संघर्ष तेज़ हो गया है, जहां भ्रष्टाचार और विकास की राजनीति प्रमुख मुद्दे बने हैं।

भारत के पूर्वी प्रांत बंगाल में सियासी महासंग्राम शुरू हो चुका है। विधानसभा चुनाव मार्च या अप्रैल में होंगे। पांच मई तक नई सरकार को शपथ लेनी होगी। ममता बनर्जी इस समय कई कारणों से सुर्खियों में हैं। ईडी से उनका टकराव हाल की बात है। उससे पहले उन्होंने एसआईआर के खिलाफ जबर्दस्त आवाज उठाई और चुनाव आयोग को धमकाया। इन हालातों के मध्यनजर सुप्रीम कोर्ट को बीच में आना पड़ा और उन्हें शांत किया।

ईडी ने वहां के कोयला कारोबारी और एक एजेंसी आईपैक के दफ्तरों और अन्य ठिकानों पर मनी लॉन्डरिंग के मामले में छापा मारा। ममता दीदी स्वयं वहां पहुंच गईं और फाइलें, लैपटॉप वगैरह उठा ले गईं तथा अपने पुलिस वालों से कहकर ईडी अफसरों और कर्मियों पर एफआईआर तक करवा दी। एफआईआर करवाना उनका पुराना तरीका है ताकि प्रतिद्वंद्वी पर दबाव बना रहे।

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अब मामला हाईकोर्ट और यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट में चला गया। सुप्रीम कोर्ट में देश के सबसे बड़े दो वकील ममता दीदी की तरफ से खड़े हो गए। ईडी ने कोलकाता छापेमारी मामले में बंगाल पुलिस के कामकाज में दखलंदाजी के आरोपों के बीच बंगाल पुलिस के महानिदेशक को हटाने की मांग की। सुप्रीम कोर्ट में ममता के वकीलों ने राज्य पुलिस द्वारा की गयी एफआईआर को न्यायसंगत बताया। न्यायाधीश ने नाराजगी जताई और कड़े शब्दों में कहा कि यह गंभीर विषय है कि राज्य पुलिस किसी वैधानिक केंद्रीय एजेंसी की कार्रवाई में हस्तक्षेप कर रही है। अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान हर संस्था को स्वतंत्र रूप से काम करने का अधिकार देता है और राज्य पुलिस को यह छूट नहीं है कि वह ईडी जैसी एजेंसियों के काम में बाधा डाले। कोर्ट ने साफ किया कि अंतिम फैसले तक ईडी अधिकारियों के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं होगी।

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दूसरी ओर, ममता दीदी ने एसआईआर के खिलाफ मुहिम छेड़ रखी है, जहां से उन्हें डर है कि उनके समर्थकों के नाम ज्यादा संख्या में कट न जाएं। सभी जानते हैं कि बंगाल में घुसपैठ के चलते लाखों की तादाद में बांग्लादेशी मौजूद हैं। वे खुलेआम टीएमसी का समर्थन करते हैं और इसलिए पार्टी नहीं चाहती है कि उनके नाम कटें। इसके अलावा वहां रोहिंग्या भी बड़ी संख्या में आ घुसे हैं। उन्हें भी देश से भगाने की बात की जा रही है लेकिन ममता दीदी इसे स्वीकार नहीं करतीं।

कम्युनिस्ट पार्टी और कांग्रेस के बंगाल में पतन के बाद अब वहां एक दशक से लड़ाई भाजपा बनाम तृणमूल के बीच है। भाजपा ने पिछले दो चुनावों में काफी प्रयास किया, लेकिन वे टीएमसी की आक्रामक नीति और प्रशासन के सहयोग के सामने जीत का बिगुल नहीं बजा पाए। इस बार पार्टी नई रणनीति के साथ अमित शाह के नेतृत्व में उतरी है। उन्होंने बंगाल के चुनाव की कमान अपने हाथों में ले ली है। गृहमंत्री ने दिसंबर महीने में कोलकाता जाकर वहां पहले तो अपने पार्टी संगठन से जुड़े लोगों से बातचीत की और फिर आरएसएस के कार्यकर्ताओं से मंत्रणा की। मकसद था कि दोनों संगठनों में सामंजस्य बना रहे। उन्होंने बहुत ही आक्रामक ढंग से शुरुआत की है और उसके बाद पीएम मोदी खुद ही बंगाल पहुंच गए। उन्होंने वहां के हुगली जिले के सिंगूर में 830 करोड़ रुपये से अधिक की विकास परियोजनाओं का शुभारंभ किया। इतना ही नहीं, देश की पहली वंदे भारत स्लीपर ट्रेन भी बंगाल से ही शुरू की गई, जबकि राज्य को पहले ही लगभग आधा दर्जन अमृत भारत एक्सप्रेस सेवाएं मिल चुकी हैं। ये सभी कार्यक्रम वोटरों को आकर्षित करने की योजना का हिस्सा हैं।

भाजपा और अमित शाह की नीति रही है कि बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं का हौसला बनाए रखा जाए। गृहमंत्री ने बंगाल में यही किया और उनसे हालात का जायजा लिया। इसके साथ ही उन्होंने पार्टी के चुनींदा नेताओं तथा कार्यकर्ताओं के साथ भी गहन बातचीत की। स्थिति की समीक्षा करने और रणनीति बनाने के लिए उन्होंने भाजपा के विधायकों, सांसदों के अलावा म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन के सभासदों के साथ महत्वपूर्ण बैठक की। बंगाल, जो कभी देश का एक बहुत बड़ा व्यापारिक केंद्र था, अब गिरावट के कारण 2023-24 में छठे स्थान पर पहुंच गया है। जीडीपी और प्रति व्यक्ति आय में भी गिरावट आई है। यहां प्रति व्यक्ति औसत आय राष्ट्रीय आय से भी घटकर नीचे आ गई है।

तृणमूल कांग्रेस को सत्ता में आए 14 साल से ज्यादा समय हो चुका है। पार्टी ने राज्य से वामपंथी सरकार को उखाड़ फेंका, लेकिन उसके बाद यहां आपेक्षित विकास नहीं हुआ। कानून-व्यवस्था की स्थिति बदतर हो गई। बंगाल में बेरोजगारी दर बढ़ी है। राज्य में पलायन तेज हुआ है। राज्य के स्कूल-कॉलेज को टीएमसी ने राजनीति का गढ़ बना दिया है। साहित्य, कला-संस्कृति से संपन्न यह राज्य रंगत खो रहा है। बहरहाल, सत्तारूढ़ दल और मुख्य विपक्षी दल में तलवारें खिंच गई हैं।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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