नेपाल में हालिया विनाशक बाढ़ हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते जलवायु व पारिस्थितिकीय जोखिम सामने लाई। ग्लेशियर पिघलना, ग्लेशियल झीलें, बर्फ़-चट्टान खिसकना और अनियोजित विकास आपदाओं की तीव्रता बढ़ा रहे हैं। शोधों के मुताबिक, हिंदुकुश-हिमालय बेहद तेजी से गर्म हो रहा। नेपाल, भारत और चीन को नदी प्रबंधन, पूर्व चेतावनी, वैज्ञानिक योजना व टिकाऊ विकास का साझा तंत्र बनाना होगा।
तिब्बत-नेपाल सीमा पर ऊंचे हिमालयी क्षेत्र से आई एक और आपदा ने चेतावनी दे डाली है। ल्हेंदे-खोला नदी रसुवागढ़ी में नेपाल में प्रवेश करती है और केरुंग-खोला (भोटे कोसी) में मिल जाती है। आगे चलकर यह त्रिशूली व फिर नारायणी नदी बन जाती है और चितवन नेशनल पार्क से होकर गंगा में जा मिलती है।
26 अगस्त को सुबह माउंट लांगटांग (7,245 मीटर ऊंचाई) से बर्फ और चट्टान का 0.2 वर्ग किलोमीटर का बड़ा तोदा लंबवत नीचे (2270 मीटर) गिरा। इससे ल्हेंदे खोला के मार्ग में अवरोध पैदा होकर झील बन गई जिसके टूटने पर पानी एवं मलबे की विनाशक बाढ़ आई। मलबे से भरी उग्र नदी नेपाल के घनी आबादी वाले क्षेत्र से गुजरी। त्रिशूली नदी का जलस्तर सिर्फ़ 30 मिनट में 9-10 मीटर बढ़ गया, जिससे कई गांव व शहर तबाह हो गए।
इस बाढ़ में 1350 से ज़्यादा जानें चली गई। सरकारी, निजी और सामुदायिक संपत्तियों का भारी नुकसान हुआ। बुनियादी ढांचे और संपत्ति का नुकसान बेहद ज्यादा है। कुछ ही मिनटों में 14 बड़े हाइड्रो प्रोजेक्ट, 41 पुल, विशालकाय मशीनें, ट्रक, बिजली संप्रेषण तारें और बिजली सब-स्टेशन नष्ट हो गए। अत्यल्प समय में दस लाख क्यूबिक मीटर से ज़्यादा मलबा बहा। बाढ़ की रफ़्तार 193 किलोमीटर प्रति घंटा आंकी। नेपाल और दूसरे हिमालयी देशों को व्यापक नज़रिये से सोचना चाहिए। पहाड़ और नदियां उनकी साझी विरासत हैं। नदियां सीमाओं के आर-पार बहने वाली जीवन-रेखाएं हैं। नेपाल को भूकंप, बर्फ़-चट्टान खिसकने और जलवायु आपदाओं से निपटने के लिए असरदार रणनीति बनानी होगी, क्योंकि भविष्य में ऐसी आपदाएं बढ़ेंगी। चीन और भारत से बातचीत की ज़रूरत है। आपदा नेपाल को अपने विकास मॉडल पर पुनर्विचार का मौका दे रही है। टिकाऊ तीर्थ-पर्यटन, खेती-कुटीर उद्योग, पशुपालन और ऊर्जा उत्पादन के लिए भी उन्हें अपना एक मॉडल विकसित करना होगा।
बाढ़ें, ग्लेशियरों का पिघलना और बर्फ़ीली-चट्टानों का गिरना प्राकृतिक व्यवस्था का हिस्सा रहे हैं। मॉनसून प्रधान इस उपमहाद्वीप में, कई इंसानी कारकों और जलवायु परिवर्तन ने बाढ़ के बदलते स्वरूप में भूमिका निभाई। इंसान ग्लेशियर और नदियों के व्यवहार को ध्यान से देखते रहे, लेकिन उन पर कब्ज़ा भी करते रहे और प्रकृति के उन नियमों के उल्लंघन करते हैं, जिनका पालन वे सदियों से करते रहे।
हिंदूकुश हिमालयी इलाके में सिर्फ़ 5 प्रतिशत ज़मीन खेती योग्य है। इसका ज़्यादातर हिस्सा नदियों से बनी घाटियों में है। तथाकथित 'विकास' ही इन घाटियों में सबसे बड़ा अतिक्रमणकारी है। हमने शायद ही कभी नाज़ुक पहाड़ों की गोद में और मुख्य केंद्रीय आघात क्षेत्र के पास बसे लोगों के लिए विकास के विशेष तरीकों बारे सोचा जो हो, जहां पर ज़्यादातर आपदाएं पैदा होती हैं। भूकंप के लिहाज़ से संवेदनशील वी-आकार की घाटियों में बर्फ़ और चट्टानें नदियों का रास्ता रोकती हैं। नेपाल का बड़ा हिस्सा 'सिस्मिक गैप एरिया' में आता है, जहां पिछले सौ-डेढ़ सौ सालों से कोई बड़ा भूकंप नहीं आया। जमा होती जा रही इस भू-ऊर्जा का दशकों तक बाहर न निकलना एक बड़े भूकंप का कारण बन सकता है। मौसम की मार से कोई भी चट्टान या बर्फ़ की ढलान खिसक सकती है।
पुरानी जमी बर्फ़ और पानी युक्त ताज़ी बर्फ़ में फ़र्क होता है। पुरानी जमी बर्फ़ (परमाफ़्रोस्ट) पर ताज़ी बर्फ़ तो सीधी जमा हो जाती है, लेकिन पानी नीचे बहने के लिए सबसे ढलान ढूंढ़ता है। तापमान वृद्धि के कारण ऊंची जगहों पर ओले या बर्फ़ गिरने के बजाय बारिश हो रही जिससे पानी की तबाही की ताकत कई गुना हो जाती है। 16-17 जून 2013 को केदारनाथ में ओले व बर्फ़ के बजाय बारिश हुई थी। छोटी चोराबाड़ी झील का बांध टूट गया । एक और वजह 24 घंटे में 400 मिमी बारिश थी। 1970 में बिरही-अलकनंदा बाढ़ के समय भी ऐसा हुआ, जब गौना झील टूटी थी।
7 फरवरी 2021 को रोंटी चोटी से बर्फ़ और चट्टान खिसकने से ऋषिगंगा में एक झील बन गई थी। यह झील फटी और दो हाइड्रो प्रोजेक्ट्स को तबाह कर दिया था, साथ ही 220 से ज़्यादा जानें लील लीं - जिनमें से ज़्यादातर मज़दूर सुरंग के अंदर थे।
तापमान बढ़ने से ग्लेशियर वाली झीलें कैसे बड़ी हो जाती हैं, यह तीस्ता बाढ़ से साफ़ पता चलता है, जब 3-4 अक्तूबर 2023 को दक्षिण ल्होनक ग्लेशियर झील फट गई थी। जान-माल के नुकसान के साथ-साथ, 14,000 करोड़ रुपये की लागत वाला तीस्ता 3 प्रोजेक्ट तबाह हो गया था। यह ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड था और नेपाल में इनका खतरा बना रहता है। मई 2012 में भी, ऐसी ही एक बाढ़ से पोखरा में 60 से ज़्यादा लोगों की मौत हो गई थी। नेपाल में आने वाली विनाशकारी बाढ़ से ग्लेशियर की बर्फ़ बड़े पैमाने पर बहने और उससे निचले इलाकों में होने वाली जानलेवा घटनाओं के बीच संबंध समझा जा सकता है। इस आपदा को हिमालय के बड़े खतरों से जोड़कर देखा जाना चाहिए, क्योंकि हिंदूकुश हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियल झीलों का आकार बढ़ रहा है और जलवायु-खतरे बढ़ रहे हैं। सितंबर 2024 में बारिश, भूस्खलन और बाढ़ के कारण 170 जानें चली गई। अकेले काठमांडू में बाढ़ से 48 लोगों की मौत हुई। कोसी और गंडक नदियां खतरे के निशान से ऊपर बहने लगीं। नेपाल में 30 लाख लोग बाढ़ से प्रभावित हुए। 2025 में भी बाढ़ आई थी।
भूकंप जैसी घटनाओं से यह आपदाएं और भी जानलेवा हो सकती हैं। कई कारकों के मेल से बनी अन्य आपदाओं में मेलमची (2021), थामे (2024) और भोटे कोसी (2025) की घटनाएं शामिल हैं। हिमालय क्षेत्र का तापमान वैश्विक औसत की तुलना में दोगुनी तेज़ी से गर्म हो रहा है, जिससे यहां खतरा अधिक बढ़ा है। संयुक्त राष्ट्र ने 2023 में कहा था कि वैश्विक तापमान वृद्धि के कारण नेपाल के पहाड़ों ने पिछले लगभग 30 सालों में ही एक-तिहाई बर्फ़ खो दी। नेपाल में 2,000 से ज़्यादा ग्लेशियल झीलें हैं, जिनमें से 21 को संभावित रूप से खतरनाक माना जाता है।
हिमालयी देश पारिस्थितिकीय, आपदा और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। ये सभी गहराई से जुड़े हैं। पारिस्थितिकी को कोई भी नुकसान आपदाओं की तीव्रता को बढ़ाता है और ये दोनों ही जलवायु परिवर्तन से प्रभावित होते हैं। वैश्विक तापमान वृद्धि के कारण बर्फ़ पहले से ही अस्थिर हो चुकी है। हिंदुकुश हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर बर्फ़ का ह्रास 2011-20 की अवधि में,उससे पिछले एक दशक की तुलना में 65 फीसदी तेज़ी से हुआ। शोधकर्ताओं के अनुसार, अगर 2100 तक जीवाश्म ईंधन से होने वाले उत्सर्जन में भारी कटौती नहीं की, तो हिमालय अपनी 66 फीसदी बर्फ़ खो सकता है।
न्यूनतम कार्बन फ़ुटप्रिंट वाला नेपाल पड़ोसी देशों की हरकतों की कीमत चुका रहा है, जो भारी मात्रा में काला कार्बन धुआं और ब्राउन डस्ट वातावरण में छोड़ रहे। सटीक नीति व ज़िम्मेदार सामाजिक व्यवहार ही संतुलन रख सकता है। हिमालयी देशों के बीच समझ बनानी चाहिए। विचार विनिमय व विश्लेषण जरूरी हैं। साझी नदी-प्रबंधन के लिए बातचीत उतनी ही अहम है जितनी संधियां।
भारत और चीन के बीच कोई संधि नहीं। पारेचू नदी का मामला ही लें। जून 2004 में लैंडस्लाइड से तिब्बत की तरफ़ एक झील बन गई थी। एक साल बाद, 26 जून 2005 को वह झील फट गई। जानें तो बच गई, लेकिन भारतीय इलाके में 800 करोड़ रुपये की क्षति हुई। इसके बाद आपदा संहिता पर दस्तख़त हुए, लेकिन भारत को इसकी कीमत चुकानी पड़ी। अब चीन सीमा के पास कई बांध बना रहा है और पड़ोसी देशों के साथ कोई समझौता नहीं है।
सच है कि लोग इन इलाकों में अपने जोखिम पर रहते हैं। इसे कम करने को काम तो कर सकते हैं, लेकिन काबू से बाहर की ताकतों के जोखिम कभी खत्म नहीं कर सकते। लेकिन अब लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं हैं। आधुनिक विज्ञान का इस्तेमाल नागरिकों की भलाई के लिए किया जा सकता है। समुदायों को यह तय करना होगा कि किस तरह का 'विकास' फायदेमंद है और कौन सा बेहद जोखिम भरा। आपदाओं से सीखा सबक समुदायों को तो लंबे समय तक याद रहता है लेकिन सरकारी तंत्र जल्द ही भूल जाता है।
लेखक पर्यावरणविद् और इतिहासकार हैं।

