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विश्वविद्यालयों में नयी ऊर्जा संचार का वक्त

उच्च शिक्षा

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उच्च शिक्षा का लक्ष्य आज्ञाकारी नागरिकों को फ़ैक्टरी की तरह तैयार करने तक सीमित नहीं होना चाहिए। लोकतंत्र के लिए सार्वजनिक विश्वविद्यालयों का अस्तित्व जरूरी है। जहां विद्यार्थियों में लोकतांत्रिक मूल्यों, विविधता, सहिष्णुता और आलोचनात्मक सोच का विकास होता है। वहीं राजनीतिक दखल, शिक्षा का बाजारीकरण और निजीकरण ऐसे संस्थानों के लिए नुकसानदेह हैं।

असहिष्णुता के इस दौर में, परेशान करने वाला ख्याल मेरे मन में आ रहा है। क्या राजनीतिक प्रतिष्ठान को अब बौद्धिक रूप से जीवंत और शैक्षणिक रूप से समृद्ध, समावेशी सरकारी विश्वविद्यालयों की अहमियत और अधिक महसूस नहीं हो रही? अन्यथा, हमारे कुछ प्रमुख सरकारी विश्वविद्यालयों पर लगातार हो रहे हमलों को कैसे लिया जाए? मसलन, जाधवपुर यूनिवर्सिटी का हालिया उथल-पुथल भरा घटनाक्रम - जो शायद पश्चिम बंगाल का सबसे जाना-माना शैक्षणिक संस्थान है।

ऐसा लगता है कि बंगाल की बीजेपी सरकार इस विश्वविद्यालय के राजनीतिक-सांस्कृतिक माहौल से ख़ास तौर पर ख़ुश नहीं। इसमें हैरानी की बात नहीं कि अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और वामपंथी छात्र समूहों के बीच तनाव के बाद हिंसक झड़पें और आधी रात को तोड़-फोड़ होते हमें देखने को मिलीं। हमने भगवा मार्च और यूनिवर्सिटी गेट के सामने नागा साधुओं की मौजूदगी भी देखी। क्या अपनी ख़ास शारीरिक भंगिमाओं से ये साधु उन छात्रों और शिक्षकों को कोई संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं, जिन्हें राजनीतिक व्यवस्था समस्याग्रस्त या अनैतिक असहमति रखने वाला मानती है?

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वास्तव में, हालिया समय में हमारे प्रमुख सरकारी विश्वविद्यालयों पर हो रहे इस प्रकार के हमलों का कोई अंत नहीं दिख रहा है- जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी से लेकर टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज़ तक; या जामिया मिलिया इस्लामिया से लेकर दिल्ली यूनिवर्सिटी तक। टकराव नाना रूप धर कर सामने आ रहे - कुलपति नियुक्ति के तरीके से लेकर ज्ञान की नई राजनीति तक -वह जिसे ‘भारतीय ज्ञान प्रणाली’ कहा जा रहा है - ऐसा होने देकर आलोचनात्मक सोच व शैक्षणिक आजादी के माहौल को ख़त्म करने तक। हो सकता है हमारे प्रमुख सार्वजनिक विश्वविद्यालयों का सुनियोजित पतन एक नए कारोबार के बढ़ने का आधार भी बना रहा हो-तेज़ी से बढ़ रहे निजी विश्वविद्यालयों के ज़रिए शिक्षा का बाज़ारीकरण (यानी शिक्षा को बिकाऊ चीज़ बनाना)।

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भले ही नव-उदारवाद के समर्थक - या वे लोग जो मुनाफ़े की समान सोच के साथ शिक्षा को भी पॉपकॉर्न की भांति बेचते हैं - हमारे बेहतरीन सार्वजनिक विश्वविद्यालयों के गिरते मूल्य पर आंसू न बहाएं, लेकिन वे सभी लोग, जिनकी ज़िंदगी इन संस्थानों की वजह से बदली है, उन्हें आगे आना चाहिए और अपनी आवाज़ उठानी चाहिए। निजी तौर पर मैं सदा दो बेहतरीन सार्वजनिक शैक्षणिक संस्थानों का आभारी रहूंगा - कोलकाता का प्रेसीडेंसी कॉलेज और दिल्ली की जेएनयू।

लेखक के मुताबिक- मैं अच्छे प्रोफ़ेसरों, एक जीवंत शैक्षणिक संस्कृति, सार्थक बहस, संवाद एवं राजनीतिक मंथन के अनुकूल माहौल में और, सबसे बढ़कर, सामाजिक विविधता के समृद्ध अनुभव से पल्लवित होकर बड़ा हुआ हूं। लगता है कि वहां विशेषज्ञतापूर्ण अकादमिक ज्ञान अर्जित करने के अलावा, मैंने तीन ज़रूरी बातें सीखीं, जो मेरे हिसाब से एक लोकतांत्रिक, समावेशी व काफ़ी हद तक बराबरी वाले समाज के विकास के लिए ज़रूरी हैं। सर्वप्रथम, मैंने (लेखक) अनेकता और मिल-जुलकर रहने की भावना को समझा। एक तमिल लड़का, एक मिज़ो लड़की, बिहार के दूर-दराज़ इलाके से आए एक दलित छात्र या केरल की एक होनहार मुस्लिम छात्रा के साथ बड़े होने के दौरान, मैंने दूसरों की भावनाओं को समझने (सहानुभूति), अलग-अलग संस्कृतियों के बीच संवाद बनाने और, सबसे बढ़कर, यह समझने की संवेदनशीलता सीखी कि भारतीय होने का असल मतलब अनिवार्य रूप से हमारी गौरवशाली अनेकता और विविधता के बीच दूसरों की बातों को गहराई से सुनने की कला विकसित करना है। कदाचित, एक बेहतरीन सार्वजनिक यूनिवर्सिटी का यह अनकहा सबक ही हमें धार्मिक कट्टरपंथ, विदेशियों के प्रति नफ़रत रखने वाली राष्ट्रवादी सोच और संकीर्ण पहचान की राजनीति को हमेशा शक की नज़र से देखने के क़ाबिल बना गया।

दूसरी बात, मैंने सीखा कि नव-उदारवाद या बाज़ार-केंद्रित मूलभूत सोच की भी अपनी सीमाएं होती हैं। हर चीज़ बिकाऊ नहीं होती। शिक्षा का अधिकार किसी एक वर्ग-विशेष का हक और आर्थिक पूंजी पर निर्भर नहीं होना चाहिए। किफ़ायती और अच्छी गुणवत्ता वाले सरकारी विश्वविद्यालय के बिना, हम उस बुराई का विरोध नहीं कर पाएंगे, जो सदियों से चली आ रही है - यानी सामाजिक एवं आर्थिक असमानता का लगातार बने रहना। कई बार मुझे लगता है कि मैं क़िस्मत वाला था कि मेरे बड़े होने के दौरान बढ़िया सरकारी विश्वविद्यालय मौजूद थे; वर्ना, मेरे माता-पिता के लिए मुझे बहुत महंगे और बाज़ारीकृत ‘फाइव-स्टार’ निजी विश्वविद्यालयों में भेजना और हर साल लगभग 13 लाख रुपये का इंतज़ाम करना नामुमकिन होता!

और तीसरी बात, मैंने सीखा कि लोकतंत्र समय-समय पर चुनाव करवाए जाने की रस्म-अदायगी भर नहीं है। सोचने, काम करने और जीने के तरीक़े वाला लोकतंत्र बनाने के लिए आलोचनात्मक सोच की भावना होना ज़रूरी है- यानी हमारे चुने हुए प्रतिनिधि जो करते हैं, या वे जिन आर्थिक और सांस्कृतिक नीतियों को बढ़ावा देते हैं, उनके असर को परखने और समझने की क्षमता होना। लोकतंत्र का मतलब विरोध की संस्कृति या प्रतिरोध की कला भी है। हम यह कैसे भूल सकते हैं कि इसी प्रतिरोध की संस्कृति के ज़रिए ही हम नस्लवाद, रंगभेद, उपनिवेशवाद, जातिवाद, छुआछूत, गरीबी, पितृसत्ता, धार्मिक कट्टरपंथ और फासीवाद से आगे बढ़ पाए हैं?

इसलिए, एक बढ़िया विश्वविद्यालय में, जब युवा छात्र नेल्सन मंडेला, ज्योतिराव फुले, सिमोन द बोउवार, मोहनदास करमचंद गांधी और रचनात्मक असहमति रखने वाले कई अन्यों के बारे में पढ़ते हैं, या पॉल रॉबसन को याद करते हुए ‘वी शैल ओवरकम...’ (हम होंगे कामयाब...) गाते हैं, तो यह सिर्फ़ उनके अकादमिक ज्ञान को बढ़ाने के लिए नहीं होता; असल में, इस प्रकार का बौद्धिक एवं सांस्कृतिक जुड़ाव उन्हें सशक्त बनाता है और लोकतंत्र के प्रति प्रतिबद्ध, बौद्धिक रूप से जागरूक और राजनीतिक रूप से सतर्क नागरिकों के तौर पर जीने के लिए प्रेरित करता है।

यह एक ज़रूरी सबक है, ख़ासकर तब जब बाज़ार-केंद्रित सोच रखने वाली और हावी हुई विचारधारा शिक्षा की कीमत को केवल ‘नौकरी और तनख़्वाह’ के नज़रिए से मापती हो। इसकी बजाय, आलोचनात्मक सोच और आज़ादी-पसंद राजनीति के इस पहलू पर बार-बार ज़ोर दिया जाना चाहिए, ख़ासकर तब जब सामाजिक रूढ़िवाद का एक नया रूप (जो उग्र धार्मिक राष्ट्रवाद की विचारधारा की ख़ासियत लिए है) असहमति रखने वाले हर व्यक्ति को ‘दिमागी नक्सल’ या ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ का सदस्य ठहराकर बदनाम करता हो!

यह कहने में मुझे कोई हिचकिचाहट नहीं है कि एक लोकतांत्रिक समाज के लिए बढ़िया एवं उदार सार्वजनिक विश्वविद्यालयों की ज़रूरत होती है। आख़िरकार, उच्च शिक्षा का मक़सद केवल ऐसे आज्ञाकारी नागरिक तैयार करना भर नहीं है, जो मानो किसी फ़ैक्टरी में ढले हों, या जो केवल टेक्नो-कॉरपोरेट साम्राज्य के लिए ‘तकनीकी कुशल कार्यबल’ तैयार करती हो। विश्वविद्यालय ऐसे जागरूक नागरिक भी तैयार करे, जिनकी आंखों में अभी भी एक न्यायपूर्ण और मानवीय दुनिया का सपना हो।

लेखक समाजशास्त्री हैं।

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