कमजोर वर्ग को राहत देने का वक्त

कमजोर वर्ग को राहत देने का वक्त

जयंतीलाल भंडारी

जयंतीलाल भंडारी

हाल ही में 13 मई को लॉकडाउन के कारण प्रवासी मजदूरों की बढ़ती बेरोजगारी और बढ़ते पलायन पर संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पिछले साल प्रवासी मजदूरों की मदद के लिए शीर्ष अदालत ने जो कई आदेश दिए थे, उनका पालन नहीं हुआ है। कोर्ट ने केंद्र, दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश सरकार को आदेश दिया कि एनसीआर (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र) में फंसे मजदूरों को सूखा राशन उपलब्ध कराया जाए। साथ ही उनके लिए सामुदायिक रसोई भी शुरू करने पर विचार किया जाए और इसके लिए मजदूरों से कोई पहचान-पत्र भी न मांगा जाए।

इन दिनों देश में कहीं लॉकडाउन, तो कहीं लॉकडाउन जैसी कठोर पाबंदियों और जनता कर्फ्यू के कारण गरीबों और श्रमिकों सहित संपूर्ण कमजोर वर्ग की मुश्किलें बढ़ गई हैं। ऐसे में बड़ी संख्या में लोगों द्वारा भारत में गरीबी और निम्न आमदनी वाले लोगों की चुनौतियां बढ़ने से संबंधित दो शोध रिपोर्टों को गंभीरतापूर्वक पढ़ा जा रहा है।

इन दो रिपोर्टों में से पहली रिपोर्ट 7 मई को अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी द्वारा प्रकाशित की गई है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले वर्ष कोविड-19 संकट के पहले दौर में करीब 23 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे जा चुके हैं। ये वे लोग हैं, जो प्रतिदिन राष्ट्रीय न्यूनतम पारिश्रमिक 375 रुपये से भी कम कमा रहे हैं। दूसरी रिपोर्ट अमेरिकी शोध संगठन प्यू रिसर्च सेंटर द्वारा प्रकाशित की गई है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि कोरोना महामारी ने भारत में बीते साल 2020 में 7.5 करोड़ लोगों को गरीबी की दलदल में धकेल दिया है। रिपोर्ट में प्रतिदिन 2 डॉलर यानी करीब 150 रुपये कमाने वाले को गरीब की श्रेणी में रखा गया है।

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) द्वारा हाल ही में प्रकाशित रिपोर्ट में कहा गया है कि मार्च 2021 की तुलना में अप्रैल 2021 महीने में देश ने 75 लाख नौकरियां गंवाई हैं। इसके कारण बेरोजगारी दर बढ़ी है। लेकिन रिपोर्ट में कहा गया है कि कोविड-19 महामारी बढ़ने के साथ कई राज्यों ने 'लॉकडाउन' समेत अन्य पाबंदियां लगायी हैं। इससे आर्थिक गतिविधियों पर प्रतिकूल असर पड़ा है और फलस्वरूप नौकरियां प्रभावित हुई हैं। इससे अप्रैल 2021 में बेरोजगारी दर चार महीने के उच्च स्तर 8 प्रतिशत पर पहुंच गयी है। शहरी क्षेत्रों में बेरोजगारी दर 9.78 प्रतिशत है जबकि ग्रामीण स्तर पर बेरोजगारी दर 7.13 प्रतिशत है। इससे पहले, मार्च 2021 में बेरोजगारी दर 6.50 प्रतिशत थी और अप्रैल 2021 की तुलना में ग्रामीण तथा शहरी दोनों जगह यह दर अपेक्षाकृत कम थी।

उल्लेखनीय है कि अभी जहां देश का गरीब और श्रमिक वर्ग पिछले वर्ष 2020 में कोरोना की पहली लहर के थपेड़ों से मिली आमदनी घटने और रोजगार मुश्किलों से पूरी राहत भी महसूस नहीं कर पाया है, वहीं अब फिर से देश में कोरोना की दूसरी घातक लहर के कारण गरीब एवं श्रमिक वर्ग की चिंताएं बढ़ गई हैं। खासतौर से छोटे उद्योग-कारोबार और असंगठित क्षेत्र के श्रमिक वर्ग की रोजगार व पलायन संबंधी चुनौतियां उभरकर दिखाई दे रही हैं। औद्योगिक शहरों से एक बार फिर रेलों, बसों और सड़क मार्ग से प्रवासी मजदूरों का पलायन दिखाई दे रहा है।

इसमें कोई दो मत नहीं हैं कि कोविड-19 से जंग में पिछले वर्ष 2020 में सरकार द्वारा घोषित किए गए आत्मनिर्भर भारत अभियान और 40 करोड़ से अधिक गरीबों, श्रमिकों और किसानों के जन धन खातों तक सीधी राहत पहुंचाई जाने से कोविड-19 के आर्थिक दुष्प्रभावों से देश के कमजोर वर्ग को बहुत कुछ बचाया जा सका है। अब स्थिति यह है कि पिछले वर्ष कोरोना की पहली लहर के कारण देश के जो करोड़ों लोग गरीबी के बीच आर्थिक-सामाजिक चुनौतियों का सामना करते हुए दिखाई दे रहे थे, उनके सामने अब कोरोना की दूसरी लहर से निर्मित हो रही नई मुश्किलों से निपटने की बड़ी चिंता खड़ी हो गई है।

नि:संदेह देश में कोरोना के दूसरे घातक संक्रमण के बीच गरीब और श्रमिक वर्ग को मुश्किलों से बचाने के लिए तीन सूत्रीय रणनीति को अपनाया जाना उपयुक्त होगा। एक, सरकार द्वारा गरीबों और श्रमिकों के हित में अधिकतम कल्याणकारी कदम आगे बढ़ाए जाने होंगे। दो, गांवों में लौटते श्रमिकों के रोजगार के लिए मनरेगा पर आवंटन बढ़ाया जाना होगा। तीन, उद्योग कारोबार को उपयुक्त राहत दी जानी होगी, ताकि बड़ी संख्या में रोजगार के अवसर बचाए जा सकें।

निश्चित रूप से केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा गरीबों को राहत दिए जाने के अधिक उपाय सुनिश्चित किए जाने होंगे। पिछले माह 23 अप्रैल को केंद्र सरकार ने गरीब परिवारों के लिए एक बार फिर प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना का ऐलान किया है। इस योजना के तहत केन्द्र सरकार राशनकार्ड धारकों को मई और जून महीने में प्रति व्यक्ति 5 किलो अतिरिक्त अन्न चावल या गेहूं मुफ्त में देगी। इससे 80 करोड़ लाभार्थी लाभान्वित होंगे। प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना पर 26000 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च होंगे। कोरोना से अधिक प्रभावित राज्य सरकारों द्वारा भी गरीबों और श्रमिकों के लिए उपयुक्त राहतकारी योजनाएं शीघ्र घोषित की जानी होंगी।

चूंकि इस समय कई औद्योगिक राज्यों से उद्योग-कारोबार पर संकट होने के कारण फिर से बड़ी संख्या में प्रवासी श्रमिक अपने गांवों की ओर लौट रहे हैं, ऐसे में मनरेगा को एक बार फिर प्रवासी श्रमिकों के लिए जीवन रक्षक और प्रभावी बनाना होगा। हाल ही में प्रकाशित एसबीआई की रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक पिछले माह अप्रैल 2021 में मनेरगा के तहत गांवों में काम की मांग अप्रैल 2020 के मुकाबले लगभग दोगुनी हो गई है। जहां अप्रैल 2020 में मनेरगा के तहत करीब 1.34 करोड़ परिवारों की तरफ से काम की मांग की गई थी, वहीं अब अप्रैल 2021 में करीब 2.73 करोड़ परिवारों को रोजगार दिया गया है। मनरेगा के माध्यम से रोजगार उपलब्ध कराने हेतु चालू वित्त वर्ष 2021-22 के बजट में मनरेगा के मद में रखे गए 73,000 करोड़ रुपये के आवंटन को बढ़ाया जाना जरूरी होगा।

नि:संदेह गरीब एवं असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के रोजगार से जुड़े सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग (एमएसएमई) को संभालने के लिए राहत के प्रयासों की जरूरत होगी। इसमें कोई दो मत नहीं है कि 5 मई को रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) ने व्यक्तिगत कर्जदारों एवं छोटे कारोबारों के लिए कर्ज पुनर्गठन की जो सुविधा बढ़ाई है और कर्ज का विस्तार किया है, उससे छोटे उद्योग-कारोबार को लाभ होगा। इन नयी सुविधाओं के तहत 25 करोड़ रुपये तक के बकाये वाले वे कर्जदार अपना ऋण दो साल के लिए पुनर्गठित करा सकते हैं, जिन्होंने पहले मॉरेटोरियम या पुनर्गठन का लाभ नहीं लिया है। यह घोषित सुविधा 30 सितंबर, 2021 तक उपलब्ध होगी। बैंक उद्योग-कारोबार से इस संबंध में अनुरोध प्राप्त होने के 90 दिन में ऋण का पुनर्गठन करेंगे। इस योजना के तहत 31 मार्च तक के मानक ऋण का पुनर्गठन किया जाएगा।

लेकिन अभी एमएसएमई को कुछ अधिक राहत देकर रोजगार बचाने के साथ-साथ श्रमिक वर्ग को पलायन से रोका जाना होगा। एमएसएमई के लिए एक बार फिर से लोन मोरेटोरियम योजना लागू की जानी लाभप्रद होगी। आपात ऋण सुविधा गारंटी योजना (ईसीएलजीएस) को आगे बढ़ाने या उसे नये रूप में लाने जैसे कदम राहतकारी होंगे।

लेखक ख्यात अर्थशास्त्री हैं।

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