सामाजिक विवेक विकसित करने का वक्त : The Dainik Tribune

सामाजिक विवेक विकसित करने का वक्त

संचार क्रांति के खतरे

सामाजिक विवेक विकसित करने का वक्त

कृष्ण प्रताप सिंह

कृष्ण प्रताप सिंह

हम इक्कीसवीं शताब्दी के 22वें साल के उत्तरार्ध में आ पहुंचे हैं, लेकिन अभी भी कुछ ठिकाना नहीं है कि अपनी बच्चियों, किशोरियों और युवतियों की निजता से जुड़े मामलों को लेकर सहज होना और किसी विवाद की स्थिति में उनकी गरिमा की रक्षा करते हुए उसे निपटाने का सामाजिक विवेक कब विकसित कर पायेंगे? ठिकाना होता तो मोहाली के एक विश्वविद्यालय के गर्ल्स हॉस्टल में एक छात्रा द्वारा कथित रूप से अन्य छात्राओं के आपत्तिजनक वीडियो लीक करने को लेकर जैसा हड़कम्प मचा और साथ ही कई क्षेत्रों में उसे लेकर जैसा ओछापन प्रदर्शित किया गया, उसकी नौबत नहीं आती। तब हम संचार क्रांति के लाभों को इस तरह हानियों में बदलते देखने को भी अभिशप्त नहीं ही होते। साफ कहें तो तब न सोशल मीडिया इतना असामाजिक व असंवेदनशील होता और न कई लोगों को इस निष्कर्ष तक पहंुचने की सहूलियत हासिल होती कि हमारे जैसे बन्द-बन्द समाजों के पुराने नैतिक बंधन अचानक खोल दिये जायें तो जो निरंकुश खुलापन आता है, वह विवेक से ज्यादा अविवेक का ही सशक्तीकरण करता है। साथ ही कई तरह की कुंठाएं खुलकर कुटिलताओं से भरे असामाजिक खेल खेलने लगती हैं।

बहरहाल, इस मुद्दे पर जो हंगामा बरपा हुआ है, उसकी शुरुआत बिना जांच-पड़ताल के प्रसारित इस ‘सनसनीखेज’ खबर से हुई कि एक छात्रा ने कई अन्य छात्राओं के नहाते वक्त उनके वीडियो बनाकर अपने ब्वाॅयफ्रेंड को भेज दिये, जिसने उसे सोशल मीडिया पर डाल दिया। सोशल मीडिया की भाषा में इसे एमएमएस का लीक या वायरल होना कहते हैं, जिसके बाद प्रचारित किया जाने लगा कि अपना एमएमएस लीक होने से क्षुब्ध कुछ ने आत्मघाती कदम उठाये।

हम जानते हैं, सोशल मीडिया पर कोई भी बात जंगल की आग से भी तेज गति से फैल जाती है और फैल जाती है तो फैलाने वालों के नियंत्रण से भी बाहर हो जाती है। ऐसा लगता है कि फेंके हुए ढेले के हाथ न आने की हमारे पुरखों की कहावत इस मीडिया के संदर्भ में ही सबसे ज्यादा सार्थक है। ऐसे में अभी कहना मुश्किल है कि इस मामले का सच क्या है और उसे लेकर फैलाये जा रहे झूठ या अर्धसत्य कब, कहां और कैसे थमेंगे। हमारे समाज में इस तरह के मामलों को जिस तरह चटखारे के साथ सुना व सुनाया या देखा और दिखाया जाता है, साथ ही उसमें अपनी ओर से कुछ जोड़कर बताया जाता है, उसके कारण यह और भी मुश्किल है।

सच पूछिये तो इस मामले से इतनी बेवजह की सनसनियां देश में जाने कब से चली आ रही चटखारे लेने की इस सामाजिक विडम्बना के कारण ही जुड़ गई हैं। अन्यथा यह मामला सनसनीखेज नहीं, गम्भीर साइबर अपराध है और उससे साइबर अपराध की ही तरह निपटा जाना चाहिए। हम जानते हैं कि ऐसे अपराधों की चपेट में अब सामान्य लोग भी आ जाते हैं। कारण यह कि देश में साइबर अपराधियों को अपने नापाक इरादे पूरे करने के लिए संचार तकनीक के किसी भी तरह के दुरुपयोग से डर नहीं लगता। क्योंकि सरकार अभी उनसे निपटने के लिए उपयुक्त कानून ही नहीं बना पाई है। देश में जब से सूचना क्रांति आई है और मोबाइल व इंटरनेट के रास्ते सूचनाओं की पहुंच तीव्र हुई है, तभी से यह तो बहस का मुद्दा बना हुआ है कि क्या मोबाइल व इंटरनेट पारम्परिक समाजों में बच्चों, किशोरों व छात्रों से छिपाकर रखी जाने वाली तमाम बातें बताकर उन्हें बिगाड़ रहे हैं, लेकिन साइबर अपराध कैसे रोके जायें या उनसे जुड़े अपराधियों को माकूल सजा कैसे अमल पाये, इस पर अपवादस्वरूप ही कोई चर्चा होती है। इसके उलट पितृसत्ताजनित सोच के पैरोकार संगठन युवतियों व महिलाओं को मोबाइलों से दूर रखने में ही समस्या का एकमुश्त समाधान देखते हैं, जिसे इसलिए स्वीकार नहीं किया जा सकता कि असावधानी बरतने वाले लोग बिजली के करंट की चपेट में आ जाते हैं तो हम यह मांग नहीं करने लगते कि उन्हें बिजलीचालित उपकरणों का इस्तेमाल न करने दिया जाये।

लेकिन आश्चर्य नहीं कि युवतियों के अपनी मर्जी से जीवन जीने के अधिकार के विरोधी इस कथित एमएमएस लीक की आड़ में उन पर बंदिशों की वकालत करने और उनके आगे पढ़ने की राह में बाधाएं डालने के प्रयास करने लगें। इसलिए जितना जरूरी साइबर अपराधियों के मंसूबों को विफल करना है, उतना ही इन तत्वों के मंसूबों को विफल करना भी। अन्यथा वे इस तथ्य को भी अपने मंसूबों के लिए इस्तेमाल कर लेंगे। किसी भी आरोपी को विलेन बनाने से पहले निष्पक्ष जांच की जानी चाहिए कि उसके पीछे छुपा ‘सूत्रधार’ कौन था? क्या उसने किसी के दबाव में ऐसा किया? और क्या उसके पीछे कोई बड़ा गिरोह है? 18 साल पहले दिल्ली के एक नामी स्कूल में ऐसा ही एक एमएमएस कांड हुआ था तो पीड़िता के माता-पिता ने उसे विदेश भेज दिया था। लेकिन सारे माता-पिता इतने सक्षम नहीं होते और यह कोई समाधान भी नहीं है।

इसलिए जैसा कि शुरू में कह आये हैं, बच्चियों, किशोरियों और युवतियों को ऐसे साइबर अपराधों से बचाने के लिए सबसे जरूरी बात यह है कि खुलेपन की हवा में सांस लेने लगा हमारा समाज अब अपनी बन्द मानसिकता से छुटकारा पाकर नयी पीढ़ी में आ रहे बदलावों को समझने की कोशिश करे। पिछले 20-25 सालों में दुनिया में बहुत तेजी से चीजें बदली हैं। नयी पीढ़ी ने उन बदलावों को जिया और आत्मसात किया है, लेकिन उससे पुरानी पीढ़ी उनको लेकर सहज नहीं हो पाई है। ऐसे अपराधों के सिलसिले में वह मोटे तौर पर दो ही काम करती है। पहला, उन पर चटखारे लेना और दूसरा, उन्हें बढ़ा-चढ़ाकर बताना और उनकी आड़ लेकर अपने वक्त जैसी पाबन्दियों की हिमायत करना। लेकिन इस बीच देश की नदियों में इतना पानी बह चुका है कि उसके इन दोनों कामों में से कोई एक भी सार्थक नहीं रह गया है।

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