संयुक्त राष्ट्र संघ का मानना है कि, ‘जब समाज पैसों के बजाय आपसी सहयोग और समय के लेन-देन पर भरोसा करने लगता है, तो वहां अकेलेपन और असमानता की दीवारें अपने आप ढहने लगती हैं।’
आपने अनेक बैंकों के नाम सुने होंगे। क्या आपने ‘टाइम बैंक’ का नाम सुना है? वर्तमान समय में इसका महत्व बढ़ गया है। यह साधारण बैंकों से बिल्कुल अलग है। साधारण बैंकों में जहां रुपये से लेन-देन किया जाता है, वहीं ‘टाइम बैंक’ का लेन-देन ‘समय’ के अनुरूप होता है। इसमें समय का हिसाब-किताब किया जाता है। समय ‘डेबिट और क्रेडिट’ होता है। सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें रुपयों का विनिमय बिल्कुल नहीं होता। यहां सब बराबर हैं। यहां पर लोगों के अमीर और गरीब की पहचान उनके समय के क्रेडिट के अनुसार जांची जाती है।
इस बैंक की स्थापना डॉ. एडगर कान द्वारा की गई थी। वर्ष 1980 में उन्हें गंभीर हार्ट अटैक आया। इस दौरान वे अस्पताल के बिस्तर पर लाचारावस्था में पड़े हुए थे। तब उन्हें इस बात का अहसास हुआ कि यदि कोई व्यक्ति बीमार, बुजुर्ग या अक्षम हो जाता है, तो उसे बहुत सारी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। अर्थव्यवस्था और समाज ऐसे व्यक्तियों को ‘व्यर्थ’ मान लेता है। इसलिए उन पर ध्यान नहीं दिया जाता, फलस्वरूप समाज में वृद्ध व बीमार लोगों की देखभाल पर लोग समय नहीं खर्च करते। इस सोच ने उन्हें झकझोर दिया।
वे स्वयं से बोले, ‘भले ही बुजुर्ग, अशक्त या बीमार व्यक्ति आर्थिक रूप से काम न कर रहा हो, लेकिन उसके पास दूसरों को देने के लिए अपना कीमती अनुभव, समय और आत्मीयता तो उपलब्ध है।’ एक मानवाधिकार वकील होने के कारण उन्होंने इस बात को भी महसूस किया कि सरकारी योजनाएं निर्धन और बुजुर्गों को केवल लाभार्थी मानकर दान देती हैं। इससे उनका आत्मसम्मान खत्म हो जाता है। इसलिए उन्होंने एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण करने का निर्णय लिया जहां पर सब बराबर हों।
काफी विचार-विमर्श कर उन्होंने 1980 के दशक में ‘टाइम बैंकिंग’ नामक संस्था की नींव रखी। डॉ. एडगर कान का कहना था कि, ‘पैसा कभी भी इंसान के असली मूल्य को नहीं माप सकता। टाइम बैंक का सिद्धांत यही है कि हर इंसान का एक घंटा बराबर है—यह समाज में हर व्यक्ति को यह अहसास कराता है कि उसकी और उसके समय की कीमत है।’
आज के व्यस्त समय में तो ‘टाइम बैंक’ की महत्ता बहुत बढ़ गई है। आज लोगों को सुनने वालों की ही तलाश है। कोई किसी को सुनना नहीं चाहता, बस सब बोलना ही चाहते हैं। सब अपनी परेशानियां और बातें बताने को आतुर हैं। कई देशों ने भी ‘टाइम बैंक’ के महत्व को समझा और इसे स्थापित किया।
‘स्विट्ज़रलैंड’ का ‘ओल्ड एज टाइम बैंक’ मॉडल टाइम बैंक की एक व्यावहारिक व्यवस्था को बताता है। यहां पर युवा अपने खाली समय में अकेले रहने वाले बुजुर्गों की देखभाल करते हैं। वे उनके लिए खरीदारी करते हैं, उन्हें टहलाने ले जाते हैं और उनसे घंटों गपशप करते हैं। जितने घंटे की वे सेवा देते हैं, उतने ही घंटे व टाइम उनके ‘सोशल टाइम बैंक खाते’ में जमा हो जाता है। जब वे खुद वृद्ध होते हैं तो वे उसी जमा समय का उपयोग अपनी देखभाल के लिए कर सकते हैं। इसके लिए उन्हें कुछ नहीं खर्च करना पड़ेगा।
जापान में भी 1990 के दशक में इस टाइम बैंक की शुरुआत हुई थी। वहां पर इस तरह की व्यवस्था को ‘फुरुआई किप्पु’ नाम से जाना जाता है। यहां अगर कोई व्यक्ति किसी बुजुर्ग या बीमार व्यक्ति की देखभाल में 1 घंटा बिताता है, तो उसे 1 ‘फुरुआई किप्पु’ यानी कि ‘टाइम क्रेडिट’ मिलता है। लोग इन क्रेडिट्स को जमा करते हैं और भविष्य में जब उनके माता-पिता अथवा वे वृद्ध हो जाते हैं, तो वे इन क्रेडिट्स के बदले नि:शुल्क सेवाएं प्राप्त करते हैं।
ब्रिटेन का ‘फेयर शेयर टाइम बैंक’ मानसिक रूप से तनावग्रस्त, अकेले अथवा बुजुर्ग व्यक्तियों को समाज से जोड़ता है। यहां लोग अपने खाली समय में दूसरों की मदद करते हैं और आवश्यकता पड़ने पर अपनी जरूरतों के लिए दूसरों का समय लेते हैं।
मध्य प्रदेश सरकार के ‘आनंद विभाग’ ने अगस्त, 2019 में देश के पहले आधिकारिक ‘टाइम बैंक’ की स्थापना करने का निर्णय लिया और इसे लागू करने की प्रक्रिया आरंभ की। आज तो अनेक गैर-सरकारी संस्थाएं भी इस दिशा में ठोस कदम उठा रही हैं।
‘टाइम बैंक’ की अवधारणा लोगों के अंदर प्रेम, करुणा, सहयोग की भावनाओं को विकसित करती है। इसके माध्यम से लोगों के अंदर मानवीयता एवं भाईचारे की भावना भी बलवती हो रही है। ‘टाइम बैंक’ लोगों के अंदर से डिप्रेशन एवं समस्याओं को दूर करने में भी निर्णायक भूमिका निभा रहे हैं।
संयुक्त राष्ट्र संघ का मानना है कि, ‘जब समाज पैसों के बजाय आपसी सहयोग और समय के लेन-देन पर भरोसा करने लगता है, तो वहां अकेलेपन और असमानता की दीवारें अपने आप ढहने लगती हैं।’

