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जिनके इलाज से टिके मर्ज, निकले मरीज

तिरछी नज़र

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गांवों की अपनी मजबूरी है। तमाम कोशिशों के बावजूद डाक्टर शहरों में टिके रहना चाहते हैं और गांवों में झोलाछाप डॉक्टरों की चल निकलती है।

कहते हैं, डॉक्टर भगवान का रूप होते हैं। अगर वही फर्जी निकल जाए, तब तो भगवान ही मालिक है। तब तबीयत में सुधार के लिए भगवान को भेजी गई अर्जी भी काम नहीं आती। मर्ज रह जाता है, मरीज़ निकल लेता है। उम्रदराज जनकलाल अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखते हैं। नियमित जांचें कराते हैं। एक दिन इसी मंशा से किसी संजीवनी क्लीनिक पर पहुंचे। लंबी प्रतीक्षा के बाद एक डॉक्टर प्रकट हुआ। उसने उन पर एक नज़र डाली और सीधे पर्ची पर उतर आया। ताबड़तोड़ कलम घसीटते हुए बोला, ‘आप तो बिल्कुल ठीक हैं, बस अंडरवेट हैं। सुबह की ताज़ी हवा खाएं और ये दवाएं लीजिए। थोड़ी महंगी हैं। ठीक हो जाएंगे।’ जनकलाल ने अपने बचे-खुचे दांतों तले अंगुली दबा ली, डॉक्टर तो पहुंचा हुआ मालूम पड़ता है! बिना जांचे पर्चा लिख दिया?

जनकलाल खुद ही अपनी नब्ज़ टटोलते हुए विचारने लगे- मैं तो जिंदगीभर से ऐसे ही हूं, दुबला-पतला! फिर उन्होंने डॉक्टर को देखा। वह मुंह में जर्दा दाबे सीकिया पहलवान लगता था! वे बोले, ‘आप भी तो अंडरवेट हैं डॉक्टर साब!’ डॉक्टर मुख ऊपर करके हंसा, वरना पीक बाहर आ जाती। फिर ठसके से पूछा, ‘डॉक्टर मैं हूं या आप?’ जनकलाल सकपका गए, ‘जी, आप। मैंने तो ऐसे ही पूछ लिया।’ जनकलाल के जवाब से डॉक्टर को भरोसा आया कि वही डॉक्टर है, सो हो... हो... कर हंसा, ‘वो क्या है कि मेरी तबीयत जरा खराब है?’ यह मामला हास्यास्पद-सा लगता है, लेकिन संजीवनी क्लीनिकों में फ़र्जी दस्तावेजों के आधार पर नौकरी कर रहे डॉक्टरों के मामले को देखते हुए सच जान पड़ता है।

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झोलाछाप डॉक्टरों के बारे में कौन नहीं जानता। पर कौन जानता था कि फर्जी डिग्री धारक, झोलाछाप डॉक्टरों की भांति क्लीनिकों में बैठकर मरीजों की जान से खेलने लगेंगे। गांवों में आज भी झोलाछाप डॉक्टर पाए जाते हैं। एक गांव में रोजमर्रा की खरीदारी के लिए भरने वाले साप्ताहिक बाजार के दिन, एक इंजेक्शन वाला झोलाछाप डॉक्टर काफ़ी चर्चा में रहा। वह बीच बाजार, गांव की सड़क के किनारे पुलिया की सुरक्षा दीवार के शीर्ष चबूतरे पर मरीज़ को लिटाता और बिना किसी झंझट मरीज के कपड़ों के ऊपर से ही इंजेक्शन ठूंस कर इलाज करता था! मरीज अपने नितंब दबाए फीस चुकाते और निकल लेते थे।

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बहरहाल, गांवों की अपनी मजबूरी है। तमाम कोशिशों के बावजूद डाक्टर शहरों में टिके रहना चाहते हैं और गांवों में झोलाछाप डॉक्टरों की चल निकलती है। क्लीनिकों के हालिया फर्जीवाड़ा के चलते झोलाछाप कॉकरोच शहरों में भी सुरसुराने लगे हैं?

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