चूड़ियां तलवार से ज्यादा ताकतवर हैं। तलवार दुधारी हो सकती है। लेकिन चूड़ियां दोनों तरह से इस्तेमाल हो सकती हैं। उलाहने या लानत या ललकार या फटकार के रूप में भी और शांति तथा प्रेम के रूप में भी।
देखो जी, खनकती बस चूड़ियां ही नहीं हैं, खनकती तलवार भी है। रणभूमि में तलवारों के खनकने के बड़े किस्से कहे जाते रहे हैं। बस दोनों के खनकने का रस अलग-अलग होता है। चूड़ियां जब खनकती हैं तो शृंगार-रस पैदा होता है और तलवारें जब खनकती हैं तो वीर-रस पैदा होता है। तलवार का इस्तेमाल तो खैर, हथियार की तरह होता ही रहा है। बल्कि कहना चाहिए कि उसका इस्तेमाल बस हथियार की तरह ही हो सकता है। जबकि चूड़ियों का इस्तेमाल दोनों तरह से हो सकता है, हथियार की तरह भी और प्रेम-पुचकार की तरह भी।
जब किसी को लानत देते हुए चूड़ियां भेंट करने की बात आती है या फिर किसी की मर्दानगी को ललकारते हुए यह कहा जाता है कि चूड़ियां पहनकर घर बैठ जाओ, तो चूड़ियों का इस्तेमाल हथियार की तरह ही होता है। मतलब इस तरह से उसे लड़ने-भिड़ने के लिए उकसाया जा रहा होता है। लेकिन पत्नी या प्रेमिका की चूड़ियों की खनक पति या प्रेमी के लिए प्रेम की फुहार की तरह होती है। इस मायने में चूड़ियां तलवार से ज्यादा ताकतवर हैं। तलवार दुधारी हो सकती है। लेकिन चूड़ियां दोनों तरह से इस्तेमाल हो सकती हैं। उलाहने या लानत या ललकार या फटकार के रूप में भी और शांति तथा प्रेम के रूप में भी।
लेकिन इधर चूड़ियों के इस्तेमाल का एक नया रूप भी देखने में आया है। देखने में उस तरह से नहीं आया है, लेकिन इस नए रूप का एक तरह से आभास कराया गया। संभावना जताई गई जब सत्तापक्ष के लोगों ने यह आरोप लगाया कि विपक्षी महिला जनप्रतिनिधि देश-सेवक पर चूड़ियों से हमला कर सकती थी और इसीलिए वे वहां नहीं आए। चूड़ियों का ऐसा इस्तेमाल पहले कभी नहीं हुआ था। उन्हें भेंट करके किसी को शार्मिंदा तो किया ही जा सकता था, पर घायल और लहूलुहान नहीं किया जा सकता था। वैसे तो शार्मिंदा होना भी घायल होना ही होता है, कलेजा फट जाता है, दिल टूट जाता है वगैरह-वगैरह। लेकिन प्रत्यक्ष रूप से हथियार के रूप में चूड़ियों का इस्तेमाल नहीं हुआ था। शोक में चूड़ियां तोड़कर रुदन तो किया जा सकता है और टूटी हुई चूड़ी अक्सर चूड़ी पहनने वालियों को घायल भी करती रही है।
गफलत में टूटी हुई चूड़ी से जख्मी होने की आशंका फिर भी बनी रहती है। लेकिन हथियार के रूप में चूड़ी का इस्तेमाल अभी तक नहीं हुआ था। कैफी साहब ने आंचल को तो परचम बनाने का आह्वान कर दिया था कि तुम अपने आंचल को परचम बना लेती तो अच्छा था, लेकिन चूड़ियों को हथियार की तरह इस्तेमाल करने का आह्वान कोई क्रांतिकारी कवि या शायर नहीं कर पाया।

