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खेल भावना के अनुरूप नहीं है यह व्यवहार

किसी स्थापित परंपरा को तजना हैरानीजनक है और खेल शिष्टाचार की कमी दिखाता है। जब पाकिस्तान के खिलाफ खेलने, साथ में कमेंट्री करने, प्रसारकों और टीमों को पैसा कमाने में मदद करने में कोई आपत्ति नहीं है तो मैदान पर...

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किसी स्थापित परंपरा को तजना हैरानीजनक है और खेल शिष्टाचार की कमी दिखाता है। जब पाकिस्तान के खिलाफ खेलने, साथ में कमेंट्री करने, प्रसारकों और टीमों को पैसा कमाने में मदद करने में कोई आपत्ति नहीं है तो मैदान पर आधिकारिक हाथ मिलाने में क्या हर्ज है।

आखिर में, शेक्सपियर के शब्दों में ‘यह एक मूर्ख द्वारा सुनाई कहानी जैसा रहा, हो-हल्ले और आवेश से भरी, पर सिर-पैर कोई नहीं’। बैट और बॉल के बीच मुकाबले के रूप में चलाई गई गोलियों की इस लड़ाई में, किसी को अंदाज़ा नहीं कि खेल का अंतिम परिणाम क्या होगा, सिवाय उन लोगों के लालच को संतुष्ट करने के, जिन्हें कैश काउंटिंग मशीन की सरसराहट भरी आवाज़ पसंद है।

दंभ भरे दिमागों के टूटे हुए टुकड़ों को जोड़ने और मैच कराने के लिए खर्च की गई ऊर्जा आखिकार क्या इसी लायक थी? एक समय था जब भारत-पाकिस्तान मैच, भले ही मुकाबला ज्यादातर रोमांचक न भी हो, दोनों तरफ के खिलाड़ियों के ज़बरदस्त खेल कौशल का नमूना हुआ करता था। क्रिकेट के नज़रिए से, यह देखना दुखद है कि एक समय काफी मज़बूत रहा पाकिस्तान अब घबराए हुए, अनाड़ी खिलाड़ियों की टीम सरीखा है, खिंचाई करने वाले अपने से बड़े बच्चों की टोली में फंसे एक सहमे बालक की तरह।

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आश्चर्य और रोमांचक संभावनाओं से भरपूर विश्व कप, जो कट्टर परंपरावादियों तक को क्रिकेट के टी-20 प्रारूप के प्रति अपनी नापसंदगी पर फिर से सोचने पर मजबूर कर दे, भारत-पाकिस्तान का मैदान से इतर चला नाटक इस बात की बेतरह याद दिलाता है कि खेल का राजनीति के साथ घालमेल क्यों नहीं करना चाहिए। जिस प्रकार, नए छोटे देशों ने क्रिकेट के इस प्रारूप को अपनाया है और पुरानी टीमों को भी चुनौती दे रहे हैं, उससे टेस्ट क्रिकेट के अवसान को लेकर बना डर और पक्का हो चला है। जब नेपाल इंग्लैंड को लगभग हरा सकता है, यूनाइटेड स्टेट्स की टीम भारत के धमाकेदार बैटिंग को लगभग नाकाम कर डाले और ज़िम्बाब्वे बड़ी जीत हासिल कर सकता है, तो यह साफ़ है कि टी-20 की दुनिया में कोई भी अजेय दिग्गज नहीं है।

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टेस्ट मैच प्रारूप खेलने वाले देशों का कुलीन क्लब लंबे समय तक ऐसे देशों की तलाश करता रहा, जिनसे सदस्यों की सीमित संख्या बढ़ सकें, लेकिन कोई फायदा नहीं। इसके विस्तार में नाकामी, अन्य कई कारणों के अलावा, इसके लिए आवश्यक मुश्किल कौशल पास न होना भी हो सकते हैं, जिनमें महारत हासिल करने में समय और एक माकूल क्रिकेट संस्कृति खपती है।

1970 के दशक के बाद से यह माना जाता था कि जहां टेस्ट क्रिकेट नाकाम रहा, वहां 50 ओवर का खेल कामयाब होगा। हालांकि इसने सदस्यता का अंतर कम किया और ‘औसत दर्जे की’ टीमों को मुकाबला करने का मौका दिया, लेकिन इसमें भी खेल का मुख्य प्रारूप लगभग टेस्ट क्रिकेट जैसा ही रहा, अफगानिस्तान एक दुर्लभ अपवाद है। लेकिन टी-20 ने सचमुच न सिर्फ क्रिकेट खेलने के तरीके में क्रांति ला दी है, बल्कि उन देशों की कल्पना को भी जगाया है जो थकाऊ और ऊर्जा खपाऊ टेस्ट क्रिकेट में रणनीतिक कौशल में पिछड़ने पर हार की शर्मिंदगी से बचना चाहते थे।

हमारे मौजूदा समय के लिए एक उक्ति जो एकदम सही बैठती है ः ‘जल्दबाज़ी एक खूबी है; सब्र एक बुराई’। क्रीज पर धैर्य और कुशलतापूर्ण एकाग्र नज़र, बैटिंग के दो ऐसे आधार स्तंभ, जिनसे एक पारंपरिक टेस्ट बल्लेबाज सफल होता है। उसे अपने जल्दबाज़ी पर काबू पाने, सही समय का इंतजार करना और राजमिस्त्री की तरह ईंट-दर-ईंट पारी का निर्माण बनाने का प्रशिक्षण दिया जाता है, जिसे दरवाज़े की नॉब ठीक करने की बजाय एक पूरा महल उसारना होता है।

जबकि टी-20 क्रिकेट में बल्लेबाजी एक रेसिंग ट्रैक है, जिस पर चलाने को चालक को गियर-विहीन कार दी जाती है। कोई सड़क कहीं भी ऊबड़-खाबड़ नहीं होती, निबटने को कोई खतरा नहीं । उसके पास रोमांच पैदा करने और जीत हासिल करने का लाइसेंस है। इसके लिए बेहतर छवि होगी मशीन गन या उससे भी घातक हथियार पकड़े हुए एक बंदा जो तूफान की भांति तड़ातड़ गोलियां बरसा रहा है। यह ज्वालामुखी विस्फोट जैसा है, जिसने बहुत सारे ‘साहसी युवाओं’ को सम्मोहित कर रखा है और ‘बोर’ हुए बड़ों तक को अपनी लत में फांस लिया है।

पांच दिन चलने वाला खेल सिमटकर सिर्फ़ साढ़े तीन घंटे का खेल रह गया है, इसने क्रिकेट के व्याकरण को उलट दिया है। 360 डिग्री घूमने वाले बैट, गायब होते डिफेंसिव प्रोड्स, स्कूप और रिवर्स स्वीप, रैंप अप, जानबूझकर बैट के किनारे से मारे गए शॉट जो बाउंड्री की ओर बिजली की तरह लपकते हैं। यह एक तबाही बरपाने जैसा है और इस बौछार का मुकाबला करने के लिए बॉलर भी धोखा और चकमा देने के नए-नए तरीके ईजाद कर रहे हैं। फिंगर फ्लिक, नकल बॉल्स, साइड-ऑन रिलीज़, सटल पॉज़ और अनेकानेक किस्म की स्पीड वेरिएशन उन कई तरीकों में हैं, जिनका इस्तेमाल बैट्समैन को बांधकर रखने की उम्मीद में किया जा रहा है। टिके रहने लिए गेंदबाज को जादूगर बनना होता है वरना जल्द ही हार का सामना करना पड़ेगा।

जब क्रिकेट पागलपन वाली रफ्तार से खेला जा रहा हो और दुनिया इसे अपना रही है, तो क्या भारत और पाकिस्तान के लिए मैदान पर अपना कोई अजीब ड्रामा करना ज़रूरी था? मैं सूर्यकुमार यादव का, बतौर एक बैट्समैन और उनके चेहरे की भंगिमाओं की कला का कायल हूं, जो किसी मंजे हुए अभिनेता तक को मात देती हैं, वे अपना चेहरा सिकोड़ते और फैलाते हैं, अपना माथा सपाट करते हैं, कभी-कभी अपनी जीभ भी निकालते हैं और आंखें बाहर निकालकर भावनाओं का प्रदर्शन करते हैं।

गुणों से परिपूर्ण भारतीय कप्तान को यह शोभा नहीं देता कि वह ऐसा व्यवहार दिखाए और अपने विरोधी कप्तान से हाथ मिलाने से मना कर दे। एक स्थापित परंपरा को तजना हैरान-परेशान करने वाला है और खेल शिष्टाचार की पूर्णरूपेण कमी दिखाता है। भारत कुछ महीने पहले खेले गए एशिया कप में तीन मैचों के दौरान की गई अपनी हरकत को दोहराकर क्या साबित करना चाहता है?

जहां एक ओर यादव ने शायद किसी के निर्देशों पर, टॉस के दौरान पाकिस्तान के कप्तान से सीधी नज़र नहीं मिलाईं और हाथ मिलाने की रस्म के लिए टीमें लाइन में नहीं लगीं, वहीं दूसरी ओर भारत के पूर्व कप्तान और खेल के प्रतीक रहे रोहित शर्मा को पाकिस्तान के किंवदंती बने पूर्व खिलाड़ी वसीम अकरम को गले लगाते हुए कैमरों ने कैद कर लिया। यह दो इंसानों का एक-दूसरे को शुभकामना देने का एक मिसाल था।

हमें आपके खिलाफ खेलने में कोई दिक्कत नहीं, हमें भारत और पाकिस्तान के पुराने धुरंधरों के साथ कमेंट्री करने, एक-दूसरे के चुटकुलों पर हंसने और मुस्कुराने, ब्रॉडकास्टर्स की मदद करने और दोनों टीमों द्वारा पैसे कमाने में कोई दिक्कत नहीं होती, लेकिन कृपया, मैदान पर आधिकारिक रूप से हाथ न मिलाएं। दोगलेपन की न तो कोई हद होती है, न ही कोई बाउंडरी।

लेखक वरिष्ठ खेल पत्रकार हैं।

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