अस्पतालों को निवेश करने, नए इलाज और वाजिब मुनाफा कमाने की व्यापारिक आजादी होनी चाहिए। लेकिन इस आजादी का मतलब यह नहीं हो सकता कि आईसीयू बिस्तर पर पड़े मरीज का आर्थिक शोषण किया जाए।
जैसे ही कोई मरीज अस्पताल में भर्ती होता है, व्यवसाय के मानक नियम पूरी तरह भंग हो जाते हैं। स्ट्रेचर पर लेटे घबराए मरीज के पास न तो इलाज के दाम की तुलना करने का समय होता है और न ही मोल-भाव करने की शक्ति। वे अनिश्चितता के असामान्य स्तर को स्वीकार कर लेते हैं, यह यकीन करते हुए कि जो इलाज सुझाया जा रहा है, वह जरूरी है और उसका दाम वाजिब है। जब अस्पताल इस मजबूरी का फायदा उठाकर बहुत ज्यादा मुनाफा कमाने लगें, तो यह उस भरोसे को बुरी तरह ध्वस्त करने जैसा है।
महाराष्ट्र खाद्य एवं औषधि प्रशासन का हालिया सर्वे इस समस्या की भयावहता को उजागर करता है। पड़ताल करने वालों ने पाया कि इंटरावेनस (आईवी) इन्फ्यूजन सेट की जो लागत अस्पताल को 11.05 रुपये पड़ती है, उसका दाम मरीज से 325 रुपये वसूला गया—यानी 2,841 प्रतिशत अधिक। 29.41 रुपये में खरीदे गए कैथेटर का अधिकतम खुदरा मूल्य 310 रुपये वसूला गया, जो 954 फीसदी अधिक है। कई तरह के आवश्यक मेडिकल सामानों पर कीमतें बहुधा 2,841 प्रतिशत तक ज्यादा पाई गईं। खाद्य एवं औषधि आयुक्त तुकाराम मुंडे ने डिपार्टमेंट ऑफ फार्मास्यूटिकल्स और नेशनल फार्मास्यूटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी को पत्र लिखकर केंद्रीय समीक्षा और स्पष्ट नियमों की मांग की है, ताकि खरीद दाम और घोषित अधिकतम खुदरा मूल्य के बीच कितने अंतर की अनुमति हो, यह तय किया जा सके।
अस्पताल एक वैध वाणिज्यिक संस्था की श्रेणी में आते हैं। उनके लिए खरीद दाम, साफ-सुथरा भंडारण, पर्याप्त स्टॉक बनाए रखना और बर्बादी को लागत में जोड़ना एक जरूरत है, और वाजिब मुनाफा कमाने का हक भी है। लेकिन एक टिकाऊ व्यापारिक मुनाफे और मजबूर ग्राहक से ज्यादा पैसे उगाहने के बीच सीमारेखा स्पष्ट है। किसी भी अन्य उद्योग में ऐसा करने पर तुरंत ‘विश्वास-भंग’ का जुर्माना लग सकता है। स्वास्थ्य क्षेत्र में, जहां ग्राहक बीमार और डरा हुआ होता है तथा कहीं और तुरंत जा नहीं सकता, इसे किसी भी तरह से सही नहीं ठहराया जा सकता।
हालांकि, जहां अनाप-शनाप दाम वसूलना एक परिपाटी बन जाए, वहां नियामक परामर्श काफी नहीं होते। जो अस्पताल जान-बूझकर ज्यादा कीमत वसूलते हैं, उनके लिए अतिरिक्त लिया गया पैसा मरीजों को वापस लौटाना और भारी जुर्माना भरना अनिवार्य किया जाना चाहिए। बार-बार ऐसा करने वालों को दंड स्वरूप सरकारी स्वास्थ्य बीमा पैनल से बाहर करना और निजी भुगतान नेटवर्क से कुछ समय के लिए निलंबित या फिर स्थायी रूप से काली सूची में डाल देना चाहिए।
हालांकि, हमें कुछ मेडिकल सामानों पर वसूले जाने वाले बहुत ज्यादा मुनाफे को शेष सामान्य वस्तुओं पर भी लागू मानकर, एकमुश्त सख्त दाम नियंत्रक निजाम बनाने की गलती करने से बचना होगा। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण पर बनी संसदीय स्थायी समिति ने हाल ही में आवश्यक मेडिकल प्रक्रियाओं पर ‘कड़ी ऊपरी कीमत’ तय करने, तमाम स्टैंडर्ड मेडिकल ऑपरेशनों के लिए पैकेज रेट तय करने और मेट्रो शहरों के अस्पतालों के कमरों का किराया आसपास के थ्री-स्टार होटलों के कमरों के किराए के बराबर करने के लिए एक कानूनी संस्था बनाने की सिफारिश की है। बेशक, समिति ने मरीजों की परेशानी को सही ढंग से समझा है, लेकिन उसके सुझाए गए उपायों से स्वास्थ्य तंत्र को भारी नुकसान पहुंचने का खतरा भी है।
आईवी सेट एक मानकीकृत औद्योगिक उत्पाद है, जबकि क्लीनिकल देखभाल वैसी नहीं है। एक ही बीमारी वाले दो मरीजों को उम्र, दिल की बीमारी के इतिहास या सर्जरी की जटिलता के आधार पर एकदम अलग इलाज की आवश्यकता हो सकती है। बीमारी के लिए विशिष्ट विशेषज्ञता वाले अस्पताल में कई घंटों तक चलने वाली जटिल कैंसर सर्जरी की कीमत को उसी तर्क से तय नहीं किया जा सकता, जिससे प्लास्टिक कैथेटर की कीमत तय की जाती है।
जब सरकारें सख्त और तयशुदा कीमतें लागू कर देंगी, तो दो चीजें होंगी: अगर ऊपरी कीमत बहुत ज्यादा रख दी जाएगी, तो मरीजों को कोई खास बचत नहीं होगी; अगर यह सीमा बहुत कम रखी जाएगी, तो गुणवत्ता प्रभावित होगी। सेवा प्रदाता तब गुणवत्ता से समझौता करने लगेंगे, ज्यादा जोखिम वाले या जटिल मामलों को लेने से मना कर सकते हैं, छिपे हुए चार्ज जोड़ने लगेंगे या आधुनिक तकनीक में निवेश करना रोक देंगे।
आयुष्मान भारत (पीएम-जय) के लिए क्रय-ढांचा तैयार करने में कई साल बिताने के बाद, मैंने इस प्रक्रिया को करीब से देखा है। कागज पर कीमत की सीमा तय करना आसान है। यह सुनिश्चित करना कहीं ज्यादा मुश्किल है कि मरीज को उस कीमत पर वास्तव में अच्छी गुणवत्ता वाली, सुरक्षित और सही इलाज मिले। दामों पर एकमुश्त अंकुश लगाने के बजाय, भारत को एक विशेष पांच-सूत्रीय नियामक रणनीति की जरूरत है।
प्रथम, अस्पतालों द्वारा वसूली जाने वाली कीमतों में वास्तविक पारदर्शिता बनाना। प्रत्येक अस्पताल एक समान डिजिटल प्रारूप में इलाज के दाम की सूची प्रकाशित करे। पूर्व निर्धारित अस्पताल भर्ती के मामले में, मरीजों को कुल खर्च का एक अनुमान मिलना चाहिए, जिसमें व्यवसायिक फीस, जांच एवं परीक्षण, इलाज, दवाएं, उपकरण, इस्तेमाल होने वाली अन्य चीजें और कमरे का किराया शामिल हो। यदि अंतिम बिल अनुमान से काफी ज्यादा बने, तो अस्पताल को इसकी वजह बतानी चाहिए, सिवाय उन मामलों के जहां कोई अप्रत्याशित मेडिकल स्थिति पैदा हो जाए। पारदर्शिता खास तौर पर महंगी दवाओं, इम्प्लांट और इस्तेमाल होने वाली चीजों के मामले में होनी चाहिए।
द्वितीय, अनुचित मुनाफे को सही सिद्ध न कर पाने पर सख्ती से कदम उठाएं। स्टैंडर्ड दवाओं, उपकरणों और इस्तेमाल होने वाली चीजों के मामले में नियामकों को असामान्य कीमतों पर लगातार नजर रखनी चाहिए। प्रत्येक उत्पाद की अंतिम कीमत खुद तय करने की बजाय मुनाफे की तार्किक सीमा बांधना, संदर्भ मूल्य और व्यवस्थित कीमत निगरानी तंत्र ज्यादा सही तरीके हैं।
लेकिन नियामक तंत्र असरदार होना चाहिए। जो अस्पताल बार-बार अनुचित चार्ज लगाते पाए जाएं, वहां जुर्माना इतना बड़ा होना चाहिए कि उनकी यह प्रवृत्ति बदल जाए। सरकारी फंड वाली योजनाओं या स्वास्थ्य बीमा नेटवर्क के तहत पैनल में शामिल होना फायदेमंद है। निरंतर गलत इस्तेमाल से यह सुविधा खतरे में पड़ सकती है।
तृतीय, सरकार और बीमा कंपनियां अपनी थोक क्रय शक्ति का अधिक असरदार ढंग से प्रयोग करें। ज्यादातर बहस इस बात पर होती है कि अस्पताल मरीजों से क्या चार्ज करें। हम इस बात पर बहुत कम ध्यान देते हैं कि अस्पताल और सरकारी खरीदार खुद दवाओं, डिवाइस और इम्प्लांट के लिए क्या कीमत चुकाते हैं।
थोक खरीद का अनुभव, टाटा मेमोरियल सेंटर बताता है कि बचत की कितनी बड़ी गुंजाइश रहती है। सरकारी योजनाएं करोड़ों लोगों की स्वास्थ्य देखभाल का खर्च उठाती हैं। इस विशाल क्रय शक्ति का फायदा बेहतर दाम पाने के लिए मोल-भाव करने में उठाया जाना चाहिए।
चतुर्थ, न केवल दाम, बल्कि उपयोगिता को भी नियंत्रित करें। हर सेवा की कीमत होने से अधिक कमाई करने को प्रोत्साहन मिलता है। अधिक टेस्ट, अस्पताल में ज्यादा दिन प्रवास और अतिरिक्त प्रोसीजर से ज्यादा आमदनी होती है, चाहे उससे मरीज की सेहत में सुधार हो या न हो।
अगर मरीज को जरूरत ही न हो, तो 20 फीसदी छूट पर हुआ सीटी स्कैन भी बर्बादी ही है। सरकारी खरीदार और बीमा कंपनियों को असामान्य मामलों की पहचान करने के लिए क्लीनिकल पाथवे, मेडिकल ऑडिट और क्लेम एनालिटिक्स का इस्तेमाल करना चाहिए; मसलन, सिजेरियन सेक्शन से बच्चे पैदा करवाने की असामान्य रूप से उच्च दर, लंबे समय तक आईसीयू में रखना, जरूरत से ज्यादा टेस्ट, जांच या किसी खास प्रोसीजर का बार-बार उपयोग। गैर-जरूरी इलाज भी इलाज के बढ़े हुए खर्च का उतना ही बड़ा कारण है, जितना कि चीजों की ज्यादा कीमतें।
पंचम, गुणवत्ता को भी दाम की तरह ही साफ तौर पर दर्शाया जाना चाहिए। आज मरीजों को उन अस्पतालों के नतीजों के बारे में बहुत कम जानकारी होती है, जिन्हें वे चुनते हैं। समय-समय पर अस्पतालों को कुछ मानक पैमानों पर अपनी कार्यप्रणाली का लेखा-जोखा प्रदर्शित करना चाहिए, जैसे अस्पताल में इलाज के दौरान लगा संक्रमण, दोबारा भर्ती होने की दर, कुछ खास इलाज के परिणाम और मरीजों का अनुभव।
नि:संदेह, भारत अपने सार्वजनिक स्वास्थ्य तंत्र को मजबूत किए बिना निजी स्वास्थ्य तंत्र में कीमतों की समस्या को हल नहीं कर सकता। एक भरोसेमंद सरकारी विकल्प निजी खिलाड़ियों को सही राह पर रखता है।
अस्पतालों को निवेश करने, नए इलाज और वाजिब मुनाफा कमाने की व्यापारिक आजादी होनी चाहिए। लेकिन इस आजादी का मतलब यह नहीं हो सकता कि आईसीयू बिस्तर पर पड़े मरीज का आर्थिक शोषण किया जाए।
लेखक आयुष्मान भारत के संस्थापक पूर्व मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

