जोशीमठ से सबक लेने में न हो देरी : The Dainik Tribune

जोशीमठ से सबक लेने में न हो देरी

जोशीमठ से सबक लेने में न हो देरी

केएम सिंह

केएम सिंह

जोशीमठ शहर पर आई त्रासदी राज्य सरकार द्वारा पर्यावरणविदों, भू-वैज्ञानिकों, विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों द्वारा बारम्बार व्यक्त तमाम चिंताओं की सरासर अनदेखी का परिणाम है। जाने-माने पर्यावरणविद चंडी प्रसाद भट्ट ने दो दशक पहले ही जोशीमठ पर मंडरा रही आसन्न विपदा की चेतावनियां अच्छी तरह पता होने के बावजूद समय रहते उपाय करने में असफल रहने के लिए सरकारों को आड़े हाथ लिया। भट्ट के अनुसार, नेशनल रिमोट सेंसिंग एजेंसी सहित 12 वैज्ञानिक संस्थाओं ने अध्ययन किया था, इसमें बताया गया है कि जोशीमठ के जिस क्षेत्र का सर्वेक्षण किया गया है, उसके 99 प्रतिशत से अधिक भाग को भू-धंसाव का खतरा है, बस मात्रा का फर्क है। यहां तक कि 1970 के दशक जैसे वक्त में भी जोशीमठ में जमीन धंसने की घटनाओं की सूचनाएं हैं, जब एमसी मिश्रा की अध्यक्षता वाली 18 सदस्यीय कमेटी ने चेतावनी दी थी कि जोशीमठ एक भौगोलिक रूप से अस्थिर पहाड़ी पर बसा है और अनेक प्रतिबंध लगाने और सुधार के उपाय के सुझाए थे। यह मिश्रा कमेटी जोशीमठ शहर की धंसने की ओर अग्रसरता के पीछे कारणों की जांच के लिए बनाई गयी थी। रिपोर्ट बताती है कि जोशीमठ जिस जगह बसा है वह पिछले काफी समय से भूधंसाव की प्रवृत्ति वाला क्षेत्र है, ये पहाड़ ढीली पकड़ और गैर-सख्त सतह वाले हैं, जिनकी जड़ में मिट्टी और मलबे जैसी पोली परत है। परिणामस्वरूप, इस सारे इलाके की भारवहनीय क्षमता अधिक नहीं है। रिपोर्ट इस क्षेत्र में अनियोजित विकास कार्य न किए जाने की चेतावनी देती है और इसको ‘प्राकृतिक रूप से अतिसंवेदनशील’ बताती है। इसमें आगे कहा गया है कि इन पहाड़ों की भू-संरचना से पानी की निकासी की सुविधाएं यथेष्ट न होना भी भूस्खलन का एक कारण है।

मिश्रा कमेटी की इस चेतावनी की परवाह न करते हुए, इस क्षेत्र में काफी संख्या में पनबिजली परियोजनाएं बनाने की इजाज़त दी गई। इनमें जोशीमठ के तपोवन इलाके की विष्णुगाड परियोजना भी है। इलाके के स्थानीय लोग और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का आरोप है कि जिन निजी एजेंसियों ने परियोजनाओं से पहले सर्वे किया, वे इस खित्ते की नाजुक भौगोलिक स्थिति को ध्यान में रखने में विफल रही हैं, इस पहाड़ी इलाके में सुरंगें बनाना यानी स्थानीय पर्यावरणीय संतुलन से छेड़छाड़ करना है। मई, 2010 में, गढ़वाल विश्वविद्यालय के दो अनुसंधानकर्ता और आपदा शमन प्रबंधन केंद्र ने ‘करंट साइंस’ नामक विज्ञान पत्रिका में एक बढ़िया खोजपरक लेख छापा था, इसमें जोशीमठ को दरपेश तीन जोखिमों पर प्रकाश डाला था ः 1. सरकार को चाहिए था कि सुरंगों की आपसी सीध का मेल करना, जो कि पनबिजली परियोजना का अंग होता है, उसकी अनुमति देकर इस शहर को और अधिक जोखिमज़दा न होने देती। 2. सुरंगें बनाने की प्रक्रिया से भूमि की पानी-संचयन परत में छेद हो जाता है और इससे भारी मात्रा में अचानक निकला पानी इलाके भर में बाढ़ ला देता है। 3. विशाल पैमाने की बुनियादी ढांचा विकास योजनाएं जैसे कि पनबिजली परियोजना और सड़क निर्माण पर अमल करने से पहले इस क्षेत्र के प्राकृतिक संतुलन और भू-गर्भीय नाजुकता को समझने में असमर्थ रहना, संबंधित प्राधिकरणों की कोताही के कृत्य हैं।

सालों से जोशीमठ शहर बद्रीनाथ और हेमकुंड साहिब सहित अनेक तीर्थ स्थलों का मुख्यद्वार रहा है, पर्यटन स्थल औली का रास्ता भी यहीं से होकर है। रिपोर्टों के अनुसार, विशेषज्ञों का मानना है कि अनियोजित निर्माणकार्य, जरूरत से अधिक आबादी का घनत्व, पनबिजली परियोजनाएं और भूगर्भीय जल के निकासी प्रवाह में रुकावट बनने से जोशीमठ का वर्तमान संकट बना होगा।

वर्ष 2013 में हुई केदारनाथ त्रासदी के बाद, सर्वोच्च न्यायालय की दो सदस्यीय पीठ ने उत्तराखंड में पनबिजली परियोजनाओं की एवज पर होने वाले पर्यावरणीय नुकसानों का संज्ञान लिया था। इसके चलते अलकनंदा और भागीरथी नदियों की घाटी में प्रस्तावित 24 पनबिजली परियोजनाओं को स्थगित कर दिया गया। पर्यावरणविद रवि चोपड़ा की अध्यक्षता वाले विशेषज्ञ पैनल ने वर्ष 2014 में दी अपनी रिपोर्ट में कहा था कि 2013 में आई भीषण बाढ़ के पीछे पनबिजली परियोजानाओं की परोक्ष-अपरोक्ष भूमिका है। सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया था कि पनबिजली परियोजनाओं को लेकर नीति की रूपरेखा तैयार करे, लेकिन यह अब तक नहीं बन पाई।

रवि चोपड़ा, जिन्होंने चार धाम यात्रा के लिए सर्व-मौसम मार्ग निर्माण योजना पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा बनाए पैनल की अध्यक्षता भी की थी, उन्होंने पिछले हफ्ते जोशीमठ बचाओ संघर्ष समिति द्वारा आयोजित प्रेस वार्ता में बताया कि वर्ष 2015 में एक वैज्ञानिक लेख ‘सुरंगों की वजह से चट्टानों की भार वहन प्रकृति में बदलाव’ में बताया गया है कि उत्तराखंड में हेलांग से तपोवन तक 12.1 किमी लंबी सुरंग बनाने में बार-बार किए जाने वाले बारूद धमाके और सुरंग खोदने वाली मशीनों के फंसने से इस इलाके में दरारें आई हैं। यह तथ्य पर्यावरणविदों और स्थानीय लोगों द्वारा बताए इन कारणों की ताईद करता है कि जोशीमठ में जो कुछ हुआ वह राष्ट्रीय ताप बिजली निगम द्वारा सुरंगें बनाने में उपयोग की गई प्रक्रिया का नतीजा है। इस परियोजना में जोशीमठ से 15 किमी ऊपर, नदी की धार पर कंक्रीट का बैराज भी बनना है, उसको लेकर पहले से भूधंसाव का संकट झेल रहे स्थानीय लोगों में अतिरिक्त चिंता है।

गढ़वाल मंडल भारत में पर्यावरण की दृष्टि से नाजुक इलाकों में एक है। 2013 में आई भीषण केदारनाथ बाढ़ और 2021 में चमोली त्रासदी, जिससे जोशीमठ क्षेत्र के आसपास 200 के लगभग लोग मारे गए थे और दो पनबिजली परियोजनाओं को नुकसान हुआ था। वे अग्रसूचक हैं कि अगली हिमालयी बाढ़ कितना कहर बरपाएगी। हालांकि पिछले दशक में जिन कई सड़कों और पनबिजली परियोजनाओं को अनुमति मिली थी, उन पर काम जारी है, तथापि विकास कार्य और पर्यावरणीय चिंताओं में संतुलन बनाने के लिए पुनर्समीक्षा करने की फौरी जरूरत है। हो सकता है कुछ उपायों से आर्थिक विकास और रोजगार सृजन में कमी आए, किंतु यह घाटा इस क्षेत्र को दरपेश पर्यावरणीय त्रासदी के जोखिम के मुकाबले सावधानीपूर्वक तोला जाना चाहिए।

इसरो के हैदराबाद स्थित नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर ने हाल ही में जोशीमठ की उपग्रही तस्वीरें और भू-धंसाव पर अग्रिम रिपोर्ट जारी की थी, इसके अनुसार समूचा शहर धंस सकता है। इसरो द्वारा जारी जोशीमठ की छवियां दर्शाती हैं कि यह हिमालयी नगर 12 दिनों में तेजी से 5.4 सेंमी. धंसा है, जिसकी शुरुआत शायद 12 जनवरी को हुए धंसाव से हुई। तस्वीरों से अनुमान है कि जोशीमठ-औली मार्ग भी भू-स्खलन में धंस सकता है। इसरो की यह अग्रिम रिपोर्ट वाकई डराने वाली है।

जोशीमठ नगर के धंसने से जगी उत्तराखंड सरकार ने 7 सदस्यीय पैनल का गठन किया, जिसमें आईआईटी रुड़की, जियोलॉजिक सर्वे ऑफ इंडिया, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी और वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी को जोशीमठ में जमीनी सर्वे करने का काम सौंपा गया। जोशीमठ के विशेषज्ञ फील्ड सर्वे के बाद अग्रिम आकलन रिपोर्ट में बताया गया है कि किसी अनजान भूमिगत जल संग्रह से बह निकले गाद-युक्त जल के बाद पहाड़ी की भूगर्भीय संरचना में धनुषाकार रिक्तता पैदा हुई और 1 मीटर जितनी गहरी दरारें बनी हैं। जोशीमठ की स्थिति न केवल उत्तराखंड बल्कि उत्तर भारत में भूचाल की दृष्टि से संवेदनशील सूबों के लिए भी यह घड़ी पर्यावरण के मुद्दे पर जागने की है।

लेखक राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के संस्थापक सदस्य हैं।

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