बीमार मानसिकता से मुक्ति की हो ईमानदार कोशिश
सही अर्थों में भारतीय कहलाने का अधिकारी वही है जो धर्म या जाति के आधार पर नहीं, देश के प्रति अपनी भावना के आधार पर अपनी निष्ठा को प्रमाणित करे। देश के प्रति अपनी निष्ठा का तकाज़ा है कि हम...
सही अर्थों में भारतीय कहलाने का अधिकारी वही है जो धर्म या जाति के आधार पर नहीं, देश के प्रति अपनी भावना के आधार पर अपनी निष्ठा को प्रमाणित करे। देश के प्रति अपनी निष्ठा का तकाज़ा है कि हम उस सोच को बदलें, उससे मुक्त हों, जो इंसानों के बीच फर्क करता है।
बरसों पुरानी बात है, शायद मध्य प्रदेश की है। परिगणित जाति की एक महिला सरपंच एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी से मिलने गयी थीं। काम हो जाने के बाद जब वह सरपंच कार्यालय से चली गयीं तो उस अधिकारी ने वह कुर्सी धुलवाकर ‘पवित्र’ करवायी थी जिस पर परिगणित जाति की महिला बैठी थी! यह समाचार तब कुछ अखबारों में छपा था। कुछ चर्चा भी हुई थी इसे लेकर। पर जल्द ही यह घटना लोग भूल गये। अपने ढंग की अकेली घटना नहीं थी यह। तथाकथित छोटी-जाति वालों के साथ ऐसा घटता रहता है। कभी घोड़े पर चढ़कर बारात ले जाने वाला कथित छोटा जाति वाला कथित उच्च जाति के गुस्से का शिकार बनता है तो कभी किसी स्कूल में छोटी जाति के बच्चों को पृथक बिठाने का समाचार मिलता है। पर हमारी सामाजिक स्मृति में ऐसी घटनाएं बहुत दिन तक नहीं रहतीं। भूल जाते हैं हम कि हमारे तथाकथित समतामूलक समाज में ऐसा भी कुछ घटा है या घट रहा है। नहीं भुलाया जाना चाहिए ऐसी बातों को। इन्हें याद रखना ज़रूरी है ताकि हमें यह अहसास होता रहे कि प्रगति के सारे दावों के बावजूद हमारी सोच कितनी पिछड़ी हुई है।
हाल ही में उत्तराखंड के हल्द्वानी में ऐसी ही एक शर्मनाक घटना घटी थी, जिसे याद रखा जाना ज़रूरी है। राज्यसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के साथ घटी इस घटना का विवरण उन्होंने स्वयं राज्यसभा में दिया था। यह अच्छी बात है कि राज्यसभा में सत्तारूढ़ पक्ष के नेता ने इस प्रकरण की जांच करने का आश्वासन देकर खड़गे जी की पीड़ा पर कुछ मरहम लगाने का काम किया। पर यह पीड़ा सिर्फ खड़गे जी की नहीं है, सिर्फ उनकी ही पीड़ा होनी भी नहीं चाहिए। इस पीड़ा का अहसास उस हर भारतीय को होना चाहिए जो समता और न्याय के आदर्शों में विश्वास करता है, जो यह मानता है कि हमारा संविधान देश के हर नागरिक को समानता का अधिकार देता है।
राज्यसभा में विपक्ष के नेता ने हल्द्वानी में घटी इस शर्मनाक घटना का विवरण देते हुए बताया था कि यहां मैदान में उनका भाषण था, उस जगह और उस मंच को गंगाजल से धोकर शुद्ध किया गया था। शुद्धीकरण का आयोजन करने वाले कथित उच्च वर्ण वालों का कहना था कि जहां यह सभा हुई थी, वहां रामलीला का आयोजन होता है। इसलिए हवन करके जगह को शुद्ध किया गया!
इस अस्वीकार्य घटना की जांच कहां तक पहुंची है, पता नहीं। अक्सर ऐसी घटनाओं को दुर्भाग्यपूर्ण बताकर भुला दिया जाता है। पर होना यह चाहिए कि फिर जब कुछ ऐसा घटे तो हम यह अनुभव करें कि स्वतंत्रता के अस्सी साल बाद भी हम सामाजिक ऊंच-नीच के अभिशाप को ढो रहे हैं। जिस संगठन पर हल्द्वानी की इस घटना का आरोप है उसके सदस्यों का कहना है कि खड़गे जी की सभा जिस मैदान में हुई थी, वहां रामलीला का आयोजन होता है, उस जगह का राजनीतिक इस्तेमाल नहीं होना चाहिए था। किसी भी सोचने-समझने वाले विवेकशील व्यक्ति को यह तर्क समझ नहीं आ सकता। कहा यह जा रहा है कि ‘शुद्धीकरण’ का यह तमाशा चुनावी राजनीति का हिस्सा है। हो सकता है यह आयोजन करने वालों ने चुनावी राजनीति के संदर्भ में यह सब किया हो, पर बात चुनावी राजनीति की ही नहीं है; मामला राजनीतिक टकराव से कहीं ज्यादा उस बीमार मानसिकता का है जो हमें जातियों, वर्गों, वर्णों में बांटती है। जातिगत पूर्वाग्रह कहीं बहुत गहरे तक व्याप्त हैं। हल्द्वानी का यह प्रकरण हमारी सोच पर कुंडली मारकर बैठे इन पूर्वाग्रहों को सामने लाता है। मनुष्यता का तकाज़ा है कि हम इससे उबरें।
राजनीतिक स्वतंत्रता हमने लगभग अस्सी साल पहले प्राप्त कर ली थी, पर अधूरी है यह स्वतंत्रता। आवश्यकता सामाजिक रूढ़ियों से उबरकर एक ऐसे समाज को स्वतंत्र बनाने की है जहां व्यक्ति की नाप-तौल उसकी धार्मिक पहचान और उसकी जाति के आधार पर नहीं हो। इस संदर्भ में हमारे संविधान के प्रमुख शिल्पी डॉक्टर बी.आर. अम्बेडकर का वह संबोधन याद रखने की आवश्यकता है जो उन्होंने संविधान-सभा की आखिरी बैठक में दिया था। अपने उस ऐतिहासिक भाषण में उन्होंने कहा था, ‘26 जनवरी, 1950 को भारत एक स्वतंत्र राष्ट्र बन जाएगा, पर उसकी स्वतंत्रता का क्या होगा? वह अपनी स्वतंत्रता फिर से खो तो नहीं देगा?’ इसी भाषण में उन्होंने यह भी आगाह किया था कि उन्हें जाति और वर्ण जैसे देश के पुराने शत्रुओं की भी चिंता है। उन्होंने कहा था, ‘हमें राजनीतिक जनतंत्र से ही संतुष्ट नहीं हो जाना, हमें इसे सामाजिक जनतंत्र भी बनाना होगा। बिना सामाजिक जनतंत्र के आधार के राजनीतिक जनतंत्र नहीं बन सकता। सामाजिक जनतंत्र का मतलब है एक ऐसी जीवन-पद्धति जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को जीवन के सिद्धांतों के रूप में स्वीकारती है। ये तीनों एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इन्हें एक-दूसरे से पृथक करने का मतलब जनतंत्र के उद्देश्य को ही समाप्त करना होगा... समानता नहीं होगी तो इसका मतलब बहुतों पर कुछ का आधिपत्य होगा और समानता बिना स्वतंत्रता के व्यक्ति की पहल की क्षमता को नष्ट कर देगी।’
स्पष्ट है, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के आधार पर ही हम राजनीतिक स्वाधीनता को सही मायने में स्थापित कर सकते हैं। ऐसे में जब हल्द्वानी जैसी कोई घटना सामने आती है तो यह सवाल उठता ही है कि छोटी जाति और बड़ी जाति वाली मानसिकता से हम कब और कैसे मुक्त होंगे? बाबासाहेब अंबेडकर ने अपने 25 नवंबर, 1949 वाले संबोधन में कहा था कि स्वतंत्र भारत में हम विरोधाभासों में जिएंगे। राजनीतिक दृष्टि से हम सब समान होंगे, पर सामाजिक और आर्थिक जीवन में हम में असमानता होगी। इन विरोधाभासों में हम ज़्यादा नहीं जी सकते। हमें इनसे मुक्त होना ही होगा। इनसे मुक्त हुए बिना हम अपनी राजनीतिक स्वतंत्रता को सुरक्षित नहीं रख सकते। स्पष्ट है, सामाजिक विषमता से हमें जल्दी से जल्दी मुक्ति पानी ही होगी। पर हल्द्वानी जैसी घटनाएं बताती हैं कि जानते-बूझते भी हम सामाजिक विषमता से मुक्त होने की कोई ईमानदार कोशिश नहीं कर रहे। आखिर क्यों?
इस क्यों का एक उत्तर तो यह है कि हमने जातिगत विषमता को अपनी राजनीति का हथियार बना लिया है। हल्द्वानी में कांग्रेस के अध्यक्ष को जिस अपमान का सामना करना पड़ा, उसमें जाति के आधार पर राजनीतिक नफे-नुकसान की गंध आ रही है। राज्यसभा में अपनी पीड़ा को उजागर करने वाले मल्लिकार्जुन खड़गे की मनोदशा को समझना मुश्किल नहीं है। कहने को हम कह सकते हैं कि खड़गे भी ऊंची जाति-नीची जाति की राजनीति खेल रहे हैं, पर इससे इस स्थिति में कोई अंतर नहीं पड़ता कि जातियों की गोलबंदी ने एक भारतीय समाज की हमारी प्राथमिकता को कहीं पीछे धकेल दिया है। सवाल सामाजिक बराबरी की लड़ाई में जीतने का है। यह जीत ही यह सुनिश्चित कर सकती है कि हम एक ऐसे समाज की परिकल्पना को कब साकार कर सकते हैं जिसमें जाति या धर्म के आधार पर नहीं, भारतीयता के आधार पर यह तय होगा कि कौन सही अर्थों में भारतीय नागरिक कहलाने का अधिकारी है और कौन नहीं। सही अर्थों में भारतीय कहलाने का अधिकारी वही है जो धर्म या जाति के आधार पर नहीं, देश के प्रति अपनी भावना के आधार पर अपनी निष्ठा को प्रमाणित करे। देश के प्रति अपनी निष्ठा का तकाज़ा है कि हम उस सोच को बदलें, उससे मुक्त हों, जो इंसानों के बीच फर्क करता है।
यह काम कानून से नहीं हो सकता। कानून तो हैं हमारे देश में, आवश्यकता इन कानूनों को सम्मान देने की है, अपने आचरण को उनके अनुसार बनाने की है। जब तक जातियों के आधार पर वोट मांगे जाते रहेंगे, जब तक जातियां यह तय करती रहेंगी कि किसे वोट देना चाहिए, किसको नहीं, तब तक हम जातीयता के बंधनों से मुक्त नहीं हो सकते। उस दिन हल्द्वानी के रामलीला मैदान में शुद्धीकरण के नाम पर जो कुछ हुआ, वह कुल मिलाकर जातीय शर्म का उदाहरण है। अनुसूचित जाति की किसी महिला का सरपंच बनना ही पर्याप्त नहीं है, आवश्यकता अपने भीतर यह भाव जगाने की है कि वह महिला पहले इंसान है, फिर कुछ और। कब जागेगा यह भाव?
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

