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आपदाओं से उबरने की क्षमता में वृद्धि जरूरी

क्लाइमेट रेजिलियंस

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जलवायु बदलाव के चलते मध्य हिमालय क्षेत्र में मौसमी अतिरेक से आपदाएं बार-बार आ रही हैं। जिससे प्रकृति, बुनियादी ढांचा व मानव जीवन प्रभावित हो रहा है। इससे जल्द उबरने को क्लाइमेट रेजिलियंस बढ़ाना महत्वपूर्ण है।

गर्म होती धरा, उससे उपजते वैश्विक जलवायु बदलाव व आपदाएं आकस्मिक व अतिशय घातक होते जा रहे हैं। कृषि, परिवहन, पर्यटन, स्वास्थ्य, शिक्षा, निर्माण संरचना जैसे क्षेत्रों में इनका प्रतिगामी असर जैविक व भौतिक दोनों पर पड़ा है। इससे बना-बनाया ध्वस्त भी हो जाता है। फिर से सब कुछ सहेजना मुश्किल होता है। आकस्मिक आपदाओं की निरंतरता के बीच हर क्षेत्र में क्लाइमेट रेजिलियंस बढ़ाने का मुद्दा केन्द्र में आ गया है।

मध्य हिमालय में जलवायु बदलाव के दो-तीन बड़े असर जाड़ों में भी वनों में आग, बादल विस्फोट, ग्लेशियर टूटने, ग्लेशियर झीलें बनने व ग्लेशियर पीछे खिसकने तथा अपनी मोटाई खोने के रूप में दिखते हैं। हिमस्खलन, भूस्खलन व दावानल की घटनायें बढ़ी हैं। मानव-वन्यजीव संघर्ष भी बढ़े हैं।

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सालों से ऐसा हो रहा है कि एक आपदा के बाद संभल नहीं पाते, दूसरी आ जाती है। उत्तराखंड 2025 में भी भारी आपदाग्रस्त रहा। इनसे हुई क्षति की आपूर्ति तो दूर की बात, अभी कहीं-कहीं बीते दशक की आपदाओं में क्षतिग्रस्त कई पुल व सड़कें भी अब तक नहीं बनाई जा सकी हैं। जरूरी है जल्दी से जल्दी सब कुछ सामान्य हो। उत्तराखंड व हिमाचल जैसे राज्यों को क्लाइमेट रेजिलियंस पर काम करने की आवश्यकता है। इसी परिप्रेक्ष्य में देहरादून में बीते 13 व 14 अक्तूूबर को ‘उत्तराखंड में जलवायु बदलाव रेजिलियंस पर मिलजुल कर कार्यवाही - राष्ट्रीय विचार विमर्श’ आयोजित किया गया था। सहमति के बिंदुओं पर आगे बढ़ने की रणनीति तैयार की जा रही है। क्लाइमेट रेजिलियंस किसी भी प्रणाली व जैविक-अजैविक एकांशों की वह क्षमता है जिससे जलवायु बदलाव प्रेरित अतिवृष्टि,अतिताप, अतिशीत अति बवंडर व समुद्री तूफानों की घटनाओं के आघातों-व्यवधानों से उबरकर वह पहले जैसी भूमिका निर्वहन में सक्षम हो जाता है।

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विकास की निरंतरता के लिये खेती, जलापूर्ति, सीवरेज प्रणाली, सड़कों, परिवहन, भवन, पुल, संचार, स्वास्थ्य सुविधाओं के बुनियादी ढांचे क्लाइमेट रेजिलियंट होने चाहिये। खेती क्लाइमेट रेजिलियंट होगी तो किसान की आय व खाद्य सुरक्षा में अनिश्चितता कम होगी। सीवरेज व पेयजल व्यवस्था क्लाइमेट रेजिलियंट होंगे तो स्वास्थ्य समस्याएं कम होंगी। ऐसी ही समस्या है सेनिटेशन सततता की। अतिशय बारिश, भूस्खलन, बाढ़ व सूखे जैसी जलवायु आपदायें सेनिटेशन प्रणालियों पर गंभीर असर डाल रही हैं। ऐसे में शौचमुक्त क्षेत्रों में फिर खुले में शौच होना शुरू हो जाता है। आपदाओं में शौचालय प्रणालियों को अबाधित बनाये रखने के लिये यूनीसेफ अपने वाश स्टाफ को जलवायु बदलाव अनुकूलन रणनीति पर प्रशिक्षण दे रहा है।

आजकल ई-गवर्नेंस व ई-बैंकिंग के साथ उद्योग, व्यवसाय, बैंकिंग व प्रशासकीय व्यवस्थाएं जुड़ी हैं तो क्लाइमेट रेजिलियंसी के मानक ये भी हैं कि बाढ़ आदि आपदा में यदि डाटा क्षतिग्रस्त हो जाएं तो उसकी रिकवरी यथाशीघ्र हो जाये।

क्लाइमेट रेजिलियंस आपदा के बाद की स्थिति का विवेचन है। आघात से उबरने में लगने वाले समय का आकलन है। यदि हम प्रोएक्टिव हों तो पूर्व चेतावनियों से आपदाओं के जोखिम कम कर सकते हैं जैसे बाढ़ या चक्रवाती तूफानों में लोगों को तटों से हटा सकते हैं। ग्लेशियर टूटने या उनमें झील बनने की संभावनाओं की मॉनिटरिंग संभव है।

प्रकृति पर भी जलवायु बदलाव से ग्लोबल वार्मिंग और मौसमी अतिरेकों व अनिश्चितताओं के कुप्रभाव कम नहीं हैं। प्राकृतिक घटकों की रेजिलियंस पर भी फोकस की जरूरत है। प्रकृति की मदद करेंगे तो प्रकृति क्लाइमेट रेजिलियंस पाने में मदद करेगी। किन्तु पूरे विश्व में ही प्राकृतिक संसाधनों की रेजिलियंस में मानवीय कृत्यों से कमी आई है। थोड़ी-थोड़ी दूरी पर बड़े-छोेटे बांध बनाकर अथवा सुरंगों में डाल कर उनके फ्लड प्लेनों पर निर्माण व अन्य अतिक्रमण कर उनके बहावों व फैलावों से नदियों को मिलने वाली रेजिलियंस क्षीण की। बेतरतीब कटान से पहाड़ी ढलानों से भूस्खलनों के जोखिम बढ़ाये। ग्लेशियरों की रेजिलियंस खत्म की उनके निकट तक भारी निर्माण व सड़क बनाकर। वहीं वायु मार्ग में भारी ट्रैफिक के प्रदूषण व कम्पन से। वनों की रेजिलियंस खत्म की आग, प्रदूषण, वन कटान से। जमीन की रेजिलियंस कम की ढलान खत्म करके। खेती की रेजिलियंस नष्ट की लैब निर्मित बीजों व रासायनिक खादों से।

क्लाइमेट रेजिलियंस विधिक, पर्यावरणीय व लैंगिक न्याय से भी जुड़ा विषय है क्योंकि जिनकी आपदा लाने में ना के बराबर भूमिका होती है वे भी इसका दंश झेलते हैं। यह अन्याय ही तो है कि उत्तराखंड के ग्रामीणोंं की गुहारों को नजरअंदाज किया। मसलन- उनके गांवों के नीचे सड़क या टनल बनाने के लिए बारूद विस्फोट न करें, उनके पुल के नीचे अवैध खनन न करें, उनके गांवों के ऊपर से सड़क कटानों का मलबा नीचे न फेंकें, समीपस्थ बांधों व जलाशयों में अत्यधिक पानी न भरें। इन सब कारणों से सुशासन जरूरी है। ताकि आपदा में टूटे पुल, सड़क स्कूल, अस्पतालों को बनने में सालों साल न लगें। क्लाइमेट रेजिलियंस पाने के लिये प्रभावित व्यक्ति या समुदाय की खुद को उबारने व मनोवैज्ञानिक आघातों से बाहर निकलने की मजबूत इच्छाशक्ति भी जरूरी है।

निस्संदेह क्लाइमेट रेजिलियंस पाने व उपाय अपनाने की क्षमता सामाजिक, आर्थिक और टैक्नॉलोजी तक पहुंच की असमानताओं के कारण अलग-अलग हो सकती है।

लेखक पर्यावरण वैज्ञानिक व सामाजिक कार्यकर्ता हैं।

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