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संसद में शालीन-जिम्मेदार व्यवहार की जरूरत

जनतंत्र संवाद के माध्यम से चलता है। देश के मतदाता ने सरकार को ही नहीं चुना, विपक्ष को भी चुना है। इसलिए दोनों को अपनी बात कहने का पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए। आज विडंबना यह भी है कि विपक्ष न...

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जनतंत्र संवाद के माध्यम से चलता है। देश के मतदाता ने सरकार को ही नहीं चुना, विपक्ष को भी चुना है। इसलिए दोनों को अपनी बात कहने का पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए। आज विडंबना यह भी है कि विपक्ष न बोलने देने की शिकायत कर रहा है।

लोकसभा के अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव रखा गया है। संभवत: मार्च के दूसरे सप्ताह में सदन में इस पर बहस होगी और लोकसभा में सरकारी पक्ष और विपक्ष के गणित को देखते हुए यह लगभग तय है कि प्रस्ताव अस्वीकृत ही होगा, पर सदन में इस तरह का प्रस्ताव आना ही अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण है। स्पीकर ओम बिरला पर विपक्ष ने पक्षपातपूर्ण आचरण और नेता प्रतिपक्ष को न बोलने देने का आरोप लगाया है।

यह पहली बार नहीं है कि हमारी लोकसभा में अध्यक्ष पर पक्षपातपूर्ण व्यवहार का आरोप लगा है। अब तक तीन बार इस आशय के प्रस्ताव सदन में रखे गये हैं। वस्तुतः पहली लोकसभा में ही सन‍् 1954 में तत्कालीन अध्यक्ष जी.वी. मावलंकर के खिलाफ ऐसा प्रस्ताव आया था। फिर 1966 और 1987 में ऐसा प्रस्ताव रखा गया। तीनों ही बार यह प्रस्ताव संख्याबल के आधार पर खारिज हो गया था। पर यह बात अपने आप में कम महत्वपूर्ण नहीं है कि लोकसभा के सदस्यों ने अपने विवेक के आधार पर ऐसा प्रस्ताव रखना ज़रूरी समझा था।

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जब पहली बार लोकसभा के अध्यक्ष के खिलाफ इस आशय का प्रस्ताव आया तो 479 सदस्यों वाले सदन में सत्तारूढ़ कांग्रेस के 364 सदस्य थे। प्रस्ताव का अस्वीकृत होना स्पष्ट था। जब इस पर बहस हुई तो उपाध्यक्ष ने दो घंटे का समय निर्धारित किया था। तब तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उपाध्यक्ष से आग्रह किया था कि सत्तारूढ़ पक्ष को कम बोलना स्वीकार होगा, आप विपक्ष को अपनी बात रखने के लिए अधिकाधिक समय दें! देश के प्रथम प्रधानमंत्री का यह कथन हमारी जनतांत्रिक परंपरा का एक ज्वलंत उदाहरण है। इस परिप्रेक्ष्य में यदि हम आज की स्थिति को देखते हैं, तो कुछ हैरानी होना स्वाभाविक है और कुछ पीड़ा का अनुभव करना भी। आज विपक्ष का आरोप है कि उसे सदन में बोलने नहीं दिया जाता।

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जनतंत्र संवाद के माध्यम से चलता है। देश के मतदाता ने सरकार को ही नहीं चुना, विपक्ष को भी चुना है। इसलिए दोनों को अपनी बात कहने का पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए। आज विडंबना यह भी है कि विपक्ष न बोलने देने की शिकायत कर रहा है।

बहरहाल, सदन में एक अराजकता-सी स्थिति पैदा हो गयी है। यह स्थिति बदलनी ही चाहिए और इसका एकमात्र उचित तरीका यह है कि दोनों पक्ष एक-दूसरे का सम्मान करने की जनतांत्रिक परंपरा का निर्वाह करें। जब सदन में बात करने का अवसर नहीं मिलता तो बात सड़क पर होती है। कई बार यह बात बहुत आगे बढ़ जाती है। दिल्ली में कृत्रिम मेधा के वैश्विक सम्मेलन में स्थिति कुछ ऐसे ही हो गयी थी जब कांग्रेस के दस-बीस कार्यकर्ता अपनी टी-शर्ट उतार कर प्रदर्शन कर रहे थे। विरोध प्रदर्शन यह रूप न लेता तो अच्छा था, पर ऐसा भी नहीं है कि इस प्रदर्शन से कोई पहाड़ टूट पड़ा है। दुनिया भर में, हमारे देश में भी, अक्सर विपक्ष ऐसे प्रदर्शन करता रहा है। वस्तुत: विरोध-प्रदर्शन जनता की व्यवस्था का एक जायज अधिकार है और इस तरह के प्रदर्शनों से कोई देश शर्मसार नहीं होता।

वे और बातें हैं जिनसे कोई देश शर्मिंदा होता है, या उसे शर्मिंदा होना चाहिए। जब देश के अस्सी करोड़ लोग अपना पेट भरने के लिए सरकार के मुफ्त अनाज पर निर्भर करते हैं, तब देश शर्मिंदा होता है। जब देश में युवाओं की बेरोज़गारी के आंकड़ों का ग्राफ बढ़ने लगता है, तब देश को शर्म आनी चाहिए। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन और भारत की एंप्लॉयमेंट रिपोर्ट के अनुसार आज देश के 83 प्रतिशत युवा बेरोजगार हैं। इन बेरोजगारों में स्नातकों की संख्या लगभग 30 प्रतिशत है। सरकारी संस्थानों में चपरासी के पद के लिए स्नातक और परास्नातक स्तर के छात्र आवेदन कर रहे हैं। इस तरह के तथ्य किसी देश को शर्मिंदा करते हैं। टी-शर्ट उतारने से बात नहीं बिगड़ती। टी-शर्ट तो हमारे क्रिकेट कप्तान ने भी तब उतारी थी जब इंग्लैंड में हमारी टीम ने विजय प्राप्त की थी। यह अपना उत्साह या अपनी हताशा प्रकट करने का भी एक तरीका होता है। इसे नंगई कहना ग़लत है।

हैरानी तो तब होती है जब देश का शीर्ष नेतृत्व इस परिप्रेक्ष्य में हल्की भाषा का उपयोग करता है। एक जवाहरलाल नेहरू थे जिन्होंने कहा था कि विपक्ष को अपनी बात कहने का अधिक अवसर मिलना चाहिए। यही नहीं, उन्होंने यह भी कहा कि सदन में विपक्ष की संख्या बहुत कम है, इसलिए सत्तारूढ़ कांग्रेस के सांसदों को जागरूक रहकर विपक्ष की भूमिका भी निभानी चाहिए, ताकि सरकार व्यर्थ का गर्व न करने लगे। यह व्यर्थ का गर्व किसी भी शासक के लिए उचित नहीं कहा जा सकता। गर्व की जगह घमंड शब्द काम में लें तो बात आसानी से समझ आ जाती है।

एक बात और है जिसका ध्यान रखा जाना जरूरी है। लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ रखा गया अविश्वास का प्रस्ताव भले ही संख्या-बल को देखते हुए सफल न हो पाये, पर किसी अध्यक्ष के खिलाफ ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ का आरोप लगना भी अपने आप में अफसोस की बात ही होती है। लोकसभा में एक लंबे अर्से से सही तरीके से काम नहीं हो पा रहा। विपक्ष द्वारा मचाये जाने वाले शोर- शराबे से किसी को एतराज हो सकता है, पर जनतांत्रिक परंपराओं का तकाज़ा है कि नेता विपक्ष को बोलने न देने के आरोप को गंभीरता से लिया जाये। नेता विपक्ष सामान्य सदस्य नहीं होता, जहां उससे अपेक्षा की जाती है कि वह अपनी जिम्मेदारी को समझेगा, वहीं सत्तारूढ़ पक्ष का भी दायित्व बनता है कि वह नेता प्रतिपक्ष की महत्ता को समझे।

लोकसभा या राज्यसभा के पीठासीन अधिकारियों से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपने व्यवहार से सभी पक्षों का विश्वास जीतेंगे। इसी तरह सत्तारूढ़ पक्ष के सांसदों से भी यह अपेक्षा की जाती है कि वह संसदीय मर्यादाओं का पालन करेंगे। पिछले एक अर्से में कई सदस्यों का व्यवहार शालीनता और जिम्मेदारी की सीमाओं का अतिक्रमण करता दिखता है। यह सही है कि सांसदों को यह अधिकार है कि वह संसद में कुछ भी कह सकते हैं, पर इस ‘कुछ भी’ पर पीठासीन अधिकारियों और स्वयं उनके विवेक का नियंत्रण रहना ही चाहिए। देश को यदि शर्मिंदा होना है तो इस अनियंत्रित व्यवहार पर होना चाहिए। संसद ही नहीं, हमारे मंत्री भी मर्यादाओं का उल्लंघन करते दिखे हैं। शर्म इस उल्लंघन पर आनी चाहिए।

हमारे नेता ‘नंगई’ शब्द का उपयोग किस अर्थ और किस संदर्भ में करते हैं, वे ही जानें, पर उन्हें इस बात का ध्यान तो रखना ही चाहिए कि उनका व्यवहार और उनके द्वारा उच्चारे गये शब्द किसी भी दृष्टि से घटिया न लगें। जब कभी ऐसा लगता है, शर्म आती है हमें। देश ऐसी ही बातों से शर्मिंदा होता है।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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