जमी बर्फ पिघलने के नहीं हैं संकेत

जमी बर्फ पिघलने के नहीं हैं संकेत

मनोज जोशी

 मनोज जोशी

पिछले शनिवार को समाचारपत्र ‘द ट्रिब्यून’ में छपी खबर के मुताबिक भारत-चीन सैन्य वार्ता में सीमा विवाद को लेकर कोई हल नहीं निकल पाया। आखिरी चरण 7 नवंबर को हुआ था, वैसे 6 जून से लेकर यह बैठक आठवीं थी। यद्यपि दोनों पक्ष वार्ता के एक और चरण के वास्ते तारीखें तय नहीं कर पाए।

लद्दाख में तापमान गिरता जा रहा है। उम्मीद बंधी थी कि दोनों पक्ष चीन जनित समस्या का हल निकाल लेंगे, जब उसने मई महीने में वास्तविक सीमा रेखा का कई जगहों पर उल्लंघन किया था। अब इसकी बजाय दोनों देशों ने वहां अपने सैनिकों के लिए विशेष कपड़ों और तंबुओं का इंतजाम कर डेरा जमा लिया है।

चीनी पक्ष की बातों से पता चलता है कि वे सीमा समस्या के लिए लगातार भारत को ही जिम्मेवार ठहराते रहे और उनका मानना है कि सीमा विवादों को दोनों मुल्कों के बीच सामान्य रिश्तों से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। उनका कहना है यदि भारत इस मुद्दे को जोड़ना चाहता है तो इससे समस्या और जटिल बन जाएगी। जब भारत ने अपना पक्ष रखने पर जोर दिया तो इस पर चीनियों ने भारत पर उचित प्रबंधन न करने और मतभेद कायम रखकर स्थिति और आगे न बिगाड़ने का उपदेश जड़ डाला। ऐस वक्त में जब चीनियों को अमेरिका के दबावों का सामना पड़ रहा है और चीनी अपनी आर्थिकी को अन्य मुद्दों से न जोड़ने के लिए नाना प्रकार के प्रयासों में लगे हैं, भारत की गतिविधियों का संज्ञान लेकर वे उसी दिशा में जा रहे हैं, भले ही चीनी व्यापार और निवेश पर भारत द्वारा लगाए प्रतिबंध बहुत असरदार नहीं हैं।

वास्तव में, वर्ष 1988-93 के बीच भारत ने वास्तव में सीमा विवादों को सामान्य रिश्तों से इतर रखा था। बाद में चीन के साथ व्यापारिक, निवेश, नागरिक सम्पर्क और सहयोग के रूप में वैश्विक एवं स्थानीय मुद्दों पर बहुस्तरीय रिश्ते बनाए रखे। किंतु गलवान घाटी और लद्दाख के अन्य पूर्वी हिस्से में चीन की वजह से हुई घटनाओं ने इस लीक को भंग कर दिया। चीन को यह जानने की जरूरत है कि एक बार जिन्न को बोतल से निकालने पर बोतल में वापस डालना आसान नहीं होता।

गलवान प्रसंग, जिसमें 20 भारतीय सैनिक शहीद हुए हैं, इसका देश पर बहुत गहरा असर हुआ है। खासकर जब वर्ष 1975 के बाद से वास्तविक सीमा रेखा पर झड़पों में कभी जानें नहीं गई थीं। भारतीय तंत्र व्यवस्था के मद्देनजर, चीनियों के लिए कई मर्तबा यह समझना मुश्किल होता है कि एक लोकतांत्रिक देश में सरकार लोगों के विचारों-भावनाओं को नजरअंदाज करना गवारा नहीं कर सकती। तथापि यह भी सच है कि भारत में मीडिया अक्सर भड़काऊ भूमिका निभाता है लेकिन फिर भी हमारे देश में मीडिया कमोबेश स्वतंत्र है, यहां तक कि मोदी सरकार के लिए भी इसे काबू में रखना मुश्किल है।

गलवान में, एक स्थानीय विवाद हाथ से बाहर निकल गया और भारतीय कमान की कमियों एवं नियंत्रण की खामियों ने अपना योगदान दिया। परंतु मुख्य जिम्मेवारी चीन की है क्योंकि अव्वल तो वहां उसके सैनिकों की मौजूदगी बनती ही नहीं थी।

जो भी हो, 1960 में खुद चीनियों ने वास्तविक सीमा रेखा की जो निशानदेही की थी, उसके मुताबिक चीनी सैनिक उस स्थान से 1 कि.मी. पीछे होने चाहिए थे, जहां झड़प हुई है और जहां वे अपनी निगरानी चौकी कायम रखने को बजिद हैं। सैटेलाइट तस्वीरों ने भी तस्दीक की है कि चीन ने बड़ी संख्या में सैनिक और उपकरण गलवान घाटी में इकट्ठा किए हैं और उसकी मंशा निगरानी और अपने हिस्से की वास्तविक सीमा रेखा की रक्षा करना नहीं बल्कि भारतीय क्षेत्र में घुसकर गलवान और शाईओक नदी के संगम तक 8 कि.मी. सड़क बनाना है। बाद में, चीनियों ने पूरी गलवान घाटी पर अपना दावा कर डाला। संयोगवश अब तो खुद यह भी कबूल कर लिया है कि उसके सैनिक भी झड़प में मारे गए हैं।

हालांकि तनाव को खत्म करने के प्रय़ास घटना के लगभग तुरंत बाद शुरू हो गए थे। खुद प्रधानमंत्री ने इनकार किया कि कोई घुसपैठ नहीं हुई है। शायद उन्हें ऐसा अपनी सरकार को कोताही के आरोप से बचाने के लिए करना पड़ा या फिर उन्हें उम्मीद थी कि इससे स्थिति शांत हो पाएगी।

सैन्य अधिकारियों के बीच वार्ताएं 6 मई से होनी शुरू हो गई थीं लेकिन बेनतीजा रही और अंततः इस मुद्दे पर दोनों मुल्कों के बीच 5 और 10 सितंबर को मास्को में बात हुई जब रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और विदेश मंत्री क्रमशः अपने चीनी समकक्षों से मिले थे।

दूसरी बैठक के बाद, जब दोनों विदेश मंत्री मिले थे, एक पांच सूत्रीय तनाव-घटाव प्रक्रिया अमल में लानी थी। 21 सितंबर को सैन्य अधिकारियों के बीच हुई बैठक के बाद इस ओर पहला कदम उठाया जाना चाहिए था- तयशुदा बिंदुओं के अनुसार दोनों पक्ष सीमा रेखा पर और अधिक सैनिक नहीं जोड़ेंगे और अपनी जगह बदलने से गुरेज करेंगे– परंतु ऐसा कुछ नहीं हुआ।

इस माह के आरंभ में मीडिया में अचानक हलचल बढ़ी कि पैंगोंग-चुशूल क्षेत्र को लेकर भारत-चीन में समझौते की सहमति बन गई है। क्रियान्वयन की शुरुआत पैंगोंग त्सो के उत्तरी तट से होनी थी, जहां चीनी सैनिकों ने मई के आरंभ में कब्जा कर फिंगर 4 से फिंगर 8 के बीच 8 कि.मी. क्षेत्र में किलेबंदी कर रखी है। चीनी पक्ष को फिंगर 8 के पूर्वी भाग तक भी पीछे हटना था, जबकि भारतीय सैनिकों ने भी फिंगर 2 और 3 पर अपनी जगहों से पीछे हटना था। इसके बाद यह इलाका ‘नो पेट्रोलिंग’ ज़ोन में तबदील हो जाता।

तदुपरांत चीनियों को अपने टैंक और भारी सैन्य उपकरण वास्तविक सीमा रेखा तक पीछे ले जाने थे, और अंत में दोनों पक्षों को पैंगोंग (कैलाश) पर्वतमाला स्थित पैंगोंग झील के दक्षिण तट पर अपनी-अपनी अग्रिम जगहों को खाली करना था, जिन्हें हाल ही में नियंत्रण में लिया गया था ताकि इलाका ‘नो पेट्रोलिंग’ ज़ोन बन सके।

किंतु तभी लगभग तुरंत, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के मुख्यपत्र ग्लोबल टाइम्स ने इन रिपोर्टों को खारिज कर दिया और इन्हें भ्रामक एवं अधकचरी सूचना ठहराया। किंतु जैसा कि एक टिप्पणीकार का कहना है कि उन्होंने बात को पूरी तरह नकारा भी नहीं है, यह स्वीकारोक्ति है कि दोनों पक्षों के बीच कुछ तो समझौता हुआ है, भले ही उतना विस्तृत न हो, जितना भारतीय मीडिया में बताया गया है। ग्लोबल टाइम्स की खबर में दावा किया गया कि भारतीय मीडिया की खबरें चीन पर दबाव बनाने और देश के अंदर राष्ट्रवाद बढ़ाने की गरज से हैं।

अब तक चीनियों ने ऐसा कोई संकेत नहीं दिया कि उन्हें अहसास है कि वे खुद वही हैं, जिन्होंने स्थिति बिगाड़ी है, चाहे यह वास्तविक सीमा रेखा हो या आपसी रिश्ते। इस सबके चलते, यह कयास लगाना महज बेवकूफी होगी कि स्थिति जल्द फिर से सामान्य हो जाएगी।

लेखक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में रिसर्च फेलो हैं।

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