एक तरफ तो शांति का नोबल पुरस्कार लेने की इतनी तलब थी कि खुद को पीस प्रेजिडेंट ही कहलाना शुरू कर दिया था। लेकिन फिर नोबल से मोहभंग हुआ तो ऐसा हुआ कि खुद ही वेनेजुएला पर चढ़ दौड़े और राष्ट्रपति को पकड़वाकर अमेरिकी अदालत में खड़ा कर दिया।
देखो भाई, बिना नोबल शांति पुरस्कार के तो शांति हो नहीं सकती थी। अगर दुनियावालों को शांति चाहिए थी, तो नोबल दिला देते। वरना तो यही होना था, जो ट्रंप ताऊ ने किया। वे दुनियाभर में युद्ध रुकवाते घूम रहे थे। कभी इस्राइल और फलस्तीन का युद्ध रुकवा रहे थे, तो कभी रूस-यूक्रेन का युद्ध रुकवा रहे थे। कभी गाजा को रिवेरा बना देने का प्लान दे रहे थे, तो कभी जेलेंस्की को व्हाइट हाउस में बुलाकर वैसे ही डांट रहे थे जैसे, किसी जमाने में जागीरदार अपनी हवेली पर बुलाकर किसानों को डांटा करते थे।
भारत-पाकिस्तान का युद्ध रुकवाने का श्रेय तो वे हर हफ्ते ही लेने की कोशिश करते थे। एक बार श्रेय लेते थे, फिर खुद को ही लगता था कि उन्होंने तो श्रेय दिया नहीं, चलो मैं ही एक बार फिर ले लेता हूं। इंडियावालों ने शुरू में तो इसकी गिनती रखी, लेकिन फिर गिनना बंद कर दिया। यार दुनिया में और भी काम होते हैं कि नहीं। अब तक तो वे सैकड़ों बार श्रेय ले चुके होंगे। तो एक तरफ तो शांति का नोबल पुरस्कार लेने की इतनी तलब थी कि खुद को पीस प्रेजिडेंट ही कहलाना शुरू कर दिया था। लेकिन फिर नोबल से मोहभंग हुआ तो ऐसा हुआ कि खुद ही वेनेजुएला पर चढ़ दौड़े और राष्ट्रपति को पकड़वाकर अमेरिकी अदालत में खड़ा कर दिया।
यह मोहभंग इतना गहरा था कि जिस मारिया मचाडो को इस बार का नोबल पुरस्कार मिला, उसे भी उन्होंने माफ नहीं किया। हालांकि बेचारी मचाडो उन्हीं की भक्त हैं और उन्होंने अपना नोबल पुरस्कार भी ट्रंप ताऊ को ही समर्पित किया है, लेकिन ताऊ की नाराजगी ऐसी कि मेरे रहते तुमने पुरस्कार ले कैसे लिया। कह देती मेरे ताऊ को दो। अरे यार, नोबल सारे अमेरिकी राष्ट्रपतियों को मिलता है, देखो ओबामा को भी मिल गया, तो मुझे क्यों नहीं मिला। इसी नाराजगी में वेनेजुएला पर हमला करने और राष्ट्रपति मादुरो को अगुवा करने के बाद भी उन्होंने मचाडो के हाथ में सत्ता देने से इंकार कर दिया। कहां तो वे रोज ताऊ को न्योता दे रही थीं कि आओ मेरे देश पर चढ़ाई कर दो और इन वामपंथियों को निकाल बाहर करो। दूसरे देशों में ऐसे लोगों को गद्दार कहा जाता है, देशद्रोही कहा जाता है, लेकिन मचाडो क्योंकि वामपंथियों की विरोधी हैं तो उन्हें नोबल पुरस्कार से नवाजा गया था।
लेकिन क्या काम आया यह पुरस्कार? सत्ता तो मिली नहीं। ताऊ ने दी ही नहीं। वे मचाडो को पूछ ही नहीं रहे। इंतजार में बैठी हैं, ताऊ लुकमा फेंक ही नहीं रहे। कह रहे हैं कि हम वेनेजुएला को चलाएंगे। पता नहीं जी, वह कैसे चलेगा। इराक की तरह चलेगा या अफगानिस्तान की तरह से चलेगा या फिर लीबिया की तरह से चलेगा। जो भी हो, ट्रप ताऊ ने अपनी तो चला ली!

