हम एक ‘मूर्ख समय’ में रह रहे हैं। यहां हर कोई हर किसी को मूर्ख बनाने में लगा पड़ा है। कोई ‘ज्ञान’ देकर मूर्ख बना रहा है तो कोई ‘पॉलिसी प्लान’ बेचकर।
एक मेरी ही नहीं, किसी की मूर्खता का कहीं कोई ‘इलाज’ नहीं। साफ शब्दों में कहूं तो मूर्ख ‘लाइलाज’ होते हैं! जरा ठंडे दिमाग से सोचिए, मूर्खों का भी अगर इलाज होने लगा तो फिर धरती पर से ‘मनोरंजन’ का नामो-निशान मिट जाएगा। यही वजह है कि मैं हर दम अपनी मूर्खता को ‘जिंदा’ बनाए रखता हूं। कोई कितना ही मेरे बारे में कुछ भी कहता फिरे मगर मैं अपनी मूर्खता का ‘दामन’ नहीं छोड़ता।
खुशनसीब होते हैं वे जो ‘मूर्ख’ होते हैं! बल्कि मैं तो कहता हूं, दुनिया का आधे से अधिक ‘भार’ मूर्ख ही उठा रहे हैं। मूर्ख किसी भी बात पर न तो अधिक ‘हाइपर’ होते हैं न अधिक ‘सीरियस’। हमेशा ‘कूल’ बने रहते हैं। उनकी कूलनेस ही उन्हें भीड़ से अलग करती है।
जाने कितने ही लोग मुझ पर ‘तुम मूर्ख हो’ का टोंट कस चुके हैं। यदा-कदा बीवी भी मुझे ऐसा ही कह देती है। किंतु मैं किसी के कहे का रत्तीभर बुरा नहीं मानता। बुरा क्यों मानूं भला? मूर्ख हूं तो हूं, इसमें छुपाने वाली कोई बात नहीं।
यह बात लिखकर रख लीजिए कि जरा-बहुत मूर्खता हममें से हर किसी में होती है। चाहे कोई कितना ही बड़ा ज्ञानी, बुद्धिजीवी, साहित्यकार, वैज्ञानिक, समाजशास्त्री क्यों न हो; थोड़ा-बहुत मूर्ख अवश्य होगा ही। बिना मूर्खता के न आप एक पल जी सकते हैं, न रह सकते। मूर्खता का विषाणु हर वक्त हम सब के शरीर से चिपका रहता है। राहत बस इतनी है कि यह विषाणु कभी किसी को नुकसान नहीं पहुंचाता।
मूर्खों ने हर दम अपनी मूर्खता को ‘एन्जॉय’ किया है। यह कहने में मुझे कतई ग्लानि नहीं कि मैं अपने समय का सबसे ‘मूर्ख व्यंग्यकार’ हूं। मुझे लिखने के आइडियाज अपनी मूर्खता से ही मिलते हैं। मेरी निगाह में वो लेखक लेखक ही नहीं जो मूर्ख न हो।
हम एक ‘मूर्ख समय’ में रह रहे हैं। यहां हर कोई हर किसी को मूर्ख बनाने में लगा पड़ा है। कोई ‘ज्ञान’ देकर मूर्ख बना रहा है तो कोई ‘पॉलिसी प्लान’ बेचकर। जितने तरह के लोग उतनी तरह की मूर्खताएं।
यह समय अपनी-अपनी मूर्खताओं को बचाने का है। मूर्खताओं से भागें नहीं, उसका आगे बढ़कर स्वागत करें।
बड़ी काम की होती हैं मूर्खताएं। अंत में सब मिट्टी में मिल जाना है, अगर कुछ बचा रहना है तो सिर्फ मूर्खताएं।
फिर कह रहा हूं, मूर्ख बने रहिए। दुनिया को मूर्ख बनाते रहिए। जीवन ‘मिथ्या’ हो सकता है किंतु ‘मूर्खता’ अजर-अमर है।

