लोकतंत्र के मुखौटे के पीछे राजतंत्र का चेहरा छुपा है। लोकतंत्र तो खेत में डंडे के बल खड़ा बिजूका है। शब्द का मायाजाल भर है।
मन में दबी इच्छा कभी इतनी तीव्र हो जाती है कि मन की भड़ास निकालने के लिए आदमी गली-गली, नुक्कड़ और चौराहे पर कपड़े फाड़ता नज़र आता है। ह्यूमन नेचर है। कभी गाली देकर तसल्ली कर लेता है, कभी पत्थर चलाता है। कभी सामने वाले के घर की खिड़की-दरवाज़ों के कांच फोड़ देता है। खंभा नोचने जैसी बात है। राजनीति में यह काम बिना नाम लिए किया जाता है। इस लिहाज़ से मसखरे का सहारा लिया जाता है। किसी बेरोज़गार के लिए यह धंधा पकौड़े या भजिए तलने से ज़्यादा अच्छा है। इसके अलावा पब्लिसिटी भी मिलती है। ज़माना भी पब्लिसिटी का है।
सबसे सस्ता, सरल और टिकाऊ धंधा है मसखरी का। पहले भी होते थे मसखरे, पर शालीनता के साथ कॉमेडी करते थे। पर जमाने के साथ उनका रूप बदल गया। अब मसखरे नहीं कहते उन्हें। स्टैंड-अप कॉमेडियन कहा जाता है। और भाई, कॉमेडी में बोलने की पूरी आज़ादी है। जितना चाहो कीचड़ उछालो। इसमें बुरा मानने की कोई बात नहीं है।
परंतु मसखरे और विषय का चयन महत्वपूर्ण होता है कॉमेडी में। फिर भी मसखरे को स्टैंड-अप कॉमेडियन कहना आजकल उसे सम्मानित करने जैसा है। और यह कार्य अंग्रेज़ी जैसी जेंटलमैन भाषा में आसानी से किया जा सकता है। मसखरे को बदलते दौर में मसखरा कहना उसकी शख्सियत में पलीता लगाने जैसा है। स्टैंड-अप कॉमेडियन कहने भर से समझ लो, मसखरा सातवें आसमान पर। आसमान का तारा। आजकल सड़क से लेकर संसद तक और पब्लिक मंचों पर कॉमेडी ही ज़्यादा चल रही है। अपने दिल की भड़ास निकालना हो तो एक कॉमेडियन यानी मसखरे को हायर कर स्टेज पर खड़ा कर दो। जो बात खुद से नहीं कही जा रही हो, वह वाया कॉमेडियन जनता तक पहुंचा दो।
वैसे भी नेताओं के भाषण में अब कुछ सार तो बचा भी नहीं है। वही हवा, पानी, सड़क, अमीरी और गरीबी के सिवाय। कभी अडानी पर सुन लो तो कभी अंबानी पर। कभी ईवीएम पर तो कभी इलेक्शन कमीशन पर। नेता के सौ खून माफ़। जो कुर्सी पर काबिज़ है, वह अंत तक छोड़ना नहीं चाहता। और जो सड़क पर है, वह येन-केन-प्रकारेण कुर्सी हथियाना चाहता है।
लोकतंत्र के मुखौटे के पीछे राजतंत्र का चेहरा छुपा है। लोकतंत्र तो खेत में डंडे के बल खड़ा बिजूका है। शब्द का मायाजाल भर है। अपने मुंह से कुछ न कह सको तो वृहन्नला जैसा कॉमेडियन तो है ही। खड़ा कर दो स्टेज पर। महाभारत में भी वृहन्नला की आड़ में तीर चले थे।

