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पंजाबियों की विवेकशीलता की परीक्षा होंगे आसन्न चुनाव

विधानसभा चुनाव

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लोकतंत्र की सार्थकता तब सिद्ध होती है, जब एक जागरूक मतदाता उन लोगों को नेतृत्व सौंपने में सक्षम हो, जो निःस्वार्थ भाव से प्रेरित हों और ऐसी राजनीति के प्रति प्रतिबद्ध हों, जिसमें मानवीय गरिमा और जनता के सम्मान को सर्वोच्च स्थान प्राप्त हो। उम्मीद की जानी चाहिए कि पंजाब ऐसी ऊर्जावान राजनीति का मार्गदर्शक बन सके।

अगले वर्ष के आरंभ में होने वाले पंजाब विधानसभा चुनाव राज्य के उथल-पुथल भरे राजनीतिक इतिहास में एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकते हैं। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य को देखते हुए, आगामी चुनाव राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के तौर-तरीकों और समीकरणों को नए सिरे से परिभाषित कर सकते हैं। स्वतंत्रता के बाद पहली बार पांच प्रमुख राजनीतिक दल सत्ता के लिए चुनावी मैदान में आमने-सामने होंगे। सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी यानी आप को चुनौती देने वाले चार विपक्षी दलों में ‘वारिस पंजाब दे’ भी शामिल है। यह एक नवोदित राजनीतिक संगठन है, जिसने अपने सुधारवादी तेवर और राजनीतिक बदलाव के वादे के कारण ग्रामीण सिख युवाओं के बीच उल्लेखनीय समर्थन हासिल किया है। यह स्थिति पारंपरिक राजनीतिक दलों के प्रति घटती जन-रुचि का भी संकेत देती है।

पंजाब की अस्मिता से जुड़े मुद्दों से काफी हद तक लोकप्रियता हासिल करने वाला यह नया राजनीतिक दल—अन्य दलों, विशेषकर अकाली दल, के मत प्रतिशत में सेंध लगा सकता है। हालांकि, संभवतः वह सत्तारूढ़ दल के लिए गंभीर चुनौती पेश करने की स्थिति में न हो। फिर भी, चुनावी मैदान में इसकी स्पष्ट उपस्थिति ने पंजाब के राजनीतिक संतुलन को प्रभावित किया है और उग्र राजनीति की वापसी को लेकर आशंकाओं को फिर से जन्म दिया है। राजनीतिक प्रासंगिकता पुनः हासिल करने का प्रयास कर रहे अकाली दल का सिमटता प्रभाव, तेजी से उभरती भाजपा और कांग्रेस द्वारा स्वयं को पहुंचाया गया राजनीतिक नुकसान—इन सभी ने मिलकर पंजाब की राजनीति का चेहरा बदला है। इसके साथ ही, अकाली दल और भाजपा के बीच संभावित गठबंधन चुनाव से पहले और चुनाव के बाद के राजनीतिक समीकरणों को पूरी तरह बदल सकता है। यह गठबंधन आप के सामने प्रमुख चुनौती के रूप में उभर सकता है। इन परिस्थितियों में, खंडित जनादेश और उससे पैदा होने वाली राजनीतिक अस्थिरता की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। विभिन्न विकास सूचकांकों पर पंजाब की आ रही गिरावट को तब तक पलटा नहीं जा सकता, जब तक राज्य के पुनर्निर्माण और नवोदय के लिए महत्वपूर्ण नीतियों पर व्यापक राजनीतिक सहमति न बने।

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जमीनी परिस्थितियां और एक सुदृढ़ लोकतंत्र की आवश्यकताएं राजनीतिक संवाद में शालीनता तथा संबंधों में मर्यादा-सौहार्द की मांग करती हैं। राजनीतिक नेताओं के बीच संवाद के सौहार्दपूर्ण माध्यम बने रहना आवश्यक है, क्योंकि राज्य के विकास के लिए विवेकपूर्ण नीतियों पर व्यापक सहमति बनाने हेतु नेताओं के बीच सहयोग और सामंजस्य अनिवार्य है। सोशल मीडिया पर राजनीतिक नेताओं के बीच सार्वजनिक रूप से होने वाली कटु और अस्वस्थ बहसें, जो अब एक अंतहीन तमाशे का रूप ले चुकी हैं, उनकी व्यक्तिगत विश्वसनीयता को कमजोर कर रही हैं। किसी की प्रतिष्ठा-गरिमा को कलंकित करना लोकतांत्रिक संवाद के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन है। हिंसक या भय उत्पन्न करने वाले स्वर में दिया गया वक्तव्य लोकतंत्र की उस सौम्यता और प्रभावकारी शक्ति को कमजोर करता है, जो राजनीतिक और सामाजिक जीवन को व्यवस्थित करने में उसकी केंद्रीय विशेषताएं हैं। इसलिए अब समय आ गया है कि सार्वजनिक संवाद का स्तर ऊंचा उठाया जाए।

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एक जीवंत और समृद्ध राज्य के रूप में पंजाब के पुनरुत्थान के लिए उदार और विशाल हृदय वाले नेतृत्व की आवश्यकता है। आज पंजाब को ऐसा नेता चाहिए, जो स्वयं से ऊपर उठ सके, वंचित और हाशिये पर खड़े लोगों के प्रति करुणा और संवेदनशीलता को शासन का मूल भाव बना सके, सत्ता-प्राप्ति के आकर्षण का प्रतिरोध कर सके। हमें ऐसे नेता चाहिए, जो दमनकारी अधिकार को अपनी शक्ति न समझें और ऐसे लोगों से दूरी बनाए रखें, जिनका नेतृत्व का दावा शक्ति-प्रदर्शन और समर्थकों के रूप में प्रस्तुत होने वाले सत्ता के दलालों की चाटुकारिता पर टिका हो। जनता के अन्याय और पीड़ा के प्रति उदासीन अहंकारी सत्ता का प्रतिरोध करना एक निर्विवाद नैतिक दायित्व है।

लोकतंत्र अंततः उन्हीं नेताओं के कारण टिकता है, जो शोषित और कमजोर लोगों की आंखों में छलकने से रह गए आंसुओं को देख सकें और उनकी दबी हुई आहों को सुन सकें। पंजाब की वीर और जीवट जनता, जो गुरुओं की शिक्षाओं से प्रेरणा लेती है, अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों से ऐसे शासन की अधिकारी है, जिसकी नींव कानून व न्याय पर टिकी हो।

एक जीवंत लोकतंत्र की वास्तविक कसौटी उसकी प्रक्रियाओं की शुचिता है—ऐसी प्रक्रियाएं, जो विचारों की स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा के माध्यम से प्रेरणादायी नेतृत्व को जन्म दे सकें। ऐसा नेतृत्व ‘चतुर व्यक्ति के अहंकार’ पर नहीं, बल्कि मानवीय स्थिति की समग्र समझ पर आधारित होना चाहिए। हम जानते हैं कि लोकतंत्र हमारे समय के नैतिक प्रश्नों पर सार्वजनिक तर्क-विमर्श का नाम है। पंजाब जब अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा को पुनः प्राप्त करने के लिए संघर्ष कर रहा है, तब उसे ऐसे नेताओं के नेतृत्व वाली सरकार की आवश्यकता है, जिनमें ‘दुस्साहसी आदर्शवाद’ हो; ऐसे नेता जो ऐसी दिशा तय कर सकें, जिससे लोगों में आशा का संचार हो। साथ ही, रोजगार सृजन, नशे की समस्या से निपटने के लिए सार्थक नीतियों, राज्य की शक्ति के घोर दुरुपयोग और उच्च स्तर पर भ्रष्टाचार पर प्रभावी अंकुश, राज्य की कृषि अर्थव्यवस्था के पुनर्गठन से जुड़े जटिल प्रश्नों पर विचारपूर्ण दृष्टिकोण, पर्यावरण संरक्षण तथा साझी विरासत पर आधारित सामाजिक सौहार्द के संरक्षण के माध्यम से उस आशा को ठोस रूप दिया जा सके।

इन चुनौतियों के बावजूद, क्या हम यह आशा कर सकते हैं कि राज्य के विधानसभा चुनावों में राजनीतिक दल जातिवादी और सांप्रदायिक राजनीति से ऊपर उठेंगे? क्या वे ऐसे नेताओं को सामने ला सकते हैं, जिनके पास वह नैतिक विश्वसनीयता हो, जो एक गौरवशाली और वीर जनता से ईमानदारी से संवाद कर सकें और उसे सम्मानपूर्ण जीवन का अवसर देने का संकल्प प्रस्तुत कर सकें? या फिर पंजाब को ऐसे लोगों का बोझ उठाते रहना होगा, जिनके लिए राजनीति सही और गलत की किसी भावना से मुक्त होकर केवल सत्ता हासिल करने का साधन है? ये ऐसे प्रश्न हैं, जिनका सामना राज्य के राजनीतिक दलों और नेताओं को करना ही होगा।

लोकतंत्र की सार्थकता तब सिद्ध होती है, जब एक जागरूक मतदाता उन लोगों को नेतृत्व सौंपने में सक्षम हो, जो निःस्वार्थ भाव से प्रेरित हों और ऐसी राजनीति के प्रति प्रतिबद्ध हों, जिसमें मानवीय गरिमा और जनता के सम्मान को सर्वोच्च स्थान प्राप्त हो। उम्मीद की जानी चाहिए कि पंजाब ऐसी ऊर्जावान राजनीति का मार्गदर्शक बन सके—ऐसी राजनीति, जो जनता की इच्छाशक्ति को जाग्रत करे, हमारे संस्थापकों के आदर्शवाद से प्रेरणा ले और उस इच्छाशक्ति को एक नए सार्वजनिक उद्देश्य में परिणत करे। इसके लिए राजनीतिक स्पेक्ट्रम के विभिन्न हिस्सों से श्रेष्ठ नेतृत्व और प्रतिभाओं को साथ लाने तथा राज्य में परिवर्तनकारी नेतृत्व के विकास के लिए आवश्यक परिस्थितियां तैयार करने की जरूरत होगी। अगले चुनाव में एक बार फिर पंजाब की जनता की सामूहिक विवेकशीलता की परीक्षा होगी।

लेखक केंद्रीय विधि और न्याय मंत्री रहे हैं।

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