अकेलापन केवल इस बात का परिणाम नहीं है कि व्यक्ति के आसपास लोग नहीं हैं, बल्कि तब भी महसूस हो सकता है, जब उसे अपने संबंधों में वह जुड़ाव और आत्मीयता महसूस न हो, जिसकी उसे आवश्यकता है। लंबे समय तक बना रहने वाला यह अकेलापन व्यक्ति की भावनाओं और व्यवहार को प्रभावित कर सकता है। उसकी नींद और शारीरिक स्वास्थ्य पर भी असर डाल सकता है।
हाल ही में जापान की प्रधानमंत्री साने ताकाइची ने सोशल मीडिया पर अपने कार्यालय का एक अनुभव साझा किया। उन्होंने बताया कि रात में काम करते हुए उन्हें वहां एक कॉकरोच दिखाई दिया। उन्होंने स्वयं उसे नहीं मारा और कुछ समय तक वह वहीं रहा। बाद में जब उनके स्टाफ ने उसे हटा दिया, तो उन्होंने लिखा—‘राहत तो मिली, लेकिन थोड़ा अकेलापन और उदासी भी महसूस हुई।’
‘लेकिन थोड़ा अकेलापन और उदासी भी महसूस हुई’—ये वे पंक्तियां हैं, जो मन में हजारों प्रश्नों को जन्म देती हैं। सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह कि क्या हम सब कहीं न कहीं बहुत अकेले हैं? आखिर ऐसा क्यों है कि लोगों से भरी इस दुनिया में भी किसी एक की कुछ पलों की मौजूदगी हमारे अकेलेपन को भर देती है और उसकी अनुपस्थिति फिर उसी अकेलेपन का एहसास करा जाती है? क्या मनुष्य के लिए साथ की जरूरत केवल तब होती है, जब वह सचमुच अकेला हो, या भीड़ के बीच भी किसी अपने की उपस्थिति उतनी ही जरूरी होती है?
दरअसल, हम सभी एक बहुत बड़े असत्य को सत्य मान बैठे हैं और वह यह कि जो व्यक्ति प्रभुत्वशाली है, धनी है या फिर जो प्रसिद्ध है, वही इस संसार में सबसे सुखी है। सुख की हमारी यह परिभाषा हमें निरंतर एक ऐसी दौड़ में ले जाती है, जहां हम उपलब्धियों की ऊंचाइयों को ही जीवन की सार्थकता मान बैठे हैं। लेकिन क्या सचमुच जीवन में किसी मुकाम को हासिल कर लेना व्यक्ति को भीतर से वह खुशी, आत्मसंतोष और तृप्ति दे देता है, जिसकी तलाश में वह इस पूरी दौड़ में शामिल होता है?
फिल्म निर्माता करण जौहर ने अपनी फिल्म ‘रॉकी और रानी की प्रेम कहानी’ के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिलने के बाद के एक अनुभव को साझा किया। उन्होंने बताया कि उस उपलब्धि की खुशी के बीच एक क्षण ऐसा आया, जब उनके मन में सवाल उठा—मैं आज रात क्या करूं? किसके घर जाऊं? किसका हाथ थामूं? मुझे खुशी महसूस करने के लिए पीठ पर एक छोटी-सी थपकी की जरूरत थी और मैं उसे चाहता था। उपलब्धि का यह क्षण अपने आप में बताता है कि खुशी का पूरा अर्थ उसे किसी के साथ साझा करने में ही है। अकेलापन केवल इस बात से तय नहीं होता कि हमारे आसपास कितने लोग हैं। असल सवाल यह है कि उन लोगों के बीच हम स्वयं को कितना जुड़ा हुआ महसूस करते हैं। हमारे जीवन में ऐसे संबंधों की जरूरत होती है, जहां हम अपनी खुशी बांट सकें, अपने दुख को कह सकें और बिना किसी संकोच के अपने मन की बात रख सकें। शायद इसी वजह से भीड़ के बीच भी अकेलेपन का अनुभव उतना ही वास्तविक हो सकता है, जितना बिल्कुल अकेले रहने पर। इसी मानवीय आवश्यकता को अब वैश्विक स्तर पर भी गंभीरता से समझा जा रहा है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के सोशल कनेक्शन पर गठित आयोग की रिपोर्ट ‘फ्रॉम लोनलीनेस टू सोशल कनेक्शन : चार्टिंग अ पाथ टू हेल्दियर सोसाइटीज’ बताती है कि सामाजिक अलगाव और अकेलापन व्यापक समस्या बन चुके हैं और उनका प्रभाव व्यक्ति के स्वास्थ्य, कल्याण और समाज पर गंभीर रूप से पड़ रहा है। रिपोर्ट सामाजिक जुड़ाव को मजबूत करने के लिए ठोस और व्यापक स्तर पर लागू किए जा सकने वाले उपायों की आवश्यकता पर जोर देती है।
रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया में लगभग हर छह में एक व्यक्ति अकेलेपन का अनुभव करता है और यह समस्या किसी एक उम्र या समाज तक सीमित नहीं है। विशेष रूप से किशोरों और युवाओं में इसका प्रसार अधिक है। रिपोर्ट यह भी रेखांकित करती है कि मजबूत सामाजिक संबंध केवल व्यक्ति के सुख और कल्याण के लिए ही नहीं, बल्कि उसके स्वास्थ्य, जीवन प्रत्याशा और व्यापक सामाजिक जीवन के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। ये तो वे आंकड़े हैं, जो दर्ज किए गए हैं, लेकिन वास्तविकता इससे कहीं व्यापक है।
सच यह है कि हम सभी भीड़ में कहीं न कहीं बहुत अकेले हैं और शायद ही इस दुनिया में कोई ऐसा व्यक्ति होगा, जिसने जीवन के किसी न किसी मोड़ पर अकेलेपन को महसूस न किया हो। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने जिस गंभीर प्रश्न पर चिंता व्यक्त की है, उस पर दशकों पूर्व ‘द लोनली क्राउड’ में सार्थक चर्चा की गई थी। 1950 में प्रकाशित यह पुस्तक आधुनिक समाज में व्यक्ति के सामाजिक जीवन और उसके भीतर बढ़ते अकेलेपन के विभिन्न पहलुओं को सामने लाती है। ‘द लोनली क्राउड’ बताती है कि लोगों के बीच रहना अपने आप में व्यक्ति को अकेलेपन से मुक्त क्यों नहीं कर पाता और सामाजिक जीवन का विस्तार होने के बावजूद व्यक्ति भीतर से अलग-थलग क्यों महसूस कर सकता है।
पुस्तक इस विरोधाभास की ओर संकेत करती है कि व्यक्ति समाज और भीड़ का हिस्सा होते हुए भी अपने भीतर एक ऐसे अकेलेपन का अनुभव कर सकता है, जिसे केवल लोगों की मौजूदगी से दूर नहीं किया जा सकता। अक्सर हम यह मान लेते हैं कि जीवन में सफलता, उपलब्धि और एक मुकाम हासिल कर लेने के बाद व्यक्ति को किसी के साथ की जरूरत कम हो जाती है। लेकिन मनोवैज्ञानिक रॉय बॉमिस्टर और मार्क लीरी के 1995 के शोध-पत्र ‘द नीड टू बिलॉन्ग: डिजायर फॉर इंटरपर्सनल अटैचमेंट्स ऐज अ फंडामेंटल ह्यूमन मोटिवेशन’ ने इस धारणा को एक अलग दृष्टिकोण दिया है। उनके अनुसार, मजबूत और स्थायी मानवीय संबंध बनाना और उन्हें बनाए रखना मनुष्य की एक मूलभूत मनोवैज्ञानिक आवश्यकता है। जीवन में हम किसी भी मुकाम पर क्यों न पहुंच जाएं, हमारे भीतर ऐसे संबंधों की जरूरत बनी रहती है, जहां स्नेह हो, परस्पर परवाह हो और यह भरोसा हो कि कोई हमारे सुख में सचमुच खुश होगा और कठिन समय में हमारे साथ खड़ा रहेगा। इस जरूरत का महत्व व्यक्ति की सफलता, पद या आर्थिक स्थिति से समाप्त नहीं होता।
दरअसल, अकेलापन वह सामाजिक पीड़ा है, जो धीरे-धीरे व्यक्ति को तोड़ता चला जाता है और इस सत्य को मनोवैज्ञानिक जॉन कैसिओप्पो और लुईस हॉकली ने बखूबी बयान किया है। वे अपने शोध ‘लोनलीनेस मैटर्स: अ थ्योरेटिकल एंड एम्पिरिकल रिव्यू ऑफ कॉन्सीक्वेंसेज एंड मेकैनिज्म्स’ में बताते हैं कि अकेलापन केवल इस बात का परिणाम नहीं है कि व्यक्ति के आसपास लोग नहीं हैं, बल्कि तब भी महसूस हो सकता है, जब उसके आसपास लोगों की कमी न हो, लेकिन उसे अपने संबंधों में वह जुड़ाव और आत्मीयता महसूस न हो, जिसकी उसे आवश्यकता है। लंबे समय तक बना रहने वाला यह अकेलापन व्यक्ति की भावनाओं और व्यवहार को प्रभावित कर सकता है तथा उसकी नींद और शारीरिक स्वास्थ्य पर भी असर डाल सकता है।
अकेलेपन से बचने के लिए केवल लोगों का आसपास होना या उनसे सहायता मिलना पर्याप्त नहीं है; मनुष्य को ऐसे पारस्परिक संबंधों की आवश्यकता होती है, जिनमें वह दूसरों के लिए भी उपस्थित हो और दूसरे भी उसके लिए उपलब्ध रहें। शायद यही वह बात है, जिसे हमारी व्यस्त जीवनशैली में हम सबसे अधिक भूलते जा रहे हैं। हम अपने लिए समय, अपनी सफलता और अपनी प्राथमिकताओं को तो लगातार जगह देते हैं, लेकिन क्या अपने संबंधों के लिए भी उतनी ही जगह बना रहे हैं?
लेखिका समाजशास्त्री एवं स्तंभकार हैं।

