विसंगति का नजरिया

भाषा की कसौटी पर न हो संवेदना की परख

भाषा की कसौटी पर न हो संवेदना की परख

उमेश चतुर्वेदी

चार महीने के अंतराल पर दुनिया के सामने आई दो कहानियों में कई समानताएं हैं। हाल ही में अल्मोड़ा की हंसी प्रहरी की कहानी और चार महीने पहले सामने आई इंदौर की रईसा अंसारी में समानता इतनी ही नहीं है कि दोनों की जिंदगी फुटपाथ से जुड़ी है। दोनों की कहानियां मीडिया के जरिए सामने आईं। इंदौर की रईसा फुटपाथ या ठेले पर फल बेचकर गुजारा करती है तो अल्मोड़ा की हंसी प्रहरी हरिद्वार में भीख मांग कर गुजारा करती है। दोनों की कहानियां दर्द से भरी हैं। उनकी जिंदगी में जो गुजरा या गुजर रहा है, उससे हमदर्दी होनी ही चाहिए। समाज से उन्हें हरसंभव ऐसी मदद मिलनी ही चाहिए ताकि उनकी जिंदगी बेहतर हो सके।

लेकिन दोनों कहानियों में एक बात गौर करने लायक है। इंदौर की रईसा अंसारी की कहानी पर दुनिया का ध्यान तब गया जब इंदौर नगर निगम के कर्मचारियों ने अतिक्रमण हटाने के नाम पर उनका ठेला हटाने की कोशिश की। इसके बाद तो जैसे मामूली फल बेचने वाली वह महिला काली बन गई और उसने फर्राटेदार अंग्रेजी में निगम कर्मचारियों को खरीखोटी सुनानी शुरू कर दी। इसके बाद लोगों का ध्यान गया। आखिर फल बेचने वाली महिला भला अंग्रेजी कैसे बोल सकती है। कुछ ऐसी ही स्थिति अल्मोड़ा की हंसी प्रहरी की भी रही। हरिद्वार में मैली-कुचैली अवस्था में बैठी एक भिखारिन को लोगों ने धाराप्रवाह अंग्रेजी में अपने बच्चे को पढ़ाते देखा। इसके बाद मीडिया का ध्यान उन पर गया। फिर तो अंग्रेजी बोलने वाली महिला की बदहाली सुर्खियां बन गई।

दोनों ही महिलाओं की बदहाली बड़ी घटना नहीं है। अव्वल तो होना यह चाहिए कि महिलाओं की बदहाली पर हमारा ध्यान जाना चाहिए लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इन दोनों की बदहाली पर ध्यान दुनिया का इसलिए गया क्योंकि दोनों ही महिलाएं अंग्रेजी बोल रही थीं। वह भी धारा प्रवाह। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि हमारे यहां अंग्रेजी बोलना पढ़ा-लिखा होने की पहचान ही नहीं, सुसंस्कृत होने की गारंटी है।

1835 में मैकाले ने भारत की शिक्षा व्यवस्था बदलने और ज्ञान-विज्ञान की धरती पर अंग्रेजी की पकड़ बढ़ाने और अंग्रेजी माध्यम के जरिए नए दौर का ज्ञान देने की जो नीति प्रस्तुत की, उसने बीसवीं सदी आते-आते देश और समाज के हर वर्ग और क्षेत्र को अपने घेरे में ले लिया। अंग्रेजी आधुनिकता और विद्वता का पर्याय बन गई। वह समृद्धि का भी प्रतीक बनी। अच्छे पदों और ऊंचे वेतन वाली नौकरियां हों या फिर राजनीति के शीर्ष पद, हर जगह अंग्रेजी जानने और बोलने वालों की ही पूछ और परख बढ़ी। अंग्रेजी में जिसे ऑब्सेशन कहते हैं, अंग्रेजी को लेकर हमारा समाज पूरी तरह ऑब्सेस्ड हो गया। इसका असर नौकरशाही पर भी नजर आता है। अब भी नीतियां अंग्रेजी में ही बनती हैं क्योंकि नीतियां बनाने वालों को अंग्रेजी ही ज्यादा आती है, वे अंग्रेजी में ही सोचते हैं।

अंग्रेजी शिक्षा का एक असर यह भी हुआ है कि गांवों तक के बच्चे अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा हासिल करने के बाद भारत की जमीनी हकीकत और संस्कृति के असल रंग, दोनों भूल जाते हैं। चूंकि वे सांस्कृतिक रूप से भी कट जाते हैं, लिहाजा जब भी नीतियां बनती हैं, ज्यादातर मामलों में वे जमीनी वास्तविकता से दूर होती हैं।

भारत में गोरे रंग और अंग्रेजी को लेकर देवत्व बोध करीब एक सौ साठ साल की ही बात है क्योंकि मैकाले ने भले ही भारतीय शिक्षा व्यवस्था को बदलने की नीति 1835 में प्रस्तुत की थी, लेकिन उसके खिलाफ पूरा देश खड़ा हो गया था और सही मायने में उसे 1860 में ही लागू किया जा सका। पहले स्वाधीनता संग्राम में नाकामी के बाद अंग्रेजी सरकार को भारतीय शिक्षा व्यवस्था का अंग्रेजीकरण करने में ज्यादा मदद मिली। इसके बाद के काल को भारत में पुनर्जागरण का काल कहा जाता है। अंग्रेजी को राजा राममोहन राय ने भारत की दीवार की ऐसी खिड़की बताया, जो बाहर खुलती थी और जिसके जरिए ताजी हवा का झोंका आता था। बेशक इस पुनर्जागरण के दौरान भारत ने नए मूल्य गढ़े, सती प्रथा का अंत किया, विवाह और उत्तराधिकार को लेकर स्पष्ट कानूनी प्रक्रिया शुरू की लेकिन इस दौरान जो सोच विकसित होनी शुरू हुई, उसने हमें अपनी जड़ों से काटा भी।

यही वजह है कि हमें किसी हंसी प्रहरी या रईसा अंसारी के वाजिब दर्द का पता नहीं चलता, जब तक वह देसी जुबान और अपनी भाषा में बात करती है लेकिन जैसे ही वह अंग्रेजी बोलने लगती है, हमारी छठी इंद्रिय जैसे जागृत हो जाती है। फिर हममें यह समझने-समझाने की होड़ लग जाती है कि अंग्रेजी बोलने वाले के साथ नाइंसाफी हो रही है। इसका एक बोध यह भी होता है कि क्या जो अंग्रेजी नहीं बोल पाता, या जिसने अंग्रेजी नहीं पढ़ी है, उसकी जिंदगी की चुनौतियों-परेशानियों की ओर हमारा ध्यान नहीं जाना चाहिए। हम हंसी या रईसा अंसारी के साथ खड़े जरूर हों, लेकिन सिर्फ इसलिए नहीं कि वे अंग्रेजी जानती हैं या बोल पाती हैं बल्कि इसलिए कि बदहाली से निकलना उनका हक है।

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