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मधुमय महक से स्वावलंबन की मिठास

मधुमय महक से स्वावलंबन की मिठास

अरुण नैथानी

जब हम जुनून को अपनी जीविका से जोड़ लेते हैं तो सफलता निश्चित रूप से कदम चूमती है। उस सफलता से हासिल कामयाबी न केवल प्रतिष्ठा व जीविका का जरिया देती है, बल्कि हजारों लोगों की प्रेरणा की वजह भी बनती है। हरियाणा के यमुनानगर जनपद में हाफिजपुर गांव के सुभाष कांबोज की कामयाबी की मधुमय महक इतनी तेजी से फैली कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दो बार मन की बात कार्यक्रम में उनकी प्रेरणादायक सफलता का उल्लेख करना पड़ा। एक पिछले रविवार 91वें एपिसोड में और एक बार सवा साल पहले। दो दशक पहले मुश्किल से हासिल छह बॉक्सों से मधुमक्खी पालन करने वाले सुभाष कांबोज आज दो हजार बॉक्सों के जरिये मधुमक्खी पालन कर रहे हैं। साल में शहद उत्पादन का उनका टर्न ओवर दो करोड़ के लगभग है। वे सम्मान पूर्वक न केवल अपनी जीविका चला रहे हैं बल्कि अब तक करीब साढ़े तीन हजार लोगों को मधुमक्खी पालन का प्रशिक्षण देकर स्वावलंबन की मुहिम भी चला रहे हैं। वे आज कृषि विश्वविद्यालयों में व्याख्यान देने जाते हैं और किसानों को खेती के साथ इस नकदी के व्यवसाय में निवेश के लिये प्रेरित करते हैं। करीब दस एकड़ में खेती करने वाले सुभाष ने एक बगीचा भी लगाया है, जहां मधुमक्खियों को पराग उपलब्ध हो सके।

बातचीत ने सुभाष बताते हैं कि पढ़ाई के दौरान मित्र कुलदीप के साथ स्कूल जाया करता था। फोन तब थे नहीं, चार किलोमीटर उसके गांव पहुंचकर स्कूल साथ जाते थे। उसके खेत में मधुमक्खी पालन के लिये छह बॉक्स रखे थे। मन खाने के लिये शहद जुटाने हेतु लालायित था, लेकिन दोस्त से बॉक्स नहीं मिल पाये। दोस्त ने कहा- मधुमक्खियां काट लेंगी, शहद मेरे से ले जाना। मन में कसक थी। बाद में महाराष्ट्र से डीपीएड का डिप्लोमा करने के बाद निजी स्कूल में शिक्षक बन गये। लेकिन मन में कुछ अलग करने की ललक थी। संयोग से वह मित्र विदेश चला गया तो उनके भाई से 1992 में वे छह मधुमक्खी पालन के बॉक्स हासिल कर लिये। आज मेहनत, अध्ययन व पुरुषार्थ से हासिल दो हजार बॉक्स से वे मधुमक्खी पालन करते हैं।

सुभाष अपनी प्रेरणा मधुमक्खियों को बताते हैं। उनका कहना मधुमक्खी ही एकमात्र ऐसा जीव है जो सोता नहीं है। चौबीस घंटे काम करती हैं। उम्र के हिसाब से उनका काम बंटा रहता है। यह धारणा गलत है कि वे सिर्फ रानी मधुमक्खी के इशारे पर काम करती हैं। मधुमक्खियों का काम बेहद सुव्यवस्थित व नियमित होता है। सुभाष मौसम व तापमान के अनुरूप दूसरे राज्यों में बॉक्स लगाने जाते हैं। वहां पराग के लिये फूलों की जरूरतों के मुताबिक कहीं किराये पर जमीन लेते हैं कहीं परती भूमि पर बॉक्स लगाते हैं ताकि वर्ष पर्यंत शहद मिलता रहे। अलग-अलग फूलों व फसलों के अनुरूप शहद की गुणवत्ता निर्धारित होती है। वे गुणवत्ता के शहद का विपणन देश में खुद करते हैं। वहीं सरसों के फूलों के शहद की अमेरिका आदि देशों में खासी मांग है जिसे गुणवत्ता का शहद माना जाता है।

दरअसल, सुभाष कांबोज ने खादी ग्रामोद्योग से प्रशिक्षण लेने के अलावा मधुमक्खियों के जीवन को लेकर व्यापक अध्ययन किया, जिसकी मिठास अब उन्हें इस कारोबार में हो रही है। बाजार में मिलने वाले बड़ी कंपनियों के शहद की गुणवत्ता के प्रश्न के बीच उनके शहद की खासी मांग रहती है। यही वजह है कि जहां उनका स्वावलंबन का जीवन सुखद हुआ है वहीं आसपास के लोगों को भी वे प्रेरित कर रहे हैं।

आज सुभाष कंबोज के परिवार के लोग भी उनके इस काम में हाथ बंटाते हैं। वे अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दे पाये हैं। बेटे अभिनव ने बीटेक कर ली है और बेटी नैन्सी ने एमबीबीएस कर लिया। पत्नी सुनीता भी संबल देती हैं। बेटा उनके शहद के मिठास भरे कारोबार में हाथ बंटाने को उत्सुक है।

यह पूछने पर कि क्या शहद निकालने पर मधुमक्खियां प्रतिरोध नहीं करतीं? वे बताते हैं कि उनका शहद उस समय निकाला जाता है जब पराग के लिये पर्याप्त फूल उपलब्ध हों और मक्खियों के शहद बनाने की प्रक्रिया बाधित न हो। वे कहते हैं कि मधुमक्खियों की याददाश्त ऐसी नहीं होती कि इस बॉक्स में छत्ता बनाया तो शहद चला गया, अब यहां दुबारा शहद नहीं बनाना। वे अधिक शहद वाली अनेक प्रजातियों की मधुमक्खियों का पालन करते हैं। शहद के साथ ही वे अन्य उत्पादों के जरिये अपनी आय को बढ़ाते हैं। वे किसानों को प्रेरित करते हैं कि हरियाणा सरकार के विभिन्न विभागों की तरफ से मधुमक्खी पालन के लिये कितनी सब्सिडी व अन्य सुविधाएं मिलती हैं। सुभाष कांबोज जैसे अनेक लोग मधुमक्खी पालन में प्रेरणादायक पहल कर रहे हैं जिनमें जम्मू के विनोद कुमार, कर्नाटक के मधुकेश्वर हेगड़े व गोरखपुर के निमित सिंह शामिल हैं। ये पुरुषार्थी युवाओं को संदेश दे रहे हैं कि नौकरियों का मोह त्यागें और मेहनत व संकल्प से अपने जीवन में शहद सी मधुमय मिठास घोलें। दरअसल, सुभाष कंबोज जैसे लोग केवल शहद का ही कारोबार नहीं कर रहे हैं बल्कि इससे जुड़े छह उत्पादों मसलन मोम, रायल जैली आदि का भी कारोबार कर रहे हैं। यानी आम के साथ गुठलियों के भी दाम मिल रहे हैं। निस्संदेह शहद की मिठास अब किसानों का जीवन भी बदलने लगी है और बड़ी आय का जरिया भी बन रही है। वैसे भी शहद न केवल स्वाद दे रहा है बल्कि आरोग्य भी।

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