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शांति स्थापना में मीडिया की आध्यात्मिक दृष्टि मददगार

वर्तमान अशांत वैश्विक दौर में ब्रह्माकुमारी मिशन आध्यात्मिक चिंतन के माध्यम से शांति स्थापना के लिए अथक प्रयास कर रहा है। इस मिशन के साथ-साथ मीडिया भी यदि शांति के लिए हो रहे प्रयासों में अपना भरसक योगदान करने लगे...

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वर्तमान अशांत वैश्विक दौर में ब्रह्माकुमारी मिशन आध्यात्मिक चिंतन के माध्यम से शांति स्थापना के लिए अथक प्रयास कर रहा है। इस मिशन के साथ-साथ मीडिया भी यदि शांति के लिए हो रहे प्रयासों में अपना भरसक योगदान करने लगे तो इस दिशा में विश्व जनमत और मजबूत हो सकता है।

ओम‍् शांति। वैसे तो ‘ओम’ रूपी इस अपार शांति सागर में मेरे विचार गागर में एक बूंद की माफिक होंगे। फिर भी वैश्विक शांति के लिए मीडिया की भूमिका कैसी होनी चाहिए, इस विषय पर अपने अनुभव, अपने विचार और सुझाव रखने का प्रयास कर रहा हूं। तो चलिये, ‘नीड ऑफ ग्लोबल पीस, रोल ऑफ मीडिया’ के विषय पर चर्चा की शुरुआत कुछ इस तरह से करते हैं :-

कलम उठे तो अमन की कहानी लिखी जाये, हर एक खबर में इंसानियत दिखी जाये।

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मीडिया अगर ठान ले दिलों को जोड़ना, तो धरती पर जन्नत की निशानी लिखी जाये।

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निस्संदेह, विश्व आज सर्वाधिक अशांत दौर से गुज़र रहा है। चारों तरफ भय और असुरक्षा का माहौल है। व्यक्ति, राष्ट्र से लेकर विश्व स्तर तक स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। कोरोना काल से लेकर, यूक्रेन युद्ध और आजकल अमेरिका-इस्राइल और ईरान द्वंद्व तक के संघर्ष ने दुनिया के अरबों लोगों के जीवन को अशांत बनाकर रख दिया है। हाल के दशकों में वैश्वीकरण और उदारीकरण के बाद दुनिया को एक वैश्विक गांव बनाने का जो सपना देखा गया था वह ध्वस्त होता नज़र आ रहा है। ऐसे हालात में ‘नीड ऑफ ग्लोबल पीस एंड रोल ऑफ मीडिया’ विषय आज निश्चित रूप से समय की मांग है।

आज जहां संयुक्त परिवार बिखर कर ‘एकल’ में सिमटने लगे हैं, दाम्पत्य जीवन में टूटन बढ़ रही है। भागदौड़भरी जिंदगी जी रही युवा पीढ़ी में सहनशीलता, धैर्य का क्षरण हो रहा है। परिवार से लेकर समाज तक और समाज से लेकर देश-विदेश तक मानव मनोविकारों का संत्रास हमारे भाईचारे को, विश्व बंधुत्व के हमारे सपनों को चकनाचूर कर रहा है। सोचा तो यह था कि तकनीकी उन्नति समाज को और देशों को जोड़ने का काम करेगी, लेकिन उलटे दुनिया संघर्षों में उलझी दिखायी पड़ रही है। पूरी दुनिया में युद्ध, मृत्यु, तबाही, विस्थापन और मानवीय विपदाओं का अंतहीन सिलसिला चल निकला है। निस्संदेह ब्रह्माकुमारी मिशन विपदाओं के इस सिलसिले को थामने में आध्यात्मिक चिंतन के माध्यम से अथक प्रयास कर रहा है। इस मिशन के साथ-साथ मीडिया भी शांति के लिए हो रहे प्रयासों में अपना भरसक योगदान करने लगे, अपनी सक्रिय भूमिका निभाने लग जाये तो इस दिशा में विश्व जनमत और मजबूत हो सकता है। पत्रकार युद्ध का सच बताने के साथ-साथ अगर बुद्ध के सच को भी उजागर करें तो यह समूची मानवता के लिये एक कल्याणकारी ऋषिकर्म होगा। संयोग से आज बुद्ध पूर्णिमा भी है, इसके लिए आप सबको बधाई!

इस मंच से उल्लेख जरूरी है कि जिस नारी के महत्व, जिस नारी की शक्ति को आज विश्वभर में पहचान मिलने लगी है। जिस नारी का वंदन करते हुए हमारी देश-प्रदेश की सरकारें 33 प्रतिशत का आरक्षण देने का प्रयास और प्रचार कर रही हैं, उस नारी की शक्ति को, उसके महत्व को ब्रह्माकुमारी मिशन के संस्थापक ब्रह्मतुल्य प्रजापिता ने कई दशक पूर्व आंक लिया था। आपकी इस संस्था में 35 या पचास नहीं, बल्कि शत-प्रतिशत आरक्षण नारी शक्ति के लिये कब का हो चुका। आपके प्रणेता जी ने भारतीय संस्कृति के संदेश : ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः’ को पहले ही आत्मसात‍् कर लिया।

शांतिप्रिय बंधुओ, बहनो और भाइयो, इस मंच से मुझे यह बताते हुए भी गर्व का अनुभव हो रहा है कि ‘द ट्रिब्यून ट्रस्ट पब्लिकेशन’ की हमारी संस्था में भी उच्च पदों पर नारी शक्ति का वर्चस्व है। द ट्रिब्यून की प्रधान संपादक, पंजाबी ट्रिब्यून की संपादक, दैनिक ट्रिब्यून की समाचार संपादक, चंडीगढ़, शिमला और दिल्ली ब्यूरो की प्रमुख के अलावा मानव संसाधन (एचआर) विभाग की प्रमुख भी बहन ही हैं। ट्रिब्यून संस्थान और ब्रह्माकुमारी विवि के मिशन में कई समानताएं भी हैं। ट्रिब्यून की स्थापना करीब 145 साल पहले तत्कालीन अविभाजित भारत के लाहौर में हुई थी और ब्रह्माकुमारी संस्था की स्थापना करीब सौ साल पहले कराची में हुई थी। ट्रिब्यून संस्थान वर्ष 1881 से स्वतंत्रता आंदोलन, जनजागरण, सामाजिक सद्भाव और शांति फैलाने में भी अहम भूमिका निभा रहा है।

तो चलिये विश्व शांति और इसमें मीडिया की भूमिका विषय पर फिर लौटते हैं। परिवारों से लेकर समाज तक और समाज से लेकर विश्व तक को शांति की माला में पिरोने के लिये निश्चय ही मीडिया अहम भूमिका निभा सकता है, विश्व शांति के लिये जनमत तैयार कर सकता है और इस तरह जागरूक हुआ जनमत दुनिया के नीति-नियंताओं से यह सवाल कर सकता है कि आखिर शांति के लिये बनाये गये संगठन अपना फर्ज अदा क्यों नहीं कर पा रहे। कौन सी शक्तियां हैं, जो इन संस्थानों को पंगु बना रही हैं। दुनिया के मठाधीशों से पूछा जाना चाहिये कि वैश्विक भाईचारा और विश्व शांति के उद्देश्य से बनाये गये संगठनों, मसलन- संयुक्त राष्ट्र, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय, विश्व स्वास्थ्य संगठन, अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष, जी-ट्वेंटी, जी-सेवन, ब्रिक्स और क्वाड के होते हुए अमेरिका, रूस जैसी महाशक्तियां, इस्राइल और आतंकी शक्तियां मानवता को रौंदने पर क्यों तुली हैं?

अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक सक्रिय मीडिया के मेरे साथियों, उठाओ अपना गांडीव रूपी कलम का अस्त्र, दागो। अरे विश्व शांति के मसीहा का ढोंग रचने वाले महाशक्तिमानो, आप किस हैसियत से नोबेल शांति पुरस्कार पाने की जुगतें भिड़ा रहे हैं। मीडिया के शक्तिमानो जतला दो उन्हें कि कभी न कभी शांति का उजाला उनके झूठ के अंधकार को अवश्य निगल जायेगा। ऐसे हथियार विक्रेताओं को एक शायर की यह आवाज सुना दो :-

‘तिरे चराग़ अलग हों मिरे चराग़ अलग, मगर उजाला तो फिर भी जुदा नहीं होता।’

मीडिया के मेरे दोस्तो, यह सच्चाई हमें माननी पड़ेगी कि सूचना की गति भले तेज हुई है, मगर संवेदना की गहराई कम हो रही है। मानवता के कल्याण के लिये हमें भी ब्रह्माकुमारी मिशनरियों की भांति शांति दूत की भूमिका निभानी होगी। मीडिया समाज का दर्पण ही नहीं बल्कि उसका मार्गदर्शक भी है। मीडिया की ताकत पर किसी शायर ने ठीक ही कहा है :-

लफ्जों से ही बनते हैं रिश्तों के कारवां, मीडिया चाहे तो जोड़ दे जहां।

इसलिए आज पीत पत्रकारिता की नहीं, बल्कि पीस पत्रकारिता की जरूरत है। युद्ध की तस्वीरें जरूरी हैं, मगर शांति-वार्ता की मेज की तस्वीरें उससे भी ज्यादा जरूरी हैं। महात्मा गांधी, बुद्ध, दादी प्रकाशमणि जी जैसे शांति दूतों के संदेश भी मीडिया की सुर्खियां बनें। याद रखिये, सरहदें नहीं रोक सकतीं संवेदनाओं का सैलाब। देश, धर्म, जाति चाहे अलग-अलग हों, दर्द सबका एक सा है। आंसू सबके एक से हैं। खून सबका एक सा है।

ब्रह्माकुमारी दीदी अक्सर कहती हैं, ‘विचारों’ से संसार बनता है। मीडिया विचारों का सबसे बड़ा माध्यम है। यदि मीडिया ठान ले तो चौबीस घंटे में पूरी दुनिया की सोच बदल सकता है। ब्रह‍्माकुमारी मिशन हमें सिखाता है कि शांति बाहर नहीं, भीतर से शुरू होती है। वैश्विक शांति के लिये मीडिया को संक्षेप में ये चार सूत्र देते हुए अपने विचारों को विराम देता हूं। एक- संवाद को संघर्ष पर प्राथमिकता दें। दो- संवेदनशील मुद्दों को संतुलित दृष्टिकोण से प्रस्तुत करें। तीन- सकारात्मक न्यूज़ स्टोरीज को प्रमुखता दें और अंत में चार- आध्यात्मिक मूल्यों करुणा, सहिष्णुता और मानवता को मंच प्रदान करें। ओम शांति।

(माउंट आबू स्थित ब्रह्माकुमारी संस्थान में 'नीड ऑफ ग्लोबल पीस, रोल ऑफ मीडिया' विषय के उद्घाटन सत्र में दिए गए व्याख्यान के अंश)

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