प्रश्न यह है कि 1816 में ‘काली’ किसे कहा जाता था, 1817 में संधि की व्याख्या कैसे हुई, बाद के नक्शे क्यों बदले।
नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने भारत-नेपाल सीमा के उस विवाद को फिर उठाया है, जिसकी जड़ें 1816 की सुगौली संधि और उसके बाद हुए ब्रिटिश सर्वेक्षणों तक जाती हैं। खनाल ने 15 सितंबर को नेपाल की प्रतिनिधि सभा में कहा कि लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा को नेपाल के राजनीतिक मानचित्र में शामिल करना हमारा राष्ट्रीय संकल्प है।
इस विवाद की कुंजी दो सौ साल पुराने एक सवाल में छिपी है—सुगौली संधि में जिस ‘काली नदी’ को सीमा माना गया, उसका वास्तविक उद्गम कहां है? नेपाल लिम्पियाधुरा की ओर से आने वाली लंबी और अधिक जलसमृद्ध कुटी-यांगती को काली या महाकाली की मूल धारा मानता है, जबकि भारत की ऐतिहासिक-प्रशासनिक स्थिति कालापानी क्षेत्र को उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले का हिस्सा मानती रही है। इसलिए यह जमीन से पहले नदी की पहचान का विवाद है।
1814-16 के आंग्ल-नेपाल युद्ध के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के बीच हुई सुगौली संधि के अनुच्छेद पांच ने काली नदी को नेपाल की पश्चिमी सीमा का आधार बनाया। लेकिन संधि ने ऊपरी हिमालय में नदी के वास्तविक उद्गम को स्पष्ट निर्देशांकों से परिभाषित नहीं किया। कैप्टन विलियम जे. वेब ने 1815 से 1821 के बीच कुमाऊं का सर्वेक्षण किया। मई, 1816 तक काली के ऊपरी स्रोतों तक पहुंच चुका था। कालापानी के झरने उसके शुरुआती सर्वेक्षण में महत्वपूर्ण भौगोलिक चिह्न के रूप में दर्ज हुए।
वर्ष 1817 में ही यह विवाद ब्रिटिश भारतीय प्रशासन और नेपाल दरबार के सामने आ गया था। नेपाल के दावे की जांच के बाद काली के पूर्व में स्थित तिंकर और छांगरू क्षेत्र नेपाल को सौंप दिए गए। इसके बाद नेपाल ने पश्चिम की ओर दावा बढ़ाते हुए कहा कि कुटी घाटी से आने वाली कुटी-यांगती को काली की मुख्य धारा माना जाना चाहिए। बाद में ‘हिमालयन गजेटियर’ में दर्ज विवरण के अनुसार वेब और अन्य अधिकारियों का मत था कि कालापानी के पवित्र स्रोत से निकलने वाली अपेक्षाकृत छोटी धारा को परंपरागत रूप से काली की मुख्य शाखा माना जाता था और उसी ने नदी को उसका नाम दिया।
सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज 5 सितंबर, 1817 का तत्कालीन सरकारी निर्णय है। कुमाऊं के कमिश्नर जी.डब्ल्यू. ट्रेल को भेजे गए आदेश में गवर्नर-जनरल लॉर्ड मोइरा की सरकार ने नेपाल के कुटी और नाबी संबंधी दावे को स्वीकार नहीं किया। कालापानी नाम की धारा को काली की प्रमुख शाखा और दोनों राज्यों के बीच सीमा मानने की व्याख्या की गई। इस प्रकार सुगौली संधि के तत्काल बाद ही विवाद की जांच हुई और कुटी-नाबी पर नेपाल का विस्तारित दावा अस्वीकार कर दिया गया।
नेपाल उन्नीसवीं सदी के कुछ ब्रिटिश मानचित्रों को अपने पक्ष का प्रमाण मानता है। कुछ शुरुआती नक्शों में लिम्पियाधुरा से आने वाली पश्चिमी धारा को ‘काली’ दिखाया गया है। बाद के नक्शों में इसी धारा का नाम कुटी और फिर कुटी-यांगती दिखाई देने लगता है। यही विवाद का महत्वपूर्ण विरोधाभास है। 1817 का प्रशासनिक पत्राचार भारत के ऐतिहासिक पक्ष के समर्थन में प्रमाण प्रस्तुत करता है, जबकि कुछ ब्रिटिश मानचित्र नेपाल को अपने दावे के लिए आधार देते हैं।
नेपाल का दूसरा प्रमुख तर्क जलविज्ञान पर आधारित है। लिम्पियाधुरा की ओर से आने वाली कुटी-यांगती लंबी है, उसका जलग्रहण क्षेत्र बड़ा है और उसका प्रवाह भी कालापानी की धारा से अधिक बताया जाता है। नदी-विज्ञान में मुख्य धारा पहचानने के लिए लंबाई, प्रवाह और जलग्रहण क्षेत्र महत्वपूर्ण मानदंड होते हैं। नेपाली शोधकर्ता इसी आधार पर इसे वास्तविक ऊपरी काली या महाकाली मानते हैं। लेकिन अंतर्राष्ट्रीय सीमा केवल आधुनिक जलवैज्ञानिक सिद्धांत से निर्धारित नहीं होती। संधि में प्रयुक्त नदी का अर्थ तय करने में यह भी महत्वपूर्ण है कि संधि के समय दोनों पक्ष किस धारा को उस नाम से पहचानते थे, तत्कालीन प्रशासन ने संधि की कैसी व्याख्या की और बाद में किसका निरंतर प्रशासन रहा।
यदि कालापानी से निकलने वाली धारा को सुगौली संधि वाली काली माना जाए तो सीमा की एक रेखा बनती है; यदि लिम्पियाधुरा से निकलने वाली कुटी-यांगती को वही काली माना जाए तो सीमा काफी पश्चिम खिसक जाती है। लिपुलेख का महत्व इसे और संवेदनशील बनाता है। यह क्षेत्र भारत, नेपाल और तिब्बत-चीन के संगम के निकट है। लिपुलेख सदियों से हिमालय पार व्यापार का मार्ग रहा है और आज कैलास-मानसरोवर यात्रा का महत्वपूर्ण रास्ता है।
इस विवाद ने 2020 में नया रूप तब लिया, जब नेपाल ने राजनीतिक मानचित्र जारी कर लिम्पियाधुरा, कालापानी और लिपुलेख को उसमें शामिल किया तथा संविधान संशोधन के जरिए उसे संवैधानिक मान्यता दी। भारत ने इस एकतरफा मानचित्रण को अस्वीकार किया।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

