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साझा सहमति में ही जलवायु परिवर्तन का विकल्प

कॉप-30 सम्मेलन
चित्रांकन संदीप जोशी
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कॉप-30 सम्मेलन ने जलवायु संकट के समाधान में साझा सहमति का संकेत दिया, लेकिन जीवाश्म ईंधन, वित्तीय सहायता और प्रभावी कार्रवाई पर मतभेद बने रहे, जो समाधान की राह को जटिल बनाते हैं।

विगत दिनों ब्राजील के बेलेम में संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन कॉप-30 सम्पन्न हो गया। सम्मेलन के अंत में, जैसी पहले से उम्मीद थी, सभी देशों का मिलकर काम करने का संकल्प लेना संभव नहीं दिखा। सम्मेलन के आखिरी दिन जीवाश्म ईंधन को चरणबद्ध तरीके से खत्म करने को लेकर जो खींचतान हुई, वह दुनिया को आश्वस्त करने की दिशा में विश्वसनीय नहीं प्रतीत हुई। यही नहीं, सम्मेलन में अनिश्चितता का आलम यह रहा कि जीवाश्म ईंधन से जुड़ी वैश्विक योजना का उल्लेख पहले ड्राफ्ट में किया गया था, जिसे बाद में संशोधित ड्राफ्ट से हटा दिया गया। इससे यह साफ हो गया कि जीवाश्म ईंधन का मुद्दा आने वाले दौर में भी अनसुलझा ही रहेगा। जैसा कि 11 नवम्बर को सम्मेलन की शुरुआत में यह उम्मीद बंधी थी कि सम्मेलन में भाग लेने वाले दुनियाभर के देश ग्लोबल वार्मिंग के खिलाफ किसी ठोस नतीजे पर पहुंच जाएंगे, आखिरकार सम्मेलन जिस मुकाम पर पहुंचा, उसने साबित कर दिया कि वैश्विक तापमान वृद्धि को नियंत्रित करने के मामले में सम्मेलन कुछ भी करने में नाकाम रहा।

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इसके बावजूद सम्मेलन में हुई जलवायु वार्ता को कई मायनों में अभूतपूर्व कहा जा रहा है। इसका अहम कारण यह रहा कि सम्मेलन में मौजूद दुनियाभर के 194 देशों ने तमाम तरह के मतभेदों, तनावों और अमेरिका की गैर-मौजूदगी के बावजूद एक ऐसे पैकेज पर सहमति दर्ज की। गौरतलब है कि जलवायु मुद्दे पर इसे बेलेम पॉलिटिकल पैकेज की संज्ञा दी जा रही है। उम्मीद है कि यह पैकेज वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने की राह आसान करेगा। दरअसल, दुनियाभर के 194 देशों की जलवायु मुद्दे पर एकमत से सहमति यह जाहिर करती है कि अब जलवायु मुद्दा वैश्विक नेतृत्व का सवाल नहीं रह गया है और न ही यह नैतिक मुद्दा है, बल्कि अब यह आर्थिक सुरक्षा और विकास का भी सवाल बन चुका है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि आज दुनिया बेहद गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है। इसके बावजूद, अधिकांश देशों ने वैश्विक तापमान वृद्धि को दो डिग्री सेल्सियस के नीचे रखने और 1.5 डिग्री सेल्सियस के लक्ष्य को लेकर अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखाई है। तेजी से बढ़ता हुआ कार्बन उत्सर्जन और तापमान में वृद्धि मानव अस्तित्व के लिए गंभीर खतरे की घंटी बनते जा रहे हैं। इसके पीछे प्रमुख कारण विकसित देशों का अपनी कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने के प्रति संजीदगी से काम न करना है। जबकि इन देशों को अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करते हुए निर्धारित समय सीमा से पहले ‘नेट जीरो’ लक्ष्य हासिल करने की दिशा में कदम उठाना चाहिए था, क्योंकि इन देशों का कार्बन उत्सर्जन में सबसे बड़ा योगदान है।

यह जानते हुए कि अब हमारे पास समय बहुत कम बचा है और पेरिस समझौते को प्रभावी रूप से लागू करना अत्यंत आवश्यक है, मुख्य रूप से तीन सवालों पर विचार करना जरूरी है। पहले, दुनियाभर के देशों द्वारा जलवायु कार्रवाई को कैसे आगे बढ़ाया जा सकता है। दूसरे, तकनीक, राहत राशि और वित्तीय सहायता उन देशों तक कैसे पहुंचाई जा सकती है, जो इससे सबसे अधिक प्रभावित हैं और जिन्हें इसकी सबसे अधिक आवश्यकता है। तीसरे, जलवायु कार्रवाई को समग्र और समावेशी तरीके से कैसे लागू किया जा सकता है। इन तीन प्रश्नों के मध्य ही समग्र जलवायु समाधान की दिशा तलाशनी होगी।

मौजूदा देशों ने यह स्वीकार किया कि विकासशील देशों के हितों को प्राथमिकता देना अब समय की आवश्यकता है। खासकर, जलवायु परिवर्तन से प्रभावित गरीब देशों के लिए फंड के आवंटन को लेकर सम्मेलन में सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया कि इन देशों को मौसम के कहर से निपटने के लिए तीन गुना अधिक वित्तीय सहायता दी जाएगी। इसके अलावा, विकसित देशों से यह अपील की गई कि वे 2035 तक जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए गरीब देशों को दी जाने वाली राशि को कम से कम तीन गुना बढ़ा दें।

हालांकि, अधिकतर देशों ने जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए एकजुट होने की कोशिश की, लेकिन अमीर और विकासशील देशों, साथ ही तेल, गैस और कोयला उद्योग से जुड़े देशों के बीच मतभेद बने रहे। ये मतभेद उनके पुराने दृष्टिकोण को दर्शाते हैं, और यह साफ दिखता है कि इन मुद्दों पर वे अभी भी अपनी स्थिति से पूरी तरह अडिग हैं। इसके अलावा, जंगलों की सुरक्षा जैसे अहम मुद्दे पर आम सहमति न बन पाने के कारण यह भी अनसुलझा ही रह गया।

भारत का यह दृढ़ मत रहा है कि विकसित देशों को तय अवधि से पहले ‘नेट जीरो’ लक्ष्य तक पहुंचना चाहिए। उनको भारत से सबक लेना चाहिए जो अपने विकास कार्यक्रम और पर्यावरण संरक्षण पहल को साथ-साथ आगे बढ़ा रहा है। इसी का परिणाम है कि भारत 2070 की समय सीमा से पहले ही नेट जीरो का लक्ष्य हासिल कर लेगा। भारत ने सम्मेलन को आश्वस्त किया कि वह संशोधित एनडीसी साल 2035 तक समय पर घोषित कर देगा। हकीकत यह है कि जलवायु संकट बढ़ाने में जीवाश्म ईंधन कोयला, गैस और तेल अभी भी सबसे बड़े जिम्मेदार हैं और जैसा कि आशा थी कि सम्मेलन में जीवाश्म ईंधन की मजबूत लॉबी जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने के रोडमैप जारी होने में अड़ंगा लगाएगी और वह अंतत: अपने मकसद में कामयाब भी रही।

बेलेम से यह साफ संकेत दिया गया कि दुनिया की ऊर्जा की कहानी अब पहले जैसी नहीं रही, वह अब बदल रही है। कुल मिलाकर बेलेम से निकली हवा ने साफ कर दिया है कि दुनिया भले पहले से कहीं ज्यादा विभाजित है, लेकिन जलवायु कार्रवाई पर बनी सहमति यह संकेत देती है कि साझा संकट साझा समाधान चाहता

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