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परिवार परवरिश में महिला की भूमिका अनमोल

देश के सर्वोच्च न्यायालय ने टिप्पणी करते हुए कहा था ‘पत्नी द्वारा घर के लिए दिया गया योगदान अमूल्य है और उसे धन के रूप में मापा नहीं जा सकता। पत्नी द्वारा अपने बच्चों और पति के प्रति सच्चे प्रेम...

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देश के सर्वोच्च न्यायालय ने टिप्पणी करते हुए कहा था ‘पत्नी द्वारा घर के लिए दिया गया योगदान अमूल्य है और उसे धन के रूप में मापा नहीं जा सकता। पत्नी द्वारा अपने बच्चों और पति के प्रति सच्चे प्रेम और स्नेह के साथ तथा घरेलू मामलों के प्रबंधन में जो नि:शुल्क सेवाएं प्रदान की जाती हैं, उनकी तुलना अन्य व्यक्तियों द्वारा दी जाने वाली सेवाओं से नहीं की जा सकती।’

पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसले में मोटर दुर्घटना में मृतक गृहिणी के परिवार को दिए जाने वाले मुआवजे को 58.22 लाख से बढ़ाकर 1.18 करोड़ कर दिया है। न्यायमूर्ति सुदीप्ति शर्मा ने फैसला सुनाते हुए कहा कि गृहिणी का काम अमूल्य है और इसे कम करके नहीं आंका जा सकता। न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि यदि गृहिणी द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाओं को खुले बाजार में आउटसोर्स किया जाता, तो उन्हें काफी अच्छा वेतन मिलता।

ऐसा पहली बार नहीं हुआ कि न्यायालय को गृहिणी के श्रम के अवमूल्यन को लेकर कठोर टिप्पणी करनी पड़ी हो। 27 अप्रैल, 2009 को ‘नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम नाबालिग दीपिका’ के मामले में, मद्रास उच्च न्यायालय ने 2000 के यूनिसेफ के उद्धरण को दिया। यूनिसेफ ने कहा था कि ‘अवैतनिक देखभाल कार्य मानवीय अनुभव का आधार है’। देखभाल कार्य वह है जो एक महिला मां के रूप में करती है और निश्चित रूप से भारत में, मां की भूमिका की सामाजिक अवधारणा को देखते हुए, महिला स्वयं इस भूमिका को आर्थिक मूल्य देने वाली अंतिम व्यक्ति होगी। लेकिन जब हम किसी दुर्घटना में मां की मृत्यु के कारण बच्चे को हुए नुकसान का आकलन कर रहे होते हैं, तो हम देखभालकर्ता के कार्य को मौद्रिक मूल्य देना आवश्यक समझते हैं, क्योंकि अंततः, घर ही वह मूलभूत इकाई है जिस पर हमारा सभ्य समाज टिका हुआ है।’

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ठीक इसी तरह 2010 में ‘अरुण कुमार अग्रवाल बनाम नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड’, मामले में देश के सर्वोच्च न्यायालय ने टिप्पणी करते हुए कहा था ‘पत्नी द्वारा घर के लिए दिया गया योगदान अमूल्य है और उसे धन के रूप में मापा नहीं जा सकता। पत्नी द्वारा अपने बच्चों और पति के प्रति सच्चे प्रेम और स्नेह के साथ घरेलू मामलों के प्रबंधन में जो नि:शुल्क सेवाएं प्रदान की जाती हैं, उनकी तुलना अन्य व्यक्तियों द्वारा दी जाने वाली सेवाओं से नहीं की जा सकती।’ न्यायालय ने यह भी कहा ‘पत्नी/माता द्वारा परिवार—अर्थात‍् पति और बच्चों—को दी गई सेवाओं के एवज में किसी भी राशि का परिमाण निर्धारित करना संभव नहीं है। तथापि, आश्रितों को प्रतिकर प्रदान करने के उद्देश्य से, गृहिणी/माता की सेवाओं का कुछ आर्थिक आकलन किया जाना आवश्यक है।

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इस संदर्भ में ‘सेवाएं’ शब्द को व्यापक अर्थ दिया जाना चाहिए और इसका निर्माण इस बात को ध्यान में रखते हुए किया जाना चाहिए कि मृतका द्वारा एक माता के रूप में अपने बच्चों को तथा एक पत्नी के रूप में अपने पति को दी गयी व्यक्तिगत देखभाल और ध्यान अब उपलब्ध नहीं रहा। आश्रित, मृतका द्वारा प्रदान की गई नि:शुल्क सेवाओं की हानि के बदले पर्याप्त प्रतिकर पाने के हकदार हैं। देय राशि इस आधार पर कम नहीं की जा सकती कि कोई निकट संबंधी, जैसे दादी, स्वेच्छा से परिवार को कुछ सेवाएं प्रदान करने के लिए आगे आ सकता/सकती है, जो पहले मृतका द्वारा दी जाती थीं।’ न्यायालय के इस मामले में केम्प एंड केम्प द क्वांटम ऑफ़ डैमेज़ेज़ का उल्लेख किया गया था।

उल्लेखनीय है कि केम्प एंड केम्प द क्वांटम ऑफ़ डैमेज़ेज़ टॉर्ट लॉ (नुकसान की भरपाई का कानून) पर आधारित एक विधिक ग्रंथ है, जिसे विशेष रूप से मुआवज़े की गणना के लिए मानक संदर्भ माना जाता है। इसमें प्रतिपादित किया गया है कि क्षतिपूर्ति का निर्धारण केवल आय की प्रत्यक्ष हानि तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उस वास्तविक, व्यावहारिक तथा संभावित क्षति का भी समुचित आकलन किया जाना चाहिए, जो मृतक द्वारा प्रदान की जा रही सेवाओं के अभाव में उसके आश्रितों को सहन करनी पड़ती है। यदि मृतक एक गृहिणी थी, तो यह कहना कि वह परिवार के लिए कोई आर्थिक योगदान नहीं देती थी, न तो तर्कसंगत है और न ही न्यायसंगत, क्योंकि गृहिणी द्वारा प्रदान की जाने वाली घरेलू सेवाएं—जैसे भोजन तैयार करना, बच्चों का पालन-पोषण, घरेलू प्रबंधन, पारिवारिक सदस्यों की देखभाल तथा नैतिक और बौद्धिक मार्गदर्शन—स्वभावतः अत्यंत मूल्यवान होती हैं, भले ही उनके लिए कोई प्रत्यक्ष पारिश्रमिक प्राप्त न होता हो।

ग्रंथ यह स्पष्ट करता है कि ऐसी सेवाओं का मूल्यांकन बाज़ार में उपलब्ध समकक्ष सेवाओं की लागत के आधार पर किया जाना चाहिए। साथ ही यह भी स्वीकार करता है कि कोई बाहरी व्यक्ति इन सेवाओं की भावनात्मक, नैतिक और निरंतर गुणवत्ता की पूर्ण भरपाई नहीं कर सकता। अतः न्यायालयों को गृहिणी की सेवाओं के मूल्यांकन में यथार्थवादी, व्यापक एवं न्यायोचित दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।

वर्ष 1934 में, अमेरिकी अर्थशास्त्री मार्गरेट रीड ने एक अलग दृष्टिकोण सुझाते हुए तर्क दिया कि यदि गृहिणियों द्वारा किए जाने वाले अवैतनिक कार्यों के लिए किसी तीसरे व्यक्ति को भुगतान किया जा सकता है, तो ऐसे कार्यों को उत्पादन के हिस्से के रूप में गिना जाना चाहिए। दुनिया भर की अदालतें यह मानती हैं कि गृहिणियों के योगदान को नकारा जाता रहा है। इस संदर्भ में ‘मेहमत बनाम पेरी (1977) 2 ऑल ईआर 529’ में इंग्लैंड की अपीलीय अदालत की टिप्पणी गौरतलब है कि ‘पत्नी द्वारा परिवार को दी जाने वाली सेवाएं केवल घरेलू कार्य तक सीमित नहीं हैं।’ न्यायालय ने बच्चों के प्रति मातृत्व-देखभाल तथा पति के प्रति व्यक्तिगत ध्यान और संगति की हानि को स्वतंत्र क्षतिपूर्ति योग्य शीर्ष माना। यह निर्णय स्थापित करता है कि पत्नी/माता की नि:शुल्क सेवाओं का वास्तविक आर्थिक मूल्य है और उसे साधारण घरेलू कर्मचारी की सेवाओं के समकक्ष नहीं आंका जा सकता। अरुण कुमार अग्रवाल बनाम नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड’, मामले में सर्वोच्च न्यायालय नेसेडॉ (सीईडीएडब्ल्यू) सम्मेलन की सामान्य सिफारिश संख्या 17 का उल्लेख किया था।

उक्त सामान्य सिफारिश महिलाओं की अवैतनिक घरेलू गतिविधियों के मापन और मात्रा निर्धारण तथा सकल राष्ट्रीय उत्पाद में उनकी मान्यता से संबंधित है। प्रासंगिक सिफारिशें ‘महिलाओं की अवैतनिक घरेलू गतिविधियों को मापने और उनका मूल्यांकन करने के लिए अनुसंधान और प्रयोगात्मक अध्ययनों को प्रोत्साहित और समर्थन करती है। उदाहरण के लिए, अपने राष्ट्रीय घरेलू सर्वेक्षण कार्यक्रमों के हिस्से के रूप में समय-उपयोग सर्वेक्षण आयोजित करके और घरेलू और श्रम बाजार दोनों में गतिविधियों पर बिताए गए समय पर लिंग के आधार पर अलग-अलग आंकड़े एकत्र करके; महिलाओं की उन्नति के लिए रणनीतियों की तलाश करने, महिलाओं की अवैतनिक घरेलू गतिविधियों को सकल राष्ट्रीय उत्पाद में शामिल करने और उनका मात्रात्मक मूल्यांकन करने की बात करती है। साथ ही अनुच्छेद 18 अपारिश्रमिक घरेलू गतिविधियों को मापने और उनका मूल्यांकन करने के लिए किए गए अनुसंधान और प्रयोगात्मक अध्ययनों के साथ-साथ राष्ट्रीय खातों में महिलाओं की अपारिश्रमिक घरेलू गतिविधियों को शामिल करने में हुई प्रगति के बारे में जानकारी शामिल करने की वकालत करता है। भारत उक्त सम्मेलन का हस्ताक्षरकर्ता है और उसने 9 जुलाई, 1993 को सीईडी सम्मेलन की पुष्टि की। लेकिन तब भी उचित व्यवस्था के लिए कोई कानून नहीं बनाया गया है, जिससे महिलाओं द्वारा घरेलू कार्यों का मूल्यांकन हो सके।

लेखिका समाजशास्त्री हैं।

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