मौजूदा शिक्षा व्यवस्था की स्थिति व शैक्षणिक संस्थानों के लगातार ह्रास का असर छात्रों पर पड़ रहा है। इस दौर में युवा पीढ़ी जिस तनाव से गुजर रही है, वह चिंताजनक है। छात्रों में बढ़ते तनाव, आत्महत्याएं, सरकारी स्कूलों की बदहाली, कोचिंग का फैलता जाल, अकादमिक आज़ादी पर संकट और शिक्षा का बाज़ारीकरण गंभीर जाखिम हैं। सकारात्मक यह कि छात्र आवाज बुलंद कर रहे हैं। बेहतर होगा शिक्षक भी आगे आएं।
यह कहने में मुझे (लेखक को) कोई संकोच नहीं कि जब छात्र शिक्षक दिवस पर शुभकामनाएं भेजते हैं, तो साथ मिलकर किए गए काम और क्रमिक विकास के उन खूबसूरत दिनों को याद करके खुशी महसूस होती है। बहुत आभार के साथ उन महान शिक्षाविदों को भी याद करता हूं जिनके प्रभाव ने पढ़ाने के मेरे तौर-तरीके को स्वरूप दिया। निस्संदेह, डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का स्मरण होता है- उनकी विद्वत्ता और दार्शनिक सोच का। सावित्रीबाई फुले भी जेहन में आते हैं-हमारे पुरुष प्रधान और जाति-व्यवस्था वाले समाज में दबे-कुचले व हाशिए पर पड़े लोगों के बीच जागरूकता फैलाने के लिए उनकी हिम्मत और समर्पण के लिए।
लेखक के मुताबिक, ‘अपने ढंग से मैं पाउलो फ्रेरे और बेल हुक्स जैसे लोगों के विचारों से जुड़ा- मुक्त विचारयुक्त शिक्षा की भावना, जिसने हमें प्रेरित किया; या मुझे रवींद्रनाथ टैगोर की काव्यात्मक रचना ‘ए पोएट्स स्कूल’, जिद्दू कृष्णमूर्ति की किताब ‘स्कूल विदाउट फियर’ और गिजूभाई बधेका के अद्भुत शिक्षण प्रयोग-जिसका ज़िक्र उनकी किताब ‘दिवास्वप्न’ में है-इनसे पुनः प्रेरित होना मुझे पसंद है। खुशी है कि किसी सत्ता के लालच ने नहीं, बल्कि सीखने, भूलने व अध्यापन के आनंद ने मेरी नियति को आकार दिया।’
तथापि, लेखक स्वीकार करते हैं कि मौजूदा कठिन दौर में, उन्हें कुछ बेचैनी महसूस होने लगी है। उनके मुताबिक, ‘क्या मैं सच में उस स्थिति में खुश हो सकता हूं और शिक्षक दिवस मना सकता हूं, जब हमारे शैक्षणिक संस्थानों की हालत बद से बदतर होते पाऊं और अपने छात्रों का दुख महसूस करूं? क्या अब इस दिन को मनाने की कोई वजह बची है?’
असंतुष्ट छात्रों की इस पीढ़ी के संत्रास के बारे में सोचिए। हां, उनमें अपने भविष्य को लेकर अनिश्चितता है; और तनाव एवं बेचैनी से त्रस्त हैं। चाहे कोई अत्यंत कुलीन विद्यालय का छात्र हो या किसी छोटे शहर का वह युवा जो मानक बना दिए गए ‘नीट’ जैसी अहम कठिन परीक्षा की तैयारी कर रहा हो, इस पीढ़ी का तनाव वाकई चिंता की बात है।
जब यह लेख लिखा जा रहा है तो आईआईटी-दिल्ली में एमएससी के एक छात्र की खुदकुशी की खबर आई और इस दुखद घटना पर प्रशासन के लापरवाही और अफसरशाही भरे रवैये के कारण वहां तनाव का माहौल है। इसी तरह, यह सोचकर कर दिल टूट जाता है कि नीट परीक्षा लीक विवाद के कारण इम्तिहान रद्द किए जाने और दोबारा तारीख तय होने के बाद कई छात्रों ने खुदकुशी कर ली थी।
जब राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड्स ब्यूरो के आंकड़ों पर नज़र डालते हैं -2024 में छात्रों की आत्महत्या के 14,488 मामले- तो अहसास होता है कि काफी असमानता और असंतुलन वाले इस समाज में ऊपर उठने की होड़ ने हमारे छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को कितना नुकसान पहुंचाया है।
इसी प्रकार, हमारे स्कूलों और विश्वविद्यालयों की दयनीय हालत के बारे में सोचिए। जहां गुमनाम गांवों और छोटे कस्बों में भी शानदार नामों वाले इंग्लिश-माध्यम/प्राइवेट स्कूल दिख जाते हैं, वहीं सरकारी स्कूलों की हालत बहुत खराब है। नीति आयोग की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, पिछले एक दशक में 94,000 सरकारी स्कूल बंद कर दिए गए हैं। इतना ही नहीं, देखिए कि किस प्रकार व्यवस्था ने अध्यापन के पेशे की अहमियत को घटाया है और उसे मामूली समझता है। वरना, इस बात को कैसे समझा सकते हैं कि सरकारी स्कूल के शिक्षकों को अक्सर पढ़ाना छोड़कर चुनाव का काम, जनगणना और वोटर लिस्ट में सुधार जैसे गैर-शैक्षणिक/प्रशासनिक काम करने में लगा दिया जाता है? इसके अलावा, यहां एक ऐसा तंत्र है जो अध्यापन से प्यार करने वालों का हौसला तोड़ता है। एक शिक्षक कैसे पढ़ा सकता है अगर युवा छात्र क्लास में आने से कतराएं और कोचिंग संस्थान चलाने वालों से पढ़ना पसंद करें? जी हां, हम सभी को ‘डमी स्कूलों’ का सामान्यीकरण किए जाने और भारत के 58,000 करोड़ रुपये के कोचिंग उद्योग के बीच गहरे संबंध पर सोचना चाहिए।
जब ‘सफलता के नुस्खे’ बेचने वाले व्यापारी यह तय करने लग जाएं कि भौतिकी, गणित, रसायन शास्त्र और जीव विज्ञान की पढ़ाई कैसे की जानी चाहिए, तो क्या उन लोगों के लिए कोई जगह बचती है जो गहरे उतरकर और अर्थपूर्ण तरीके से पढ़ाना चाहते हैं-सिर्फ़ ‘नीट’और ‘जेईई’ के लिए नहीं, बल्कि युवा दिमागों को संवारने, उनकी आलोचनात्मक सोच को धार देने और वास्तविक लोकतांत्रिक एवं वैज्ञानिक सोच विकसित करने के लिए?
सच कहा जाए तो, जब कोचिंग माफिया को शिक्षा के क्षेत्र पर काबिज होते देखते हैं, तो शिक्षक दिवस मनाने का कोई अर्थ नहीं दिखता। साथ ही, जब हमारे विश्वविद्यालयों में अकादमिक आज़ादी न रहे और डर एवं निगरानी का माहौल विचारों, बहसों व मतभेदों के प्रवाह में बाधा डालता हो, तो शिक्षक दिवस महत्व खो चुका प्रतीत होता है।
निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता कि बतौर शिक्षक हम शिक्षा जगत के सामने खड़े खतरे को समझ भी रहे हैं या नहीं। अगर नव-उदारवाद के प्रवाह में छिपी ‘उपयोगितावादी सोच’ शिक्षा को केवल नौकरी पाने का प्रशिक्षण या वह तकनीकी स्किल पाने वाली पढ़ाई बनाती हो,जिसकी ज़रूरत टेक्नो-कॉर्पोरेट इंडस्ट्री को अपनी ‘उत्पादकता’ बढ़ाने के लिए है, तो हम उदारवादी/मानवतामूलक शिक्षा की मूल भावना को भारी नुकसान पहुंचा रहे हैं।
इस प्रकार की उपयोगितावादी सीख लोकतंत्र की मूल भावना को कमज़ोर करती है। हम आलोचनात्मक सोच, लैंगिक अध्ययन व हाशिए पर मौजूद लोगों के इतिहास के बारे में कैसे पढ़ा पाएंगे, जब हमें बताया जाए कि हर चीज़ की कीमत उसके मौद्रिक मूल्य से मापी जानी चाहिए? इसी तरह, जब इस विषाक्त समय में अति-राष्ट्रवाद का एजेंडा आम बात हो गया है, तो आलोचनात्मक शिक्षा-पद्धति की भावना का अंत तय है। ऐसे हालात में, क्या किसी अध्यापक के लिए यह सवाल उठाना मुमकिन होगा कि अति-राष्ट्रवाद के चलन ने किन चीज़ों को सामान्य बना दिया -मसलन, सैन्यवाद, सामाजिक रूढ़िवाद, बहुसंख्यकवाद व अल्पसंख्यकों को ‘दोयम’ या ‘अलग’ समझना?
इस संकट के बीच भी, यह देखकर अच्छा लगता है कि हमारे छात्र अपनी आवाज़ उठा रहे हैं, तमाम किस्म के जोखिम उठा रहे हैं और शिक्षा पर हो रहे निरंतर हमलों का विरोध कर रहे हैं। बतौर शिक्षक, अगर हम आगे नहीं आते, अपनी आवाज़ नहीं उठाते और शिक्षा को बचाने के लिए कोई आंदोलन शुरू नहीं करते, तो क्या शिक्षक दिवस के मौके पर अच्छा महसूस करने और खुद को बधाई देने का कोई कारण है?
लेखक समाजशास्त्री हैं।

