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राज्यपालों की भूमिका पर फिर खिंची तलवारें

मान लें कि अभिभाषण की प्रथा समाप्त हो जाए, तब क्या यह विरोध खत्म हो जाएगा? सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद राज्यपालों द्वारा विधानमंडलों से पास विधेयकों को रोककर रखने के प्रकरण का कोई पक्का समाधान नहीं निकला...

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मान लें कि अभिभाषण की प्रथा समाप्त हो जाए, तब क्या यह विरोध खत्म हो जाएगा? सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद राज्यपालों द्वारा विधानमंडलों से पास विधेयकों को रोककर रखने के प्रकरण का कोई पक्का समाधान नहीं निकला है। वस्तुतः समस्या संवैधानिक व्यवस्था में नहीं, राजनीतिक संस्कृति में है।

तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक विधानसभाओं में राज्यपालों और राज्य सरकारों के बीच टकराव की खबरें इस साल भी आई हैं। ऐसा किसी न किसी रूप में पिछले कुछ वर्षों से हो रहा है। वर्तमान टकराव राज्य सरकारों द्वारा तैयार किए गए अभिभाषणों के पढ़ने से जुड़ा है। प्रत्यक्षतः ऐसा अनजाने में नहीं हो रहा है। इन मामलों से जुड़े सभी पक्ष संवैधानिक व्यवस्थाओं और उनसे जुड़ी मर्यादा-रेखाओं से भली भांति परिचित हैं। राज्यपाल जानते-समझते हैं और राज्य सरकारें भी। तब ऐसा क्यों होता है?

इन राज्यों में मुख्यमंत्री और राज्यपालों के रिश्ते काफी समय से तनावपूर्ण रहे हैं। केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन कई बार स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर होने वाले राज्यपालों के ‘एट होम’ कार्यक्रमों का बहिष्कार कर चुके हैं। मुख्यमंत्रियों और राज्यपालों के बीच सीधा संवाद बहुत कम है। इस वक्त तो चुनाव करीब हैं, इसलिए माहौल में वैसे ही गर्मी भरी है।

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दक्षिण के जिन तीन राज्यों में विवाद खड़े हुए हैं, उनमें इंडिया गठबंधन का हिस्सा रही पार्टियों की सरकारें हैं, जो भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में बनी केंद्र सरकार के विरोध में हैं। ऐसे विवाद होते ही तभी हैं, जब केंद्र और राज्य की सरकारों का आपसी विरोध हो। बंगाल और पंजाब में भी इससे मिलते-जुलते प्रकरण हुए हैं। राज्यपालों या राष्ट्रपति के लिए निर्वाचित सरकारों द्वारा तैयार किए गए भाषणों या विशेष संबोधनों को हूबहू पढ़ना एक संवैधानिक परंपरा है। यह ब्रिटिश परंपरा है, जिस पर आधारित भारत की संसदीय प्रणाली में भी उन्हीं परंपराओं के पालन की उम्मीद की जाती है। ऐसा कभी नहीं हुआ, जब ब्रिटिश राजा या रानी ने आधिकारिक भाषण को लेकर ना-नुकुर की हो।

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देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद और प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के बीच बहुत से मामलों में मतभेद थे, पर उन्होंने ऐसा कभी कुछ नहीं किया, जिससे संसदीय मर्यादा भंग हो। पूर्व राष्ट्रपति केआर नारायणन ने 1998 के गणतंत्र दिवस संबोधन में कुछ बदलाव किया था। कुछ दूसरे मौकों पर भी उन्होंने प्रस्तावित मसौदों में संशोधन किए थे, ताकि भाषण का स्वर और संदेश उनके विचारों के अनुरूप हो। ऐसे मौके संसद से बाहर के वक्तव्यों में ज्यादा देखे गए।

उनके दृष्टिकोण और अब हो रहे टकराव में फर्क है। अब इसने राजनीतिक टकराव की शक्ल ले ली है। मसलन कर्नाटक के प्रसंग को देखें, जहां राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने गत 22 जनवरी को विधानमंडल के संयुक्त अधिवेशन को संबोधित करते हुए सरकार के तैयार भाषण की केवल तीन लाइन ही पढ़ीं और सदन से बाहर चले गए। गहलोत के इस कार्य को मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने असंवैधानिक बताते हुए कहा, संविधान के अनुच्छेद 176 और 163 के तहत राज्यपाल को मंत्रिमंडल की ओर से तैयार पूरा भाषण पढ़ना चाहिए।

उधर राज्यपाल गहलोत सरकार के तैयार भाषण के पैरा नंबर 11 पर नाराज थे, जिसमें इनमें लिखा है कि केंद्र सरकार ने यूपीए काल में शुरू की गई मनरेगा योजना को कमजोर किया है। उसका बजट घटाया है, जिससे ग्रामीण रोजगार प्रभावित हुआ है। वस्तुतः यह केंद्र-राज्य संबंधों का महत्त्वपूर्ण पहलू है। सवाल है कि राज्य सरकारों के पास असहमति व्यक्त करने का क्या यही रास्ता बचा है? और क्या राज्यपालों के पास अपने विवेक का इस्तेमाल करने का अधिकार है?

सवाल यह भी है कि क्या राज्य सरकारों को संवैधानिक रूप से सीधे राज्यपाल के माध्यम से केंद्र की आलोचना करनी चाहिए? आखिरकार राज्यपाल केंद्र द्वारा नियुक्त संवैधानिक पद है। उसे राज्य में केंद्र के प्रतिनिधि के रूप में देखा जाता है, न कि राज्य सरकार के प्रवक्ता के रूप में। पर क्या केंद्र सरकार को उनके माध्यम से राज्य सरकारों पर दबाव बनाना चाहिए?

तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि के साथ लगातार टकराव चलने के कारण मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने विधानमंडल के पहले सत्र में राज्यपाल के अभिभाषण की प्रथा को समाप्त करने का समर्थन किया है। देश के आठवें राष्ट्रपति (1987-1992) आर वेंकटरमण ने राष्ट्रपति और राज्यपालों द्वारा विधायिका के समक्ष पारंपरिक अभिभाषण की प्रथा को समाप्त करने की सिफारिश कई बार की थी। वे इस औपनिवेशिक प्रथा को अनावश्यक और असंवैधानिक मानते थे।

फरवरी 1988 में संसद में अपना पहला अभिभाषण देने से पहले उन्होंने सरकार को सुझाव दिया था कि ‘मेरी सरकार’ के स्थान पर ‘सरकार’ शब्द का प्रयोग किया जाए। उन्होंने कहा, यह प्रथा ब्रिटिश विरासत का हिस्सा है और भारत में प्रासंगिक नहीं है। भारत का संविधान स्वयं जनता द्वारा संविधान सभा के माध्यम से बनाया गया था। ऐसे में देश के राष्ट्रपति द्वारा ‘मेरी सरकार’ कहना ‘अनुचित’ है। इस व्यवस्था को समाप्त करने से कोई नुकसान नहीं होने वाला है, क्योंकि अनुच्छेद 86 और 175 के तहत राष्ट्रपति और राज्यपालों के पास विधायिका को संबोधित करने का अधिकार तब भी बना रहेगा।

अतीत में कई राजनेताओं ने राज्यपाल का पद ही खत्म करने का सुझाव दिया है। थोड़ी देर के लिए मान लें कि अभिभाषण की प्रथा समाप्त हो जाए, तब क्या यह विरोध खत्म हो जाएगा? सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद राज्यपालों द्वारा विधानमंडलों से पास विधेयकों को रोककर रखने के प्रकरण का कोई पक्का समाधान नहीं निकला है। वस्तुतः समस्या संवैधानिक व्यवस्था में नहीं, हमारी राजनीतिक-संस्कृति में है। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने 25 नवंबर 1949 को संविधान सभा में अंतिम भाषण के दौरान यह ऐतिहासिक चेतावनी दी, ‘संविधान चाहे कितना भी अच्छा क्यों न हो, अगर उसे लागू करने वाले लोग बुरे साबित हुए, तो संविधान भी बुरा साबित होगा।’ उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि संविधान की सफलता केवल इसके प्रावधानों पर नहीं, बल्कि इसे अमल में लाने वालों की नैतिकता और ईमानदारी पर निर्भर करती है।

ऐसे मतभेद और टकराव भारतीय राजनीति में कोई नई बात नहीं है। आज केंद्र में बीजेपी की सरकार है और वह काफी कुछ वैसा ही कर रही है जैसा कांग्रेस ने दशकों तक किया। हम सैकड़ों साल पुरानी ब्रिटिश परंपराओं पर देश को चलाना चाहते हैं, तो पिछले कुछ दशकों की अपनी परंपराओं पर भी नज़र डालनी चाहिए। सच यह है कि जब दो विपरीत राजनीतिक विचारों की सरकारें केंद्र और राज्य में होती हैं, तब राज्यपालों और मुख्यमंत्रियों के बीच प्रभावी संवाद चैनल होना चाहिए, क्योंकि जनता के लिए आवश्यक प्रशासनिक कार्यों के लिए दोनों के बीच समन्वय की जरूरत होती है।

मूल मुद्दा राज्यपाल पद का राजनीतिकरण है। इसका समाधान क्या है? एक काम फिर भी किया जा सकता है वह है सरकारिया और पंछी आयोग की सिफारिशें। सरकारिया (1983-88) और पंछी आयोग (2007-10) ने राज्यपाल की नियुक्ति में निष्पक्षता, मुख्यमंत्री से परामर्श, और सक्रिय राजनीति से दूर रहने वाले प्रतिष्ठित व्यक्तियों के चयन की सिफारिश की थी।

दोनों आयोगों का मुख्य उद्देश्य राज्यपाल पद को केंद्र के राजनीतिक एजेंट के बजाय एक तटस्थ संवैधानिक पद बनाना और राज्य के बाहर के व्यक्ति को नियुक्त करना है। इसके अनुसार, संविधान में यह प्रावधान करने के लिए संशोधन किया जा सकता है कि राज्यपालों की नियुक्ति से पहले राज्यों के मुख्यमंत्रियों से परामर्श किया जाएगा।

ऐसा करने से राज्यपालों और निर्वाचित सरकारों के बीच सभी मुद्दों का समाधान नहीं हो जाएगा। अलबत्ता महत्वपूर्ण विधायी मुद्दों पर मतभेद को कम करने और वार्षिक संबोधन जैसी पारंपरिक प्रथाओं पर टकराव से बचने के लिए यह अच्छा प्रस्थान-बिंदु हो सकता है।

       -लेखक वरिष्ठ संपादक रहे हैं।

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