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रील का धंधा कभी न पड़ेगा मंदा

तिरछी नज़र

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वैसे एक तरफ़ राज्य सरकारें स्कूल में शिक्षकों के मोबाइल ले जाने पर प्रतिबंध थोप रही हैं, दूसरी ओर उनके आधे प्रशिक्षण मोबाइल एप से निपटाये जा रहे हैं।

रील बनाना इन दिनों राष्ट्रीय अभियान बन चुका है। और अब नए बजट में इसको बाकायदा सरकारी संरक्षण मिलने जा रहा है इससे इस कुटीर उद्योग की दिन दूनी , रात चौगुनी प्रगति संभावित है। रील देखना और रील बनाना हमारे दो मुख्य राष्ट्रीय अभियान हैं। ट्रेन में हो या बस में या फिर हवाई जहाज में ही क्यों न हो, जब तक सिग्नल मिलता है रील चला कर टाइम पास करना मुख्य शगल है।

इन दिनों एक तिहाई देश रोजी रोटी और तमाम जरूरी मामलों की चिंता छोड़ रील निर्माण के एकमेव लक्ष्य में लगा हुआ है। शहर के नामचीन डाक्टरों से लेकर शिक्षाविद तक और बच्चों से लेकर गृहिणियां तक इस अभियान में लगे हैं। जल्दी ही इन्फ्लूएंसर की ऐसी बाढ़ देश में आ जाएगी कि फ़ालोअर कम पड़ जाएंगे। ये इन्फ्लूएंसर हर किसी चीज़ के विशेषज्ञ हैं। दवाई से लेकर भोजन में पौष्टिक तत्वों तक के और बीपी, डायबिटीज , गठिया से लेकर रसोई के मसालों तक के। ज्योतिष से लेकर वास्तुशास्त्र तक सबके विशेषज्ञ सोशल मीडिया पर भरे पड़े हैं। कुछ महिलायें अलग-अलग अदायें फ़िल्मी गानों पर दिखाकर फ़ाॅलोअर बढ़ा रही हैं। देश पुनर्जागरण की तरफ जा रहा है।

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सरकारें भी चाहती हैं कि लोग इसी भेड़चाल में लगे रहें और मूलभूत प्रश्नों और समस्याओं की ओर उनका ध्यान ही केंद्रित न हो। पहले नीरो चैन की बंसी बजा रहा था अब नीरो स्वयं जनता को चैन की छद्म बंसी पकड़ा रहा है। लो तुम बजाओ, देश जलता है तो जलने दो। तुम सिल्वर और गोल्ड प्लेट की चिंता करो। आजकल वही महान है जिसके फ़ाॅलोअर ज़्यादा हैं। पहले अनुयायी होते थे अब फ़ाॅलोअर होते हैं जो छिटकते और जुड़ते रहते हैं। एक तरह से यह आपकी पूंजी है, वायरल सेना है जिसे आप आपत्तिकाल में ट्रोल हेतु विरोधी पर छोड़ सकते हैं।

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वैसे एक तरफ़ राज्य सरकारें स्कूल में शिक्षकों के मोबाइल ले जाने पर प्रतिबंध थोप रही हैं दूसरी ओर उनके आधे प्रशिक्षण मोबाइल एप से निपटाये जा रहे हैं। वैसे ही हमारे शिक्षकों में प्रतिभा कूट-कूट कर भरी है, सनसनीखेज वीडियो और रीलें आए दिन आती हैं।

जब कंटेंट बनाने की प्रयोगशालाएं खुल जायेंगी तब तो कहना ही क्या। हर विद्यार्थी हाथ में मोबाइल और ट्राइपॉड लिए घूमेगा। सोशल मीडिया क्रांति के दिन होंगे वे। स्कूल-कालेज ऊल जलूल हरकतों के मंच बन जायेंगे और प्रतिभा का प्रचंड विस्फोट होेगा। उस चकाचौंध में वास्तविक ज्ञान और संस्कार की ज्योति धूमिल हो तो हो, उसकी किसे चिंता है।

जब दुनिया वैज्ञानिक और तकनीकी गंभीर शोध और विश्लेषण की दिशा में जा रही है हम सोशल मीडिया के स्वाद चख रहे हैं। चारों तरफ़ शोर और मानवीय श्रम के दुरुपयोग से जूझता देश अब नई संचार क्रांति की दिशा में अग्रसर हो रहा है। आइए इस नई शक्तिशाली, नवोन्मेषकारी सोच का स्वागत करें सेल्फी स्टिक के सामने कोई बेहूदा पोज़ बनाकर।

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