जब दो पक्ष हाथ मिलाकर अदालत के सामने दिखावटी लड़ाई करते हैं, तो उसे ‘कलूसिव सूट’ कहते हैं। इसे ‘साजिशी मुकदमा’ कहना सटीक होगा।
न्यायपालिका वह पवित्र स्थान है जहां सत्य की प्रतिष्ठा होती है, लेकिन आज ‘कलूसिव सूट’ (साजिशी मुकदमों) के जरिए इस मंदिर की गरिमा को चुनौती दी जा रही है। यह कानूनी जगत का वह अंधेरा कोना है जहां वादी और प्रतिवादी विरोधी होने का मात्र ढोंग करते हैं, जबकि हकीकत में वे एक ही ‘साजिशी पटकथा’ के किरदार होते हैं। जब न्याय की गुहार लगाने वाला और उसका विरोध करने वाला, दोनों ही परदे के पीछे एक हो जाएं, तो अदालत का कठघरा केवल एक रंगमंच बनकर रह जाता है। न्याय की बुनियादी अवधारणा को ठेस पहुंचती है। ऐसी कृत्रिम लड़ाइयां न केवल न्यायिक समय की बर्बादी हैं, बल्कि उन वास्तविक शोषितों का हक भी मारती हैं जो न्याय की कतार में अंतिम पायदान पर खड़े हैं।
सरल शब्दों में कहें तो जब दो पक्ष आपस में हाथ मिलाकर अदालत के सामने ‘नूरा-कुश्ती’ (दिखावटी लड़ाई) करते हैं, तो उसे कानून में ‘कलूसिव सूट’ कहा जाता है। आम बोलचाल में इसे ‘साजिशी मुकदमा’ कहना ज्यादा सटीक होगा। यह एक ऐसा कृत्रिम विवाद है जहां दोनों पक्ष वास्तव में एक-दूसरे के विरोधी नहीं होते और उनके बीच कोई वास्तविक कानूनी संघर्ष नहीं होता। वे अदालत की चौखट पर सिर्फ इसलिए पेश होते हैं ताकि आपसी साजिश के जरिए एक ऐसी ‘डिक्री’ या सरकारी आदेश हासिल कर सकें, जिसे वे ईमानदारी के रास्ते से कभी प्राप्त नहीं कर सकते थे।
हमारी भारतीय न्याय प्रणाली ‘प्रतिद्वंद्वी पद्धति’ पर आधारित है, जिसका मूल सिद्धांत ही यह है कि जब दो विरोधी पक्ष पूरी शिद्दत से अपनी बात और दलीलें रखेंगे, तभी सत्य छनकर बाहर आएगा। लेकिन जब विरोध ही दिखावटी हो और दोनों पक्ष ‘मेज के नीचे’ हाथ मिला चुके हों, तो अदालत महज एक मूकदर्शक बनकर रह जाती है। निस्संदेह, यह उस पवित्र तंत्र की तौहीन भी है जिसे समाज में न्याय की रक्षा के लिए बनाया गया है।
कानून की नजर में ‘मिलीभगत’ के लिए कोई सहानुभूति नहीं है। भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 40 स्पष्ट रूप से प्रावधान करती है कि यदि कोई फैसला, आदेश या डिक्री ‘धोखे’ या ‘मिलीभगत’ से प्राप्त की गई है, तो उसे किसी भी समय चुनौती दी जा सकती है। यह धारा एक सुरक्षा कवच है। इसके अलावा, नागरिक प्रक्रिया संहिता के तहत अदालतों को यह अंतर्निहित शक्ति प्राप्त है कि वे ऐसे मुकदमों को पहचानते ही खारिज कर दें। कानून का एक वैश्विक सिद्धांत है- धोखे से कभी भी कोई कानूनी अधिकार पैदा नहीं हो सकता।
भारतीय न्यायपालिका ने हमेशा से इन साजिशी मुकदमों के विरुद्ध सख्त रुख अपनाया है। इस दिशा में ‘नगुबाई अम्मल बनाम बी. शमा राव’ (1956) का फैसला एक नजीर है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने ‘साजिश’ और ‘धोखे’ के बीच के महीन अंतर को स्पष्ट किया। अदालत के अनुसार, ‘फ्रॉड’ में एक पक्ष दूसरे को छलता है, किंतु ‘कलूज़न’ में दोनों पक्ष मिलकर अदालत के साथ छल करते हैं। जब वादी और प्रतिवादी के बीच कोई वास्तविक विवाद न हो और उनका एकमात्र उद्देश्य न्याय की आड़ में किसी तीसरे पक्ष का हक मारना हो, तो वह पूरी तरह ‘साजिश’ है। इसी प्रकार, ‘रूपचंद गुप्ता बनाम रघुवंश कुमार’ (1964) में अदालत ने आगाह किया कि यदि डिक्री का उद्देश्य किसी किराएदार या हकदार का अधिकार मारना है, तो वह डिक्री बातिल (शून्य) होगी। इन फैसलों से स्पष्ट है कि न्याय के सिंहासन पर बैठी अदालतें केवल कागजी सबूतों को नहीं तौलतीं, बल्कि मुकदमों के पीछे छिपी बदनियती को पहचानने की कुव्वत भी रखती हैं।
लोग ऐसा जोखिम अक्सर निजी स्वार्थ के लिए उठाते हैं, जैसे टैक्स चोरी, बैंक के कर्ज से बचना या अवैध कब्जा करना। इसका सबसे बड़ा खमियाजा उस ‘तीसरे पक्ष’ को भुगतना पड़ता है जो अनजाने में अपना कानूनी हक खो देता है; जैसे पिता-पुत्र की मिलीभगत बैंक के अधिकार को खत्म कर सकती है। यहां ‘मैत्रीपूर्ण मुकदमे’ (धारा 90, नागरिक प्रक्रिया संहिता) और ‘साजिशी मुकदमे’ के बीच की ‘कुत्सित मंशा’ को समझना लाजिमी है। जहां मैत्रीपूर्ण वाद कानूनी स्पष्टता के लिए होते हैं, वहीं साजिशी मुकदमे का उद्देश्य ‘अधिकार का अपहरण’ करना होता है। इसी महीन लकीर को पहचानना ही एक न्यायाधीश की असल परीक्षा है।
एक वकील के लिए उसका पेशा केवल जीविका नहीं, बल्कि एक पवित्र जिम्मेदारी है। वकीलों को यह समझना होगा कि वे ‘ऑफ़िसर ऑफ़ द कोर्ट’ हैं, न कि किसी साजिश के पटकथा लेखक। यदि कोई अधिवक्ता जानते हुए भी ऐसे फर्जी मुकदमों का हिस्सा बनता है, तो बार काउंसिल को ऐसे सदस्यों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करनी चाहिए। इस खतरे को टालने के लिए सजग ‘न्यायिक सक्रियता’ अनिवार्य है। अदालतों को मुकदमों के पीछे छिपी मंशा को भांपना होगा; जहां प्रतिवादी बिना किसी प्रतिरोध के सब स्वीकार कर ले, वहां न्यायपीठ को तुरंत सतर्क हो जाना चाहिए। इस प्रवृत्ति को रोकने के लिए भारी आर्थिक दंड की ऐसी नजीर पेश करनी होगी, जो भविष्य के लिए सबक बने। साथ ही, उन ‘तीसरे पक्षों’ के लिए कानूनी राह आसान करनी होगी, जो इन बंद कमरों की साजिशों के असली शिकार होते हैं।
न्यायपालिका की वास्तविक ताकत उसकी पारदर्शिता और सत्य के प्रति अडिग निष्ठा में निहित है। हमें एक ऐसी न्यायिक संस्कृति विकसित करनी होगी जहां चालाकी की जगह सच्चाई का बोलबाला हो। जैसा कि कहा गया है, ‘न्याय न केवल होना चाहिए, बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए’। जब हम इन साजिशी मुकदमों का पर्दाफाश करेंगे, तभी हम एक पारदर्शी-मजबूत न्याय प्रणाली का निर्माण कर पाएंगे।
लेखक कुरुक्षेत्र विवि के विधि विभाग में सहायक प्रोफेसर हैं।

