असहमति का अधिकार

‘राइट टू रिकॉल’ की प्रासंगिकता का प्रश्न

‘राइट टू रिकॉल’ की प्रासंगिकता का प्रश्न

आलोक यात्री

आलोक यात्री

लोकतंत्र जनता का, जनता के लिए, जनता द्वारा संचालित शासन प्रणाली है। लिहाजा निर्वाचित प्रतिनिधि के अपने कर्तव्य पालन में विफल रहने या किसी गलत कार्य में लिप्त पाए जाने की स्थिति में ‘राइट टू रिकॉल’ का प्रावधान जरूरी हो जाता है।

जयप्रकाश नारायण के बाद अन्ना हजारे भी अपने आंदोलनों में ‘राइट टू रिकॉल’ के मुद्दे को प्रमुखता से उठाते रहे हैं। दुर्भाग्य तो यह है कि अन्ना हजारे के आंदोलनों की पतवार थामे लोग भी सत्ता की मुख्यधारा से जुड़ने के बाद इस मुद्दे को विस्मृत कर बैठे। ‘राइट टू रिकॉल के साथ ही मतदाता को ‘नोटा’ (नन ऑफ द अबव यानी उनमें से कोई नहीं) का अधिकार दिए जाने की मांग जोर पकड़ने लगी थी, जिसके माध्यम से कोई भी नागरिक चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों को वोट नहीं देने का विकल्प चुन सकता है। ‘नोटा’ की अवधारणा संवैधानिक तौर पर भले ही लागू कर दी गई हो, लेकिन इसका कोई चुनावी मूल्य नहीं है। ‘नोटा’ के रूप में सामने आए मत भले ही निकटतम प्रत्याशी को मिले मतों से अधिक हों, लेकिन विजेता निकटतम वोट प्राप्त प्रत्याशी को ही घोषित किया जाता है।

भारतीय चुनाव प्रक्रिया में ‘नोटा’ ने खासी लोकप्रियता हासिल की है। उच्चतम न्यायालय के आदेश पर 2013 में ‘नोटा’ लागू किए जाने के बाद से हमारे सामने ऐसे कई उदाहरण हैं जो यह बताते हैं कि सभी प्रत्याशियों को खारिज करने का विकल्प कई मतदाताओं को अपनी बात मुखर करने की आजादी देता है। 2017 के गुजरात विधानसभा चुनाव में ईवीएम पर नोटा पर उंगलियों की संख्या आम आदमी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी को मिले वोटों से कहीं अधिक थी। ईवीएम के इस बटन के द्वारा मतदाताओं ने यह बता दिया कि चुनाव में उतरा कोई भी प्रत्याशी उनका प्रतिनिधित्व करने के योग्य नहीं है। 5 लाख 51 हजार 294 लोगों ने ‘नोटा’ को पहली पसंद बनाया था।

हाल ही में सत्ताधारी एक जनप्रतिनिधि के पुत्र द्वारा प्रदर्शनकारी किसानों को कथित रूप से कुचल कर मार डालने का मामला सरगर्म है। विभिन्न संगठनों, विपक्षी दलों द्वारा उक्त सांसद को मंत्री पद से हटाने की पुरजोर मांग की जा रही है। ऐसे में निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को वापस बुलाने के जनता के अधिकार पर बहस फिर मुखर हो गई है। चुने हुए प्रतिनिधि को वापस बुलाने का अधिकार खासा प्राचीन है। एथेंनियन लोकतंत्र से यह कानून चलन में था। ईसा पूर्व 5वीं सदी में प्राचीन एथेंस वासियों ने अपने अनूठे लोकतंत्र के तहत एक अनूठी सामाजिक परंपरा लागू कर रखी थी। हर वर्ष उनके 10 महीने के कैलेंडर में छठे और सातवें महीने (जनवरी या फरवरी) में सभी एथेंस वासी पुरुषों से सभा में पूछा जाता था कि क्या वे बहिष्कार आयोजित करना चाहते हैं? वे यदि पक्ष में मतदान करते तो दो माह बाद बहिष्कार का आयोजन किया जाता। मिट्टी के बर्तनों के टुकड़ों पर नागरिक उन लोगों के नाम लिखते थे जिन्हें वह पदच्युत करना चाहते थे। उन टुकड़ों को एक कलश में रखा जाता था। जिस व्यक्ति के नाम के अधिक टुकड़े आते थे उसे 10 वर्षों के लिए उम्मीदवारी से वंचित कर दिया जाता था। बाद में कई देशों ने ‘रिकॉल’ को अपने संविधान का हिस्सा बनाया। इतिहास बताता है कि ‘रिकॉल’ की उत्पत्ति स्विट‍्ज़रलैंड में हुई, लेकिन चलन में यह अमेरिका से आया। 1903 में अमेरिका के लॉस एंजेल्स शहर की नगर पालिका, 1960 में मिशीगन और ओरेगॉन में पहली बार ‘राइट टू रिकॉल’ विकल्प के तौर पर संविधान में लागू किया गया। कनाडा की ब्रिटिश कोलंबिया विधान सभा ने 1995 से ‘रिकॉल चुनाव’ को मान्यता प्रदान कर रखी है।

भारत में ‘राजधर्म’ की अवधारणा वैदिक काल में भी मौजूद थी। ‘रिकॉल’ की अवधारणा देश में पहली बार 1924 में तब सामने आई थी जब हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़े सचिंद्र नाथ सान्याल ने पार्टी के घोषणापत्र में कहा था ‘इस गणराज्य में मतदाताओं के पास अपने जनसेवकों के ऊपर राइट टू रिकॉल का अधिकार सुरक्षित होगा। लोकतंत्र मजाक न बने इसलिए मतदाता को यह अधिकार प्रदान किया जाएगा।’ इस मुद्दे पर संविधान सभा में बहस भी हुई थी, लेकिन कहा जाता है कि डॉ. भीमराव अंबेडकर ने इस प्रस्तावित संशोधन को स्वीकार नहीं किया था। देश के सुप्रसिद्ध मानवाधिकारवादी एम.एन. रॉय ने 1944 में विकेंद्रीकृत और शासन के विकसित स्वरूप को प्रस्तावित किया था जो जनप्रतिनिधियों को चुनने और उन्हें वापस बुलाने की अनुमति देता है। जुलाई, 1947 में सरदार वल्लभ भाई पटेल ने संविधान सभा में जनता को जनसेवकों को हटाने के अधिकार ‘रिकॉल’ को प्रभावी बनाने पर बल दिया था। 1974 में सी.के. चंद्रप्पन द्वारा जनसेवकों को वापस बुलाने वाला प्रस्ताव लोकसभा के पटल पर रखा था, जिसका समर्थन अटल बिहारी वाजपेयी ने भी किया था।

कहने को भारत के कुछ राज्यों में सरपंच, मुखिया, पार्षद और महापौर जैसे जनसेवकों को वापस बुलाने का अधिकार है लेकिन इसके प्रभावी परिणाम अभी सामने आने बाकी हैं।

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